विधानसभा का सबसे बड़ा सवाल सात पर गिरी गाज, एक को मिला अभयदान? एक ही भर्ती, एक ही सूची, फिर सुशांत राय क्यों बचे?

विधानसभा का सबसे बड़ा सवाल सात पर गिरी गाज, एक को मिला अभयदान? एक ही भर्ती, एक ही सूची, फिर सुशांत राय क्यों बचे?
रायपुर – अविभाजित मध्यप्रदेश से अलग होकर जब छत्तीसगढ़ राज्य बना था, तब उम्मीद थी कि नई व्यवस्था पारदर्शिता और सुशासन की नई इबारत लिखेगी। लेकिन बीते 25 वर्षों का इतिहास बताता है कि विधानसभा सचिवालय की भर्तियां शुरुआत से ही विवादों और सवालों के घेरे में रही हैं। यहां नियुक्तियों को लेकर उठे सवाल समय के साथ दबे जरूर, लेकिन खत्म कभी नहीं हुए।
पुराने अधिकारी बताते हैं कि विधानसभा में कई ऐसे चेहरे हैं जिनकी नियुक्तियां आज भी चर्चा का विषय हैं। कोई पुस्तकालय एवं शोध शाखा से सफर शुरू कर सचिव और फिर प्रमुख सचिव तक पहुंच गया, तो मौजूदा विधानसभा सचिव दिनेश शर्मा की नियुक्ति को लेकर भी समय-समय पर आरोप लगते रहे कि वे विश्वविद्यालय में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी रहने के बाद सीधी भर्ती के जरिए विधानसभा पहुंचे और आज सचिव की कुर्सी तक जा बैठे। लेकिन इन तमाम चर्चाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल सहायक मार्शलों की चर्चित सीधी भर्ती पर खड़ा होता है, जिसने अब फिर से राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है।
भर्ती सूची ने खोला सबसे बड़ा राज –
विधानसभा के आधिकारिक अभिलेख बताते हैं कि सहायक मार्शल के पद पर आठ लोगों की नियुक्ति हुई थी। सूची में सुशांत राय, प्रह्लाद कुमार सोनी, सुरेश कुमार, राजेश कुमार सिंह, मनीष चंद्राकर, दीपक अवस्थी, दिनेश कुमार सिंह ठाकुर और वीरेंद्र सिंह चंदेल के नाम दर्ज हैं। सबसे अहम तथ्य यह है कि आठों के सामने भर्ती का तरीका सिर्फ एक लिखा है सीधी भर्ती। यानी उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार सभी की नियुक्ति एक जैसी प्रक्रिया के तहत हुई।

हाईकोर्ट ने पूरी प्रक्रिया पर उठाए सवाल –
बिलासपुर हाईकोर्ट ने इस भर्ती की सुनवाई के दौरान पाया कि सहायक मार्शलों के पदों के लिए न तो सार्वजनिक विज्ञापन जारी किया गया, न योग्य उम्मीदवारों से आवेदन बुलाए गए और न ही अनिवार्य फिजिकल टेस्ट कराया गया। अदालत ने यह भी माना कि नियमित चयन प्रक्रिया का पालन किए बिना सीधे नियुक्ति आदेश जारी किए गए, जो समान अवसर के संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत था। न्यायालय ने इसे बैकडोर एंट्री की श्रेणी में माना और साफ कहा कि अवैध नियुक्तियों को नियमित नहीं किया जा सकता।
रिट अपील ने भी साफ कर दी तस्वीर –
उपलब्ध रिट अपील क्रमांक 243/2019 के रिकॉर्ड में स्वयं अपीलकर्ता ने दलील दी कि वह और अन्य छह लोग विधानसभा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किए गए थे, वर्षों तक सेवा कर चुके हैं और पदोन्नत भी हुए हैं, इसलिए उनकी नियुक्तियां समाप्त नहीं की जानी चाहिए। यानी न्यायालय के समक्ष भी यह मामला एक ही समूह और एक जैसी नियुक्ति प्रक्रिया का था। फिर सुशांत राय क्यों नहीं गए? यहीं से कहानी सबसे दिलचस्प और सबसे विवादित हो जाती है।
भर्ती सूची में सुशांत राय का नाम भी उसी सीधी भर्ती के तहत दर्ज है, लेकिन न्यायिक कार्रवाई के बाद जहां अन्य नियुक्तियों पर असर पड़ा, वहीं सुशांत राय आज भी सत्ता के गलियारों में प्रभावशाली भूमिका निभाते नजर आते हैं। वर्तमान में वे एक मंत्री के ओएसडी के रूप में कार्यरत बताए जाते हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब भर्ती प्रक्रिया एक थी, सूची एक थी और रिकॉर्ड में सभी के सामने सीधी भर्ती दर्ज है, तो सात लोगों की सेवाएं समाप्त होने के बाद सुशांत राय किस कानूनी या प्रशासनिक आधार पर व्यवस्था में बने रहे?
क्या अलग से निकला था विज्ञापन?
सुशांत राय की नियुक्ति के लिए अलग से विज्ञापन प्रकाशित किया गया था और वह भी ऐसे अखबार में जिसकी प्रतियां बेहद सीमित थीं। दावा किया जाता है कि उस अखबार को न आम लोगों ने देखा और न ही उसका व्यापक प्रसार था। यदि ऐसा हुआ, तो यह भी जांच का विषय बन सकता है कि भर्ती प्रक्रिया वास्तव में कितनी पारदर्शी थी। सुशांत राय के दस्तावेजों और जाति प्रमाण पत्र को लेकर भी गंभीर सवाल है।
जांच हुई तो मचेगा भूचाल?
विधानसभा लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ मानी जाती है। लेकिन यदि राज्य गठन के बाद हुई शुरुआती भर्तियों की कभी निष्पक्ष और व्यापक जांच होती है, तो मामला केवल कुछ कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगा। इसकी आंच उन प्रशासनिक फैसलों तक पहुंच सकती है, जिन्होंने वर्षों तक इस व्यवस्था को आकार दिया।
बहरहाल जब भर्ती सूची में आठों के सामने सीधी भर्ती दर्ज है, हाईकोर्ट ने उसी प्रक्रिया को नियमों के विपरीत माना, सात लोगों की सेवाएं समाप्त हो गईं, तो आखिर सुशांत राय किस विशेष अपवाद या संरक्षण के आधार पर आज भी व्यवस्था का हिस्सा बने हुए हैं? इस सवाल का जवाब केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता तय करेगा।










