दो साल तक चलता रहा वेतन घोटाला, सोता रहा सिस्टम? एसपी कार्यालय से दो करोड़ की हेराफेरी, अब एसपी, आईजी निरीक्षण और ट्रेजरी की भूमिका पर भी सवाल –

दो साल तक चलता रहा वेतन घोटाला, सोता रहा सिस्टम? एसपी कार्यालय से दो करोड़ की हेराफेरी, अब एसपी, आईजी निरीक्षण और ट्रेजरी की भूमिका पर भी सवाल –
जगदलपुर : – बस्तर पुलिस अधीक्षक कार्यालय में सामने आए करीब दो करोड़ रुपये के वेतन घोटाले ने केवल तीन कर्मचारियों की करतूत ही उजागर नहीं की है, बल्कि पूरे वित्तीय निगरानी तंत्र की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। प्रारंभिक जांच के बाद वेतन शाखा के कर्मचारी गिरीश राय, राजकुमार कतलम और हेमंत मैथ्यू को गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर भेजा गया है। आरोप है कि तीनों ने वेतन बिलों में हेराफेरी कर करीब दो वर्षों तक सरकारी धन की अवैध निकासी की।
जांच के दौरान सामने आया कि कथित तौर पर शेयर बाजार और क्रिप्टोकरेंसी में हुए नुकसान की भरपाई के लिए सरकारी वेतन प्रणाली का दुरुपयोग किया गया। पहले अपने वेतन में बढ़ोतरी की गई, फिर कुछ अन्य कर्मचारियों के खातों में भी अतिरिक्त राशि भेजी गई। फिलहाल 15 से अधिक पुलिसकर्मियों के बैंक खातों की जांच की जा रही है।
विवेचना में एक और चौंकाने वाला तरीका सामने आया है। कुछ कर्मचारियों को लोन या आर्थिक मदद का भरोसा देकर उनके खातों में अतिरिक्त राशि डाली गई और बाद में वह रकम नकद वापस ले ली गई। यदि जांच में इसकी पुष्टि होती है तो मामला केवल वेतन हेराफेरी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग की गंभीर श्रेणी में भी आएगा।
सबसे बड़ा सवाल दो साल तक किसी को भनक कैसे नहीं लगी?
इस पूरे मामले का सबसे अहम सवाल गिरफ्तार कर्मचारियों से आगे जाता है। यदि प्रारंभिक जांच सही है कि यह खेल करीब दो वर्षों तक चलता रहा, तो आखिर इतने लंबे समय तक किसी वरिष्ठ अधिकारी की नजर इस पर क्यों नहीं पड़ी? हर महीने वेतन बिल बने, भुगतान हुआ, बैंक खातों में राशि पहुंची, लेकिन किसी स्तर पर कोई असामान्यता दर्ज क्यों नहीं हुई?
क्या निगरानी व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित थी?
बस्तर के वर्तमान पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा एक अनुभवी आईपीएस अधिकारी हैं। सवाल यह नहीं है कि उनकी कोई भूमिका है, बल्कि यह है कि उनके कार्यकाल के दौरान यदि इतनी बड़ी वित्तीय अनियमितता चलती रही, तो निगरानी तंत्र आखिर कहां विफल हुआ? क्या वेतन शाखा की नियमित समीक्षा होती थी? क्या वित्तीय दस्तावेजों का मिलान किया जाता था? क्या किसी अधिकारी ने भुगतान के पैटर्न में असामान्य बढ़ोतरी पर ध्यान नहीं दिया?
आईजी कार्यालय के निरीक्षण पर भी सवाल –
पुलिस रेंज स्तर पर समय-समय पर कार्यालयों का निरीक्षण होता है। ऐसे में यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि यदि निरीक्षण नियमित हुए, तो गड़बड़ियां पकड़ में क्यों नहीं आईं? क्या निरीक्षण केवल औपचारिकता बनकर रह गए थे, या फिर हेराफेरी इतनी सुनियोजित थी कि सामान्य जांच से बचती रही?
ट्रेजरी की भूमिका भी जांच के घेरे में –
सरकारी भुगतान ट्रेजरी की प्रक्रिया से गुजरता है। ऐसे में यह भी जांच का विषय है कि क्या बार-बार बढ़ी हुई वेतन राशि, असामान्य भुगतान या संदिग्ध पैटर्न पर किसी स्तर पर आपत्ति दर्ज नहीं हुई? यदि नहीं हुई, तो क्यों?
AI ने पकड़ लिया, सिस्टम नहीं पकड़ पाया –
सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब ऑडिट के दौरान AI आधारित विश्लेषण (Analysis) का उपयोग किया गया। यदि तकनीक कुछ ही समय में वर्षों की अनियमितता पकड़ सकती है, तो सवाल यह भी है कि विभाग की पारंपरिक निगरानी व्यवस्था दो वर्षों तक इसे क्यों नहीं पहचान सकी?
जांच का दायरा बढ़ना चाहिए –
यह मामला अब केवल तीन कर्मचारियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जांच का उद्देश्य सिर्फ यह पता लगाना नहीं होना चाहिए कि पैसा किसने निकाला, बल्कि यह भी तय होना चाहिए कि वित्तीय नियंत्रण, पर्यवेक्षण, निरीक्षण और जवाबदेही की पूरी श्रृंखला में चूक कहां हुई।
बस्तर पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा ने पूरे मामले की विस्तृत जांच कराने की बात कह रहे है। लेकिन सवाल यही है कि क्या जांच केवल निचले कर्मचारियों तक सीमित रहेगी, या फिर उन सभी स्तरों की जवाबदेही भी तय होगी जिनकी निगरानी में यह कथित घोटाला दो वर्षों तक चलता रहा? बतादे कि सलभ सिन्हा विगत दो वर्षों से जगदलपुर पुलिस अधीक्षक है इनके कार्यकाल में यह घोटाला हुआ है।
आखिर दो करोड़ रुपये का सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पैसा किसने निकाला, बल्कि यह भी है कि सिस्टम आखिर दो साल तक सोता क्यों रहा?










