सत्ता की असली परीक्षा फाइलों में होती है, मंचों पर नहीं – राजीव लोचन श्रीवास्तव

सत्ता की असली परीक्षा फाइलों में होती है, मंचों पर नहीं – राजीव लोचन श्रीवास्तव

रायपुर : – लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह है कि सत्ता दिखाई देती है और जनता जानती है कि उसने किसे चुना है। लेकिन शासन की असली कहानी अक्सर मंच से दूर, फाइलों और बैठकों के बीच लिखी जाती है।
छत्तीसगढ़ जैसे उभरते राज्य में विकास की गति केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति से तय नहीं होती, बल्कि प्रशासनिक तंत्र की संवेदनशीलता और जवाबदेही से भी निर्धारित होती है। जब राजनीति दिशा देती है और प्रशासन उसे गति देता है, तभी व्यवस्था संतुलित रहती है।
लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब नीति और प्रक्रिया के बीच दूरी बढ़ने लगती है। निर्णय लेने की प्रक्रिया जटिल होती जाती है और जनता तक पहुँचने वाली योजनाएँ अपने उद्देश्य से भटकने लगती हैं। शासन का तंत्र जितना प्रभावी होता है, उतना ही उसे पारदर्शी भी होना चाहिए।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में संगठन और कार्यकर्ता केवल राजनीतिक संरचना का हिस्सा नहीं होते, बल्कि वे सरकार और समाज के बीच संवाद का जीवंत माध्यम होते हैं। यदि यह संवाद कमजोर पड़े, तो शासन की संवेदनशीलता भी प्रभावित होती है। आज प्रशासनिक दक्षता की चर्चा जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी जवाबदेही की संस्कृति भी है। अधिकारी नीति लागू करने वाले होते हैं, नीति निर्धारित करने वाले नहीं। यह अंतर जितना स्पष्ट रहेगा, लोकतंत्र उतना मजबूत रहेगा।
छत्तीसगढ़ की वर्तमान परिस्थितियाँ एक अवसर भी हैं और चेतावनी भी। अवसर इसलिए कि राज्य तेजी से आगे बढ़ रहा है, और चेतावनी इसलिए कि विकास का रास्ता तभी स्थायी होगा जब सत्ता, संगठन और प्रशासन एक-दूसरे के पूरक बनें, प्रतिस्पर्धी नहीं। शासन अंततः विश्वास से चलता है और विश्वास तब बनता है, जब जनता को यह महसूस हो कि निर्णय उसके लिए हो रहे हैं, उसके बिना नहीं।










