बिलासपुर आरटीओ में कागज़ में कम, सड़क पर ज़्यादा सीट , परमिट और टैक्स की सेटिंग से चलता परिवहन साम्राज्य –

बिलासपुर आरटीओ में कागज़ में कम, सड़क पर ज़्यादा सीट , परमिट और टैक्स की सेटिंग से चलता परिवहन साम्राज्य –

बिलासपुर : – यह कहानी किसी एक गाड़ी या एक फाइल की नहीं, बल्कि उन दस्तावेज़ों की है जो खुद गवाही बनते जा रहे हैं और उंगली सीधे बिलासपुर आरटीओ की कार्यप्रणाली पर उठ रही है। जब अलग-अलग पत्र, नोटशीट, परमिट और टैक्स रजिस्टर एक ही तथ्य को अलग-अलग तरीके से पेश करें, तो यह महज़ गलती नहीं रह जाती यह एक तय पैटर्न बन जाता है। और यही पैटर्न अब सवालों के घेरे में है।

सबसे पहले नज़र जाती है सीटिंग कैपेसिटी पर। एक आधिकारिक पत्र में सॉफ्टवेयर के मुताबिक जिसमे सीट संख्या ज्यादा है वही परमिट में वही संख्या कम, और दूसरे दस्तावेज़ में तीसरा आंकड़ा। यानी एक ही वाहन लेकिन सीटें तीन तरह की, और हर कागज़ अपने हिसाब से सही बताया जाता है। यह अंतर कोई तकनीकी नहीं है, बल्कि उस जगह की ओर इशारा करता है जहां से खेल शुरू होता है।

यहीं से खुलता है टैक्स का असली खेल। टैक्स दस्तावेज़ों में जो एंट्रियां है वह अलग-अलग है।कहीं रकम हाइलाइट, कहीं ओवरराइट, कहीं जोड़-घटाव बदला हुआ। जब सीट ही तय नहीं, तो टैक्स कैसे तय हुआ? स्थिति साफ है कि सीट के साथ टैक्स भी एडजस्ट हुआ। यानी आधार बदला, तो वसूली भी अपने हिसाब से ढल गई।

इसके आगे नोटशीट इस कहानी का दूसरा अहम पन्ना खोलती है। इसमें दर्ज तकनीकी विवरण मॉडल, कैटेगरी, सीटिंग एक निश्चित आंकड़ा दिखाते हैं। लेकिन वही आंकड़ा परमिट और अन्य दस्तावेज़ों में बदल जाता है। यानी मूल रिकॉर्ड कुछ और, संचालन रिकॉर्ड कुछ और। यह अंतर सिर्फ कागज़ी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल है और सीधे तौर पर बिलासपुर आरटीओ की भूमिका पर भी।

फिर आता है निरीक्षण का सवाल जो इस पूरे मामले की सबसे कमजोर कड़ी है। दस्तावेज़ बताते हैं कि भौतिक सत्यापन के लिए नोटिस जारी हुआ, तारीख तय हुई, निर्देश दिए गए… लेकिन वाहन निरीक्षण के लिए प्रस्तुत ही नहीं हुआ। इसके बावजूद फाइल आगे बढ़ती है, और मामला दूसरे कार्यालय को ट्रांसफर हो जाता है। यानी जांच अधूरी, लेकिन प्रक्रिया पूरी और यही सबसे बड़ा संकेत है कि सिस्टम चल रहा है।

शिकायत पत्र इस पूरे पैटर्न को और स्पष्ट करता है। इसमें आरोप है कि सीटिंग के अंतर के आधार पर टैक्स वसूली में गड़बड़ी की गई और यह कोई एक बार का मामला नहीं, बल्कि लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। हर महीने अतिरिक्त वसूली, सालाना बड़ा अंतर और इसके बावजूद कोई ठोस सुधार नहीं। इतना ही नहीं, एक और दस्तावेज़ चौंकाता है। जिसमें कहा गया है कि किसी वाहन का मूल रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं है, क्योंकि वह नष्ट हो चुका है।
अब सवाल यह है जब आधार ही नहीं है, तो परमिट और टैक्स किस गणना पर तय हो रहे हैं? और अगर रिकॉर्ड गायब है, तो जिम्मेदारी किसकी है?

इन सभी कागज़ों को एक साथ रखिए, तो तस्वीर साफ दिखती है। सीटिंग अलग-अलग, टैक्स एंट्री में बदलाव , निरीक्षण अधूरा , फाइल ट्रांसफर और रिकॉर्ड में अंतर यह सब मिलकर संयोग नहीं बनाते यह एक सिस्टम का संकेत देते हैं, और उस सिस्टम के केंद्र में नजर आता है बिलासपुर आरटीओ।

सबसे अहम बात इन दस्तावेज़ों में कहीं भी ठोस कार्रवाई या सुधार का संकेत नहीं मिलता। सवाल उठे, नोटिस बने, फाइल चली लेकिन नतीजा वहीं का वहीं। यही वह जगह है जहां मामला सिर्फ विभागीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि जवाबदेही का बन जाता है। और जब यह सब उस विभाग में हो रहा हो, जो सीधे सत्ता के शीर्ष से जुड़ा हो, तब मामला और गंभीर हो जाता है। क्योंकि यह सिर्फ कागज़ों का खेल नहीं यह भरोसे का सवाल है।

बिलासपुर आरटीओ का यह मामला अब फाइलों से बाहर आ चुका है। दस्तावेज़ खुद बोल रहे हैं बस सुनने की जरूरत है। अब देखना यह है कि इन कागज़ों को रूटीन मानकर फाइलों में दबा दिया जाएगा या इन्हें आधार बनाकर बिलासपुर आरटीओ के पूरे सिस्टम की गहराई से जांच होगी।

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