छत्तीसगढ़ में कानून-व्यवस्था पर सवाल क्या अपराधियों के मन से कानून का भय खत्म हो रहा है? बगुला की चोंच खाली कुर्सी और सवाल आखिर किस्से? सुशासन के ढाई बरस की हकीकत –

छत्तीसगढ़ में कानून-व्यवस्था पर सवाल क्या अपराधियों के मन से कानून का भय खत्म हो रहा है? बगुला की चोंच खाली कुर्सी और सवाल आखिर किस्से? सुशासन के ढाई बरस की हकीकत –

रायपुर : – बीते दिनों छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के भरतपुर-सोनहत इलाके से एक ऐसी खबर आई जिसने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया। रेत के कारोबार और वर्चस्व की लड़ाई में तीन लोगों को उनकी ही फॉर्च्यूनर गाड़ी में जिंदा जला दिया गया। जिस गांव की आबादी महज 827 है, वहां नेयूर नदी के तट पर रेत के स्टॉक और रॉयल्टी का विवाद इस हद तक पहुंच गया कि फैसला अदालत या प्रशासन ने नहीं, बल्कि आग की लपटों और मौत ने किया।

यह घटना इसलिए और भी विचलित करती है क्योंकि यह उस छत्तीसगढ़ में हुई, जिसे कभी शांति का टापू कहा जाता था।

लेकिन सवाल सिर्फ इस एक घटना का नहीं है। सवाल उस पूरी व्यवस्था का है जहां अपराधियों के हौसले बुलंद दिख रहे हैं और कानून का डर लगातार कमजोर पड़ता नजर आ रहा है।

कहानी यहीं से शुरू नहीं होती…
सरकार बने छह माह ही बीते थे कि बलौदाबाजार में कलेक्टर और एसपी कार्यालय हिंसा की आग में घिर गए। सरकारी दफ्तरों में तोड़फोड़ हुई, आगजनी हुई और पूरा प्रशासनिक अमला देखते रह गया। घटना के बाद अधिकारियों के तबादले जरूर हुए, लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी वहीं खड़ा है कि आखिर प्रदेश के खुफिया तंत्र को इसकी भनक पहले क्यों नहीं लगी?

इसके बाद कबीरधाम के लोहारीडीह में एक संदिग्ध मौत ने ऐसा बवाल खड़ा किया कि गुस्साई भीड़ ने पूर्व सरपंच रघुनाथ साहू के घर को आग के हवाले कर दिया। घर में मौजूद लोगों को बंधक बनाया गया, पुलिस पर पथराव हुआ और वरिष्ठ अधिकारियों तक को भीड़ के गुस्से का सामना करना पड़ा।

और फिर राजधानी रायपुर…
महज 72 घंटे के भीतर सात हत्याओं ने पूरे शहर को दहला दिया। जिस राजधानी को प्रदेश का सबसे सुरक्षित शहर माना जाता है, वहीं लगातार हुई वारदातों ने लोगों के मन में यह डर बैठा दिया कि अपराधियों के मन से कानून का भय कम होता जा रहा है।

पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और भाजपा विधायक धरमलाल कौशिक तक झपटमारों के निशाने पर आ गए। जब सत्ता पक्ष का वरिष्ठ जनप्रतिनिधि ही सुरक्षित नहीं है तो आम नागरिक कितना सुरक्षित होगा?

मामला चाहे आरंग में गौ-परिवहन के संदेह में तीन लोगों की मौत का हो, या रायगढ़ के तमनार में महिला पुलिसकर्मियों से अभद्रता, बिलासपुर में चाकूबाजी और लूट की बढ़ती घटनाएं, सिरगिट्टी में मासूम बच्चियों से दुष्कर्म, व्यापार विहार में दिनदहाड़े लूट, पचपेड़ी में हमला और बिरकोना रोड पर हथियारबंद वारदातों ने कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए।

जब हाईकोर्ट को पूछना पड़े…
चाकूबाजी का आलम यह रहा कि मामला सीधे हाईकोर्ट तक पहुंच गया। सात महीनों में 120 चाकूबाजी की घटनाएं, सात मौतें और 122 घायल। अदालत को सरकार से पूछना पड़ा कि खुलेआम बिक रहे घातक हथियारों पर रोक लगाने की रणनीति क्या है।

राजधानी रायपुर में भी मोहसिन गैंग और दूसरे गुट के बीच हिंसक झड़प, बैंक मित्र से लूट, गैस एजेंसी सुपरवाइजर से लूट, ट्रांसपोर्टर पर हमला, महिला से मारपीट और पारस नगर में चाकूबाजी जैसी घटनाओं ने सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए।

गृहमंत्री का जिला भी सवालों के घेरे में
कबीरधाम में राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त बिशेसर पटेल के वाहन पर हमला, कोमल वर्मा की हत्या, दीपक तिवारी का शव गिट्टी खदान में मिलना, चैन स्नैचिंग, घर जलाने की घटनाएं और धर्मांतरण विवाद ने यह सवाल खड़ा किया कि जब गृहमंत्री का जिला ही पूरी तरह सुरक्षित नहीं दिखता तो बाकी प्रदेश का क्या हाल होगा?

रायगढ़ में पुलिस हिरासत में मौत और शहर के बीचोंबीच महिला से चैन स्नैचिंग, कोरबा में पुलिस परिवार का न्याय के लिए सड़क पर उतरना, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में सर्राफा व्यापारी प्रदीप सोनी की गोली मारकर हत्या, पत्रकार पर हमला और नामजद आरोपियों का खुलेआम घूमना व्यवस्था की चुनौती को उजागर करता है।

सूरजपुर में चरित्र शंका के नाम पर महिला का सिर मुंडवाने की घटना हो या धमतरी में थाना प्रभारी पर मारपीट के आरोप, बेमेतरा में सामूहिक हमला हो या राजनांदगांव में चाकूबाजी की घटना लगातार घटनाएं चिंता बढ़ाती हैं। अप्रैल 2026 के दौरान दुर्ग, कोरिया, सरगुजा, रायपुर, कवर्धा, बिलासपुर, दंतेवाड़ा और राजनांदगांव समेत कई जिलों में सामने आए दुष्कर्म के मामलों ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया।

और इसी बीच चर्चा एक “बगुला भगत” की भी…
पुलिस महकमे में पिछले कई महीनों से आईपीएस तबादला सूची को लेकर लगातार अटकलों का बाजार गर्म रहा है। सत्ता और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि हाउस के भीतर एक ऐसा प्रभावशाली चेहरा है जिसे व्यंग्य में “बगुला भगत” कहकर संबोधित किया जाता है। कहा जाता है कि हाउस की कई महत्वपूर्ण फाइलें उसकी सहमति के बिना आगे नहीं बढ़तीं। इसकी वजह भी जानिए इस बगुले का पूरा सर्विस काल मंत्रियो के पीए के रूप में रहा है और यही से जब कानून व्यवस्था के फैसले आने लगे तो उम्मीद कितनी की जा सकती है। बताया जाता है कि लिस्ट से लेकर कानून व्यवस्था सबकी जवाबदेही मुख्यालय की दूसरी मंजिल से नही हाउस के भगत के दफ्तर से चलता है। आलोचक सवाल उठाते हैं कि यदि किसी अधिकारी का अधिकांश अनुभव फील्ड की बजाय सत्ता के केंद्रों में रहा हो तो प्रदेश की जमीनी कानून-व्यवस्था की चुनौतियों को समझने और उनसे निपटने की उसकी क्षमता पर भी स्वाभाविक रूप से प्रश्न खड़े होंगे।

कानून-व्यवस्था के बीच एक और सवाल भी चर्चा में है। बताया जाता है कि जिलों के पुलिस कप्तानों की पदस्थापना संबंधी फाइलें गृह मंत्री तक पहुंचती ही नहीं। कोंडागांव एसपी की नियुक्ति से शुरू हुई यह व्यवस्था आज तक जारी है। अगर ऐसा है तो सवाल उठना लाजिमी है कि जिस मंत्री की भूमिका नियुक्ति प्रक्रिया में सीमित हो, वह कानून-व्यवस्था पर प्रभावी पकड़ कैसे बनाए रखेगा? आखिर जवाबदेही किसकी तय होगी?

डीजीपी की कुर्सी और नेतृत्व का सवाल
सरकार बदलने के बाद तत्कालीन डीजीपी अशोक जुनेजा को सेवा विस्तार दिया गया। इसके बाद लंबे समय तक प्रदेश का पुलिस महकमा प्रभारी व्यवस्था के सहारे चलता रहा। और इस प्रभार पर वर्तमान डीजीपी अरुण देव गौतम रहे। पुलिस नेतृत्व की सर्वोच्च कुर्सी की अपनी संवैधानिक और प्रशासनिक अहमियत होती है, क्योंकि संकट की घड़ी में वही पूरे बल को दिशा देती है। लेकिन इतने बड़े-बड़े घटनाक्रमों और चर्चित अपराधों के बावजूद पुलिस नेतृत्व की ओर से अपेक्षित सार्वजनिक संदेश या स्पष्ट हस्तक्षेप कम दिखाई दिया। मसलन यह कहा भी जाता है कि सरकार चाहे किसी की रही हो कानून व्यवस्था संभालने वाली कुर्सी हर बार एक रबर स्टैम्प बनकर रह जाती है। तत्कालीन सरकार में तो एक राज्य पुलिस सेवा स्तर का अधिकारी डीजीपी की कुर्सी से ज्यादा पॉवर रखता था। अब सत्ता बदली तो पॉवर बदलकर एक बगुले के चोच में आ गया है। जनता को क्या मिला जनता सिर्फ चेहरे निहारती रहती है कि किसकी सत्ता में कौन सुपर पॉवर होता है।

यही महत्वपूर्ण सवाल है कि प्रदेश में डीजीपी की संस्था अपनी पूर्ण क्षमता और अधिकार के साथ काम कर पा रही है, या फिर यह कुर्सी केवल औपचारिकता तक सीमित होकर रह गई है।

आखिर सवाल किससे है?
अगर इन सभी घटनाओं को एक सूत्र में पिरोकर देखा जाए तो सवाल केवल अपराधियों का नहीं, बल्कि व्यवस्था और नेतृत्व का भी है। कानून-व्यवस्था का मूल्यांकन केवल अपराधियों की गिरफ्तारी से नहीं होता, बल्कि इस बात से होता है कि अपराध होने से पहले उन्हें रोका कितना गया और आम नागरिक अपने घर से निकलते समय खुद को कितना सुरक्षित महसूस करता है।

और शायद यही वजह है कि आज छत्तीसगढ़ के सामने सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा है कि क्या अपराधियों के मन से कानून का भय सचमुच खत्म हो रहा है? या फिर व्यवस्था की चूकें, नेतृत्व की कमजोरियां और निर्णय लेने में देरी उन्हें लगातार बेखौफ बना रही हैं। जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक “सुशासन” का दावा और ज़मीन पर दिखती हकीकत दोनों के बीच की दूरी बहस का विषय बनी रहेगी।

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