PHQ का संविदा मॉडल सवालों में , FSL विवाद से खुलती परतें, रिटायर अफसरों की वापसी, नियमों पर बहस और सिस्टम के भीतर चल रहे विशेष नेटवर्क की चर्चा तेज –

कही अनकही बातें -

PHQ का संविदा मॉडल सवालों में , FSL विवाद से खुलती परतें, रिटायर अफसरों की वापसी, नियमों पर बहस और सिस्टम के भीतर चल रहे विशेष नेटवर्क की चर्चा तेज –

रायपुर : – प्रदेश पुलिस मुख्यालय यानी PHQ इन दिनों सिर्फ कानून-व्यवस्था संचालन का केंद्र नहीं, बल्कि संविदा नियुक्तियों और पोस्ट-रिटायरमेंट एडजस्टमेंट के बढ़ते मॉडल को लेकर भी चर्चाओं में है। राज्य फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) में हुई एक संविदा नियुक्ति ने अब पूरे सिस्टम के भीतर चल रहे उस ढांचे को सामने ला दिया है, जिसकी चर्चा लंबे समय से दबी आवाज़ में होती रही है।

मामला उस नियुक्ति से जुड़ा है जिसमें आरोप लगाया जा रहा है कि जिस पद के लिए M.Sc, PhD और लगभग 15 वर्ष का वैज्ञानिक अनुभव जरूरी बताया गया, वहां रिटायर अधिकारी सुशील द्विवेदी को संविदा नियुक्ति दे दी गई, जबकि विभागीय चर्चाओं और उपलब्ध जानकारियों के अनुसार उनका शैक्षणिक बैकग्राउंड Arts (MA) से जुड़ा बताया जाता है। यहीं से सवाल उठने लगे कि आखिर FSL जैसी वैज्ञानिक संस्था में नियुक्ति का आधार क्या है? क्या यह वैज्ञानिक योग्यता है या सिस्टम से निकटता?

दरअसल FSL कोई सामान्य प्रशासनिक कार्यालय नहीं है। यह वही संस्था है जिसकी रिपोर्ट हत्या, साइबर अपराध, विस्फोट, नार्कोटिक्स, डीएनए और डिजिटल फॉरेंसिक मामलों में अदालत के सामने वैज्ञानिक साक्ष्य के रूप में रखी जाती है। नए आपराधिक कानून BNSS लागू होने के बाद फॉरेंसिक जांच की भूमिका और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो चुकी है। ऐसे में यदि लैब नेतृत्व की योग्यता पर ही सवाल उठ जाएं तो उसका असर सीधे जांच और न्यायिक विश्वसनीयता पर पड़ सकता है।

फॉरेंसिक विशेषज्ञों का साफ कहना है कि FSL कोई फाइल मैनेजमेंट का दफ्तर नहीं, यह वैज्ञानिक निर्णयों पर चलने वाली संस्था है। यहां नेतृत्व का तकनीकी रूप से सक्षम होना अनिवार्य है। लेकिन अब चर्चा सिर्फ एक नियुक्ति तक सीमित नहीं है। पुलिस मुख्यालय और गृह विभाग के भीतर यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या PHQ धीरे-धीरे संविदा कॉरिडोर में बदलता जा रहा है?

सूत्र बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में रिटायर अधिकारियों की संविदा वापसी, सलाहकार मॉडल, विशेष पदों पर अनुबंध आधारित नियुक्तियां, और नियमित कैडर को किनारे रखकर विशेष चयन लगातार बढ़े हैं। विभाग के भीतर कई अधिकारी यह भी कह रहे हैं कि जिन वैज्ञानिक और तकनीकी अधिकारियों ने वर्षों तक लैब और जांच इकाइयों में काम किया, वे प्रमोशन और अवसर का इंतजार करते रह जाते हैं, जबकि रिटायरमेंट के बाद कुछ चेहरे सीधे नई कुर्सियों पर बैठ जाते हैं।

इसी कड़ी में पूर्व IG बी.एस. ध्रुव का नाम भी चर्चा में है। वे अप्रैल 2024 में सेवानिवृत्त हुए थे और बाद में उन्हें PHQ में OSD के रूप में संविदा जिम्मेदारी दिए जाने की जानकारी सार्वजनिक डोमेन में सामने आई। इससे विभागीय हलकों में यह बहस और तेज हुई कि क्या रिटायरमेंट के बाद प्रभावशाली अधिकारियों की पुनर्वापसी अब एक स्थायी प्रशासनिक मॉडल बनती जा रही है।

पूर्व DIG कमल लोचन कश्यप का नाम भी इसी संदर्भ में चर्चाओं में लिया जा रहा है। विभागीय गलियारों में यह चर्चा लंबे समय से है कि प्रभावशाली अधिकारियों की संविदा वापसी और विशेष पदस्थापन का एक समानांतर ढांचा विकसित हुआ है। समर्थक इसे अनुभव का उपयोग बताते हैं, जबकि आलोचक इसे सीमित प्रभावशाली नेटवर्क का हिस्सा मानते हैं।

इसी बहस के बीच पूर्व DGP स्तर के चर्चित अधिकारी मुकेश गुप्ता का नाम भी बार-बार उदाहरण के तौर पर लिया जा रहा है। मुकेश गुप्ता उन अधिकारियों में रहे जिनका प्रशासनिक प्रभाव लंबे समय तक चर्चा में रहा। उनके सेवा, पदोन्नति और सेवानिवृत्ति से जुड़े फैसले कई वर्षों तक राजनीतिक और कानूनी बहस का विषय बने रहे। विभागीय हलकों में अक्सर यह उदाहरण दिया जाता है कि छत्तीसगढ़ में कुछ प्रभावशाली अधिकारियों का असर रिटायरमेंट के बाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं होता।

मुकेश गुप्ता से जुड़े सेवा और पदोन्नति विवादों की चर्चा जब भी होती है, तब तत्कालीन सत्ता व्यवस्था में प्रभावशाली माने जाने वाले नौकरशाह अमन सिंह का नाम भी प्रशासनिक हलकों में अक्सर लिया जाता रहा है। रमन शासनकाल में उन्हें बेहद प्रभावशाली अधिकारियों में गिना जाता था। वर्तमान में वे कॉरपोरेट क्षेत्र से जुड़े बताए जाते हैं। साथ ही प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा भी लगातार रही है कि प्रभावशाली नौकरशाही दौर में विशेष नियुक्तियों और भरोसेमंद अधिकारियों के नेटवर्क को मजबूती मिली। हालांकि किसी विशेष अधिकारी को लेकर इसका प्रत्यक्ष आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक नहीं है, लेकिन सत्ता और प्रशासनिक समीकरणों के बीच करीबी तालमेल की चर्चाएं वर्षों से होती रही हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल भर्ती नियमों को लेकर खड़ा हो गया है। यदि किसी पद के लिए स्पष्ट योग्यता निर्धारित है, तो क्या उसे विशेष परिस्थिति बताकर बदला जा सकता है? और यदि विभाग में योग्य अधिकारी पहले से मौजूद हैं, तो फिर संविदा मॉडल की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? कई विभागीय अधिकारी दबी आवाज़ में यह भी कह रहे हैं कि PHQ में अब रेगुलर सिस्टम और स्पेशल सिस्टम समानांतर चल रहे हैं। एक तरफ नियमों के तहत वर्षों सेवा करने वाले अधिकारी हैं, दूसरी तरफ वे चेहरे जो रिटायरमेंट के बाद भी प्रभावशाली पदों तक पहुंच बना लेते हैं।

FSL विवाद के बाद अब यह मांग भी उठने लगी है कि पूरी नियुक्ति प्रक्रिया सार्वजनिक की जाए, भर्ती नियमों की कॉपी सामने लाई जाए, चयन समिति और प्रक्रिया का खुलासा हो, और यह बताया जाए कि संविदा नियुक्ति किन विशेष आधारों पर दी गई। क्योंकि सवाल अब सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं रह गया है। सवाल उस पूरे ढांचे का है जहां तकनीकी संस्थानों में भी प्रशासनिक प्रभाव, संविदा संस्कृति और नेटवर्क आधारित नियुक्तियों की चर्चा खुलकर होने लगी है। और सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस लैब की रिपोर्ट पर अदालतें फैसला सुनाती हैं, यदि उसकी नियुक्तियों पर ही सवाल उठने लगें, तो क्या आने वाले समय में अदालतों में उन रिपोर्टों की विश्वसनीयता भी कटघरे में खड़ी होगी?

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