जा तन लागे वो तन जाने : पांचवीं मंजिल, बगुला भगत, 1500 करोड़ का कथित वीडियो और ढाई घंटे का इंतज़ार

जा तन लागे वो तन जाने : पांचवीं मंजिल, बगुला भगत और ढाई घंटे का इंतज़ार –

राजधानी – एक पुरानी कहावत है जा तन लागे वो तन जाने, यानी दर्द उसी को समझ आता है जिसके ऊपर बीतती है। सूबे की सियासत में इन दिनों यही कहावत सबसे ज्यादा सटीक बैठती हुई दिखलाई पड़ती है।

कहानी शुरू होती है उस दौर से, जब प्रदेश में 15 साल तक एकछत्र राज था। उस समय सत्ता के गलियारों में अक्सर चर्चा होती थी कि सरकार के भीतर भी कुछ ऐसे शक्ति केंद्र थे, जिनकी पकड़ मंत्रालयों से लेकर फैसलों तक महसूस की जाती थी। अमन और मुकेश का वह दौर शायद ही किसी से छुपा होगा। उस दौर में मुख्यमंत्री भले एक थे, लेकिन सत्ता के गलियारों की चर्चाए कुछ अलग ही कहानी लिख रही थी। शक्तिकेंद्र के धुरी में बैठकर अमन और मुकेश के कारण ही 15 साल की सत्ता 15 सीटों पर सिमटकर रह गई। इसके बाद समय बदला, सरकार बदली, चेहरे बदले, लेकिन चर्चा आज भी वही है कि सत्ता के भीतर असली सलाहकार कौन हैं और फैसलों के पीछे असली ताकत किसकी है।

बेमेतरा की हालिया घटना –
बेमेतरा में मुख्यमंत्री कन्या विवाह का योजना था कार्यक्रम में मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, मंत्रिमंडल और तमाम बड़े नेता मौजूद थे। इस कार्यक्रम में विधानसभा अध्यक्ष भी पहुंचे। बताया जाता है कि उन्हें करीब दो घंटे तक इंतजार करना पड़ा। उसके बाद जब स्पीकर साहब ने कलेक्टर और एसपी को सार्वजनिक रूप से प्रोटोकॉल का पाठ पढ़ाते हुए जमकर फटकार लगाई। बहाना गुलदस्ता देने का था, लेकिन संदेश प्रशासन को सीधा और साफ था।

मामला यहीं तक रहता तो शायद एक सामान्य प्रोटोकॉल विवाद माना जाता, लेकिन अगले ही दिन जब मुख्यमंत्री से इस विषय में सवाल पूछा गया तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कलेक्टर को उन्होंने ही निर्देश दिए थे। बस यहीं से राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का नया दौर शुरू हो गया। क्योंकि संदेश साफ था। जिन अधिकारियों को एक दिन पहले मंच से फटकार मिली थी, अगले दिन मुख्यमंत्री उन्हीं के समर्थन में खड़े दिखाई दिए। राजनीति में शब्दों से ज्यादा संकेतों की अहमियत होती है और इस संकेत को समझने वालों ने समझ लिया। लेकिन असली सवाल कुछ और है।

ढाई साल बाद आखिर अचानक अफसरशाही याद क्यों आई?
सवाल यह है कि ढाई साल बाद अचानक स्पीकर साहब क्यो इतना मुखर हो गए अचानक उन्हें अफसरशाही पर बोलना पड़ा? जबकिं उधर कार्यकर्ता शिकायत करते रहे, संगठन के लोग खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे थे। जब चुनाव लड़ाने वाले जमीनी कार्यकर्ता दरवाजों पर इंतजार करते रहे, तब यह पीड़ा इतनी मुखर क्यों नहीं हुई? जब संघ से जुड़े लोगों को किनारे लगाए जाने की चर्चा होती रही, जब सोशल मीडिया के जरिए संघ के लोगो पर 1500 करोड़ का कथित वीडियो सोशल मीडिया में घुमाया जा रहा था। तब प्रोटोकॉल का दर्द उतना तीखा क्यों नहीं था? जबकिं यह 1500 करोड़ का वीडियो अफसरशाही का संघ संगठन पर सीधा प्रहार था। अब जब खुद इंतजार करना पड़ा तो व्यवस्था की खामियां दिखाई देने लगीं। यह तो वही बात हुई कि जा तन लागे वो तन जाने।

पांचवी मंजिल और बगुला चाल –
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। पुराने दौर के शक्ति केंद्रों की चर्चा भले इतिहास बन गई हो, मगर आज भी सत्ता के गलियारों में दो नए किरदारों की चर्चा खूब होती है। एक पांचवीं मंजिल वाला वह साहब जो छोटे कद का है और दूसरा वह बगुला भगत जो चोंच निकाले खड़ा है। हाल ही में सीतापुर के एक विधायक पर दर्ज हुई एफआईआर ने सत्ता और संगठन के बीच खींचतान को सतह पर ला दिया। मामला राजस्व विभाग के एक अधिकारी से जुड़ा था। अधिकारी संघ हड़ताल पर चला गया, लेकिन जनता का वैसा समर्थन नहीं मिला जैसा सरकारी कर्मचारी संगठनों को अक्सर उम्मीद रहती है। कई जानकार मानते हैं कि यह विवाद बातचीत से भी सुलझ सकता था। मगर मामला सीधे एफआईआर तक पहुंच गया और इस एफआईआर के पीछे वही चेहरा बगुला भगत था जिसके निर्देश पर यह एफआईआर हुई और सत्ता संगठन के बीच फिर एक बार खींचतान खुलकर दिखलाई देने लगी। और यह मामला राजनीतिक रंग ले बैठा। संगठन का एक हिस्सा विधायक के साथ खड़ा दिखाई दिया, जबकि सत्ता का एक हिस्सा अलग रुख में नजर आया। यहीं से सवाल उठने लगे कि आखिर सलाह कौन दे रहा है? ऐसा ही एक विवाद दुर्ग जिले में भी देखने को मिला, जहां एक अधिकारी का निलंबन अधूरी जानकारी और वायरल वीडियो के आधार पर किए जाने की चर्चा रही। बाद में उस फैसले पर भी सवाल उठे। बताया जाता है कि निलंबन की सलाह इसी पांचवी मंजिल वाले साहब के निर्देश पर हुई और सत्ता पर सवाल उठने लगे।

मुख्यमंत्री की छवि एक सरल और सहज नेता की रही है। लेकिन सवाल यह है कि उनके आसपास बैठकर फीडबैक कौन तैयार कर रहा है? कौन है जो जमीन की वास्तविक स्थिति और सत्ता तक पहुंचने वाली जानकारी के बीच की दूरी तय कर रहा है? कौन है जो छोटे प्रशासनिक विवादों को राजनीतिक संकट में बदल देने वाली सलाह दे रहा है?

सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि एक पांचवीं मंजिल और एक बगुला भगत आज भी फैसलों की दिशा तय करने में प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं। चर्चा यह भी होती है कि इनमें से एक कभी परीक्षा विवादों को लेकर सुर्खियों में रहा, जबकि दूसरा पिछली सरकार के दौर में इतना प्रभावशाली माना जाता था कि उसके लिए पहले पद बनाया गया और फिर उस पद पर बैठाया गया। अब सच क्या है, यह सरकार और संबंधित लोग बेहतर जानते होंगे। लेकिन राजनीतिक गलियारों में उठ रहे सवालों को नकारना भी आसान नहीं है।

सबसे बड़ा सवाल चुनावी है। सरकार ढाई साल पूरे होने पर सुशासन का उत्सव मना रही है। दूसरी तरफ संगठन के भीतर असंतोष, कार्यकर्ताओं की नाराजगी, प्रशासनिक फैसलों पर उठते सवाल और सत्ता-संगठन के बीच बढ़ती दूरी की चर्चाएं भी लगातार चल रही हैं। चुनाव में न अफसर वोट डालते हैं और न फाइलें प्रचार करती हैं। चुनाव हमेशा कार्यकर्ता लड़ता है। वही पसीना बहाता है, वही झंडा उठाता है और वही जनता के बीच सरकार का चेहरा बनता है।

मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत छवि पर शायद ही किसी को संदेह हो। उन्हें एक कर्मठ, जुझारू और आदिवासी अंचल से निकलकर अपनी पहचान बनाने वाले नेता के रूप में देखा जाता है। लेकिन राजनीतिक चर्चा का केंद्र मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि उनके आसपास का वह सलाहकार तंत्र बनता जा रहा है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि पांचवीं मंजिल और बगुला भगत की बढ़ती भूमिका ने सत्ता और संगठन के बीच अनावश्यक दूरी पैदा कर दी है।

मसलन आज हालात यह है कि ढाई साल में ही अगर चुनाव हो जाये सरकार को 15 सीट पाना मुश्किल हो जाएगा। इसका जीता जागता उदाहरण है कि छत्तीसगढ़ निकाय में हुए उपचुनाव में 6 जगहों पर एक बड़े आंकड़े के साथ कांग्रेस ने जीत का परचम लहरा दिया जबकिं प्रदेश में भाजपा की सत्ता है और सत्ता होते हुए भी उपचुनाव ने मिली हार यह बताने के लिए काफी है कि हालात क्या है?

और अगर ऐसा ही चलता रहा सत्ता और संगठन के बीच संवाद की जगह दूरी बढ़ती गई, तो ढाई साल बाद तस्वीर कैसी होगी, यह सवाल केवल विपक्ष नहीं पूछ रहा, बल्कि सत्ता के भीतर भी कई लोग धीरे-धीरे पूछने लगे हैं। और शायद इसी वजह से इन दिनों सत्ता के गलियारों में एक ही कहावत सबसे ज्यादा सुनाई दे रही है

“जा तन लागे वो तन जाने…”।

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