जब अपनों ने छोड़ा साथ, तब इंसानियत बनी सहारा

जब अपनों ने छोड़ा साथ, तब इंसानियत बनी सहारा

रायपुर : – आधुनिकता और भागदौड़ भरी जिंदगी में आज इंसान कहीं न कहीं अपने संस्कारों और रिश्तों की गरिमा को पीछे छोड़ता जा रहा है। जिस माँ ने अपने बच्चों को जन्म देकर हर पीड़ा सहन की और जिस पिता ने परिवार की खुशियों के लिए जीवनभर संघर्ष किया, वही माता-पिता आज अपने ही घरों में उपेक्षा और अकेलेपन का जीवन जीने को मजबूर दिखाई दे रहे हैं।

समाज की सबसे पीड़ादायक तस्वीर तब सामने आती है, जब किसी बुजुर्ग के निधन के बाद उनके अंतिम संस्कार के लिए भी परिवार का कोई सदस्य आगे नहीं आता। ऐसे कठिन समय में यदि कोई सामाजिक संस्था आगे बढ़कर उस असहाय व्यक्ति का अंतिम संस्कार करती है, तो वह केवल सेवा नहीं बल्कि मानवता का सर्वोच्च उदाहरण बन जाता है। इसी मानवीय भावना के साथ Suwani Sikhasn Samiti ने कई असहाय और त्यागे गए बुजुर्गों के अंतिम संस्कार कर समाज के सामने संवेदनशीलता और इंसानियत की मिसाल पेश की है। इन अंतिम संस्कारों में मुखाग्नि देने का साहसिक एवं भावुक दायित्व श्याम तिवारी ने निभाया, जिसने यह साबित किया कि इंसानियत आज भी जीवित है।

इस पुनीत कार्य में संस्था प्रमुख रेखा आहूजा का विशेष मार्गदर्शन और सहयोग रहा। वहीं सतराम जेठमलानी, सुभाष घई , राजेश तिवारी एवं सिप्पी मिश्रा ने भी इस मानवीय सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सभी ने मिलकर यह संदेश दिया कि रिश्ते केवल खून से नहीं, बल्कि संवेदनाओं, सम्मान और मानवता से भी बनते हैं।
समाज के लिए यह एक गंभीर चिंतन का विषय है कि जिसने जीवनभर अपने परिवार के लिए संघर्ष किया, अंत समय में उसकी अर्थी को कंधा देने वाला भी कोई अपना न हो। इससे अधिक दुखद स्थिति शायद कोई और नहीं हो सकती।

आज आवश्यकता केवल वृद्धाश्रम बनाने की नहीं, बल्कि अपने भीतर माता-पिता के प्रति प्रेम, सम्मान और संवेदनाएं जागृत करने की है। क्योंकि जिस दिन समाज अपने बुजुर्गों का सम्मान करना छोड़ देगा, उस दिन मानवता केवल शब्द बनकर रह जाएगी।

हमें यह याद रखना होगा 
“माँ-बाप केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि ईश्वर का सबसे अनमोल आशीर्वाद हैं।”

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