संजीव तिवारी के एटमोसफिरिया से साइंस सेंटर तक बवाल! राजधानी की सरकारी जमीनों पर आखिर किसका कब्जा, कलेक्टर से लेकर निगम कमिश्नर पर लग रहे आरोप –

संजीव तिवारी के एटमोसफिरिया से साइंस सेंटर तक बवाल! राजधानी की सरकारी जमीनों पर आखिर किसका कब्जा, कलेक्टर से लेकर निगम कमिश्नर पर लग रहे आरोप –
रायपुर : – राजधानी रायपुर में इन दिनों दो ऐसे मामले सामने आए हैं, जिन्होंने सरकारी जमीनों की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ शासकीय तालाब की जमीन पर बने चर्चित रेस्टोरेंट एटमोसफिरिया को लेकर विवाद है, तो दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (साइंस सेंटर) को आवंटित जमीन पर नगर निगम द्वारा निर्माण कार्य कराए जाने का मामला सामने आया है। दोनों मामलों को जोड़कर देखा जाए तो सवाल सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यशैली का बन जाता है।
पहला मामला अमलीडीह स्थित रेस्टोरेंट एटमोसफिरिया को लेकर है। उक्त भूमि सरकारी रिकार्ड में तालाब के नाम से दर्ज है। दावा यह है कि धीरे-धीरे तालाब को पूरी तरह से पाट दिया गया। जमीन का स्वरूप बदलकर उक्त स्थान पर आज व्यवसायिक गतिविधिया संचालित की जा रही है। जहाँ देर रात तक शराब परोसा जाता है। इस पूरे मामले में जनसंपर्क विभाग में पदस्थ संजीव तिवारी (एस.के. तिवारी) का नाम सामने है जो वर्षों से जनसम्पर्क विभाग में पदस्थ रहकर एक पूरा साम्राज्य खड़ा कर लिया है। दस्तावेज बताते है कि रेस्टोरेंट का संचालन उनकी पत्नी सरिता तिवारी के नाम पर है जबकि परिवार की सदस्य श्रेष्टा तिवारी के नाम किराएनामे पर दर्ज है बताया जाता है इस अवैध कारोबार से तिवारी जी को हर महीने 1 लाख 67 हजार का किराया पहुँचता है और आरोप यह भी है जो जांच में अधिकारी जाते है उन्हें यही बैठाकर उन्हें शराब परोसकर उनका मुंह बंद कराया जाता है।

मामले की शिकायतें रायपुर कलेक्टर गौरव सिंह समेत कमिश्नर से की गई मामले में कमिश्नर ने अतिक्रमण हटाये जाने की कार्रवाही के निर्देश दिए मगर आज एक साल बाद भी यहाँ तालाब पर रेस्टोरेंट धड़ल्ले से चलाया जा रहा है कलेक्टर गौरव सिंह को इसकी सूचना पश्यात एक टीम जरूर पहुँची थी मगर सुत्र तस्दीक करते है कि यह टीम इसी रेस्टोरेंट में बैठकर वापस चली गई अब अंदर क्या बात हुई यह तो वही जानते होंगे मगर इसके बाउजूद कार्रवाही न होंना बताता कि कही न कही एक बड़ा लेनदेन करके मामले को रफा दफा कर दिया गया।

इधर दूसरा मामला इससे भी ज्यादा चौंकाने वाला है। छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि परिषद ने रायपुर नगर निगम को पत्र लिखकर स्पष्ट किया है कि खसरा क्रमांक 828/4 की 40.01 एकड़ भूमि परिषद को विधिवत आवंटित है और जीपीएस सर्वे, संयुक्त सीमांकन तथा राजस्व अभिलेखों के अनुसार नगर निगम द्वारा कराया जा रहा निर्माण परिषद की सीमा के भीतर आ रहा है। परिषद ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया है कि संयुक्त सीमांकन प्रतिवेदन 29 जनवरी 2024 को तहसीलदार रायपुर को भेजा जा चुका था और उसकी प्रति नगर निगम को भी उपलब्ध कराई गई थी। इसके बावजूद निर्माण कार्य जारी रहने पर परिषद ने आपत्ति दर्ज कराते हुए इसे रोकने का अनुरोध किया है।

यानी एक तरफ सरकारी विभाग लिखित रूप से कह रहा है कि उसकी जमीन पर निर्माण हो रहा है, दूसरी तरफ निर्माण कार्य चलता रहता है। इससे बड़ा सवाल और क्या हो सकता है?
राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में अब यह चर्चा भी तेज है कि बिना किसी उच्चस्तरीय संरक्षण के न तो शासकीय तालाब पर वर्षों तक व्यावसायिक गतिविधियाँ चल सकती हैं और न ही दूसरे सरकारी विभाग की भूमि पर निर्माण कार्य संभव है। कुछ सूत्र नगर निगम स्तर पर कथित आर्थिक लेन-देन और कमीशनखोरी के आरोप भी लगा रहे हैं। पूरे घटनाक्रम ने राजधानी के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है। सरकार एक ओर जल संरक्षण, पर्यावरण और वैज्ञानिक संस्थानों के विकास की बात करती है, वहीं दूसरी ओर यदि शासकीय तालाब पर निजी कारोबार और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद की भूमि पर निर्माण जैसे विवाद सामने आते हैं, तो आखिर जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

अगर यही निर्माण किसी आम नागरिक ने किया होता तो संभवतः नोटिस के बाद बुलडोजर भी पहुँच चुका होता। लेकिन यहाँ शिकायतें हैं, दस्तावेज हैं, सीमांकन रिपोर्ट है, सरकारी पत्राचार है, फिर भी कार्रवाई दिखाई नहीं देती। आज रायपुर का सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब तालाब की जमीन पर सवाल हैं, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद अपनी भूमि पर निर्माण का विरोध कर रही है, दस्तावेज मौजूद हैं और शिकायतें प्रशासन तक पहुँच चुकी हैं, तो आखिर कार्रवाई रुकी क्यों हुई है?
ऐसे में सवाल यह है कि यदि सरकारी जमीनें ही सुरक्षित नहीं रहीं, तो आने वाले समय में न तालाब बचेंगे, न शैक्षणिक संस्थान और न ही जनता का व्यवस्था पर भरोसा। अब देखना यह है कि सुशासन की सरकार इस गंभीर मसले में क्या कार्रवाही करता है या इसी तरह सिस्टम पर लोगो का भरोषा खत्म होता चला जायेगा।










