कबाड़ के पर्दे में कुर्सी का खेल योजनाओं की चुपचाप शवयात्रा”
जब ई-प्रणाली से चलने वाले अफसर को ई-निंदनीय बनाने की योजना रची जाए तो समझिए असली लड़ाई फाइलों की नहीं फाइनल कुर्सी की है।

“कबाड़ के पर्दे में कुर्सी का खेल योजनाओं की चुपचाप शवयात्रा”
जब ई-प्रणाली से चलने वाले अफसर को ई-निंदनीय बनाने की योजना रची जाए तो समझिए असली लड़ाई फाइलों की नहीं फाइनल कुर्सी की है।
राजधानी – छत्तीसगढ़ के ब्यूरोक्रेटिक गलियारों में इन दिनों एक नई कहानी चल रही है। दिखाया जा रहा है कि ग्रामीण औद्योगिक पार्क (RIPA) योजना पूरी तरह नाकाम हो गई है, मशीनें जंग खा रही हैं, और रोजगार उड़नछू हो गया है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि ये “खोजी खबर” तब आई जब कुर्सी की दौड़ में कुछ नाम सबसे ऊपर दौड़ रहे हैं। और सबसे ऊपर वो जिनकी पहचान रामवनपथ गमन योजना, ई-प्रणाली, शासनिक सरलता, और चुपचाप काम करने वाले मिज़ाज से रही है। अब ऐसे अफसर को सीधे नहीं घसीटा जा सकता, तो कहानी गढ़ी जा रही है। कबाड़ पर साजिश जहां असली निशाना RIPA नहीं, सीएस कुर्सी है।
RIPA की कब्र कौन खोद रहा है?
जिन RIPA पार्को में एक वक्त महिलाएं आजीविका से जुड़ रही थीं, आज वहीं ताले जड़े हैं। जिन मशीनों से गांव में उत्पादन शुरू हुआ था, वो आज धूल खा रही हैं। लेकिन क्या यह विफलता योजना की है, या राजनीतिक पलटी की? योजना बनाई गई, DPR बनी, केंद्र से भी समर्थन मिला, और तत्कालीन सरकार ने इसे मिशन मोड में चलाया। लेकिन नई सरकार आते ही, फंड बंद, यूनिट बंद, निगरानी बंद और फिर अखबारों में कहा गया “कबाड़ हो गया”। मतलब “लाश खुद बनाई, फिर पोस्टमार्टम में अफसरों को कटघरे में खड़ा कर दो” यही नया फार्मूला है।
मंत्री जी और बंसल बंधु फ़ाइलें नहीं, प्रचार ही प्रचार
अब आते हैं असली खेल पर वित्त मंत्री साहब, जो इन दिनों सोशल मीडिया पर बड़े व्यस्त हैं कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस, कभी इंस्टा रील, कभी लाइव सुझाव यात्रा। उनके विभाग से न तो रूरल इंडस्ट्री को नया जीवन मिला, न ही पुरानी योजनाओं को दोबारा खड़ा करने की कोशिश। RIPA की आलोचना हो रही है ।लेकिन सवाल ये है कि
“आपने क्या किया? या सिर्फ कैमरा घुमाया?”
बंसल बंधु एक फाइलें मैनेज करता है, दूसरा खबरें
मुकेश बंसल, जो वित्त से जुड़े हर फंड के “मुख्य द्वारपाल” हैं उनकी निगरानी में RIPA का बजट धीरे-धीरे सूखा। और रजत बंसल, जो “जितने अफसर, उतनी सरकारें” सिद्धांत के विशेषज्ञ हैं उनकी भूमिका भी मीडिया में “सूचना नियोजन” के संदर्भ में देखी जा रही है।
इन दोनों को अब लोग “बंसल बंधु” कहने लगे हैं। एक मौन में कटौती करता है, दूसरा छपाई में चतुराई दिखाता है। क्योंकि अफसर अगर लोकप्रिय हो जाए, तो नेता अप्रासंगिक लगने लगता है। यही असली डर है।”
इधर एक चुप अफसर, जिसकी ई-प्रणाली अब ‘ई-चर्चा’ में
राज्य के जिन वरिष्ठ अफसरों ने पंचायत, ग्रामोद्योग और विकास योजनाओं को डिजिटली ट्रांसफॉर्म किया, जिनके कार्यकाल में रामवनपथ गमन योजना, ऑनलाइन पंचायत पोर्टल, प्रशासनिक निगरानी प्रणाली, और ग्रामीण संरचना को नई दिशा दी गई उनकी तरफ अब इशारे हो रहे हैं। लेकिन सवाल यह है
“क्या यह हमला योजनाओं पर है, या योजनाकार पर? “क्या निशाना वो अफसर हैं जो CS के लिए उपयुक्त माने जा रहे हैं?”
सरकार की चुप्पी, नेतृत्व का लकवा
सबसे बड़ी चिंता की बात है जब एक पूरी योजना खत्म हो रही हो, रोजगार रुक रहा हो,
तो सरकार क्या कर रही है? मुखिया की चुप्पी अब नीतिगत लकवे में बदल रही है।
निर्णय टलते जा रहे हैं, और “विकास” नामक शब्द अब केवल एक चुनावी नारा बन कर रह गया है।
DMF डायरी की दास्तान – फाइलें गुम नहीं, गुमराह की जा रही हैं!
जब योजना चल रही थी, तब जमीनी काम के नाम पर DMF और CSR फंड की बहार थी। कलेक्टरों की बैठक में अनुमोदन होता, पार्को के लिए खर्च तय होते, और जिला प्रशासन मॉडल यूनिट्स के नाम पर टारगेट भेजता। कई जिलों में तो यह फंड इतना “लचीला” साबित हुआ कि जब तक मशीनें आतीं, रिपोर्ट पहले छप जाती।
कोरबा, महासमुंद, बस्तर जैसे ज़िलों में ऐसे उदाहरणों की भरमार है। प्रशिक्षण से पहले उद्घाटन और उत्पादन से पहले प्रचार की परंपरा तब भी चल रही थी। अब सवाल यह है क्या योजना ही फेल थी, या फंड का फ्लो ही कभी नियंत्रण में नहीं रहा? बस्तर संभाग में जिन जिलों में नारीशक्ति केंद्रों और कुटीर उद्योगों के नाम पर करोड़ों का DMF और CSR पैसा बहा, वहाँ उस दौर के मौन प्रशासक अब दूसरी जिम्मेदारियों में हैं। महासमुंद, कोरबा, कांकेर, दंतेवाड़ा हर जगह नाम अलग पर नियोजन एक जैसा था। कुछ अफसरों ने तो “दिखावटी ड्रोन रिपोर्ट” बनवाकर DMF से मशीनें खरीदीं और ग्रामीणों को “रोज़गार गारंटी” का झुनझुना थमाया। फिर सरकार बदली, तो वो सब “कबाड़” बन गया, और दोष उन्हीं पर मढ़ दिया गया जिन्होंने सिस्टम को सिस्टमेटिक बनाने की कोशिश की थी। योजना नहीं, नियोजन और निगरानी की साजिशें असली गुनहगार थीं। जो कलेक्टर कभी “रीपा की शान” कहलाते थे, वही आज “रीपा की थकान” का ठीकरा अफसरशाही पर फोड़ रहे हैं। “रीपा की चुप्पी में कुर्सी की खड़खड़ाहट साफ़ सुनाई दे रही है। फाइलें गुम नहीं, गुमराह की जा रही हैं। शायद उन्हें यह याद दिलाने की ज़रूरत है DMF कोई छूट का चैक नहीं, जवाबदेही का दस्तावेज़ होता है।
मीडिया कब तक बनेगा साजिशों का औजार?
आजकल पत्रकारिता जमीन की सच्चाई नहीं,
फाइलों की लीकेज से तय होती है। “छपवा दो कि योजना फेल हो गई. “ताकि जो अफसर कुर्सी के नज़दीक है, वो दूर हो जाए पत्रकारिता को अब यह तय करना होगा कि वो लोकतंत्र की प्रहरी है या पर्चे की प्रॉपर्टी।
अगर आज योजनाएं कबाड़ हो रही हैं, तो जिम्मेदार वो हैं जो उन्हें चलाना छोड़ चुके हैं। अगर अफसर सवालों में हैं, तो उनके जवाब सरकार के फैसलों में छुपे हैं। और अगर लक्ष्य कुर्सी है, तो लड़ाई फाइल से नहीं, फर्ज़ से लड़नी चाहिए। योजनाएं मरी नहीं मारी गई हैं। अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार है, बस मुहर लगाने वाला खोजा जा रहा है।
अंत में वित्त मंत्री जी के लिए एक लाइन-
“तीन करोड़ सुझावों से पहले एक सुझाव मान लीजिए मंत्री जी जो योजना चल रही हो, उसे पहले चलने दीजिए। प्रचार तो बाद में भी हो जाएगा!”










