सॉफ्टवेयर, सप्लाई और सत्ता का साइलेंट सिंडिकेट? महिला बाल विकास विभाग में परिवार मॉडल पर उठते सवाल –

सॉफ्टवेयर, सप्लाई और सत्ता का साइलेंट सिंडिकेट? महिला बाल विकास विभाग में परिवार मॉडल पर उठते सवाल –

रायपुर : – सुशासन, पारदर्शिता और डिजिटल सिस्टम के बड़े-बड़े दावों के बीच महिला बाल विकास विभाग से जुड़ी एक ऐसी कहानी अब बाहर आने लगी है, जिसकी गूंज रायपुर से निकलकर दिल्ली तक पहुंचने की चर्चा में है। यह कहानी किसी एक टेंडर, एक खरीदी या एक फाइल की नहीं बल्कि उस पूरे नेटवर्क की है। जहाँ सरकारी कुर्सी, पारिवारिक फर्म, सप्लायर लॉबी और डिजिटल प्रोजेक्ट्स एक-दूसरे में ऐसे उलझते दिखाई दे रहे हैं और विभागीय गलियारों में लोग अब खुलकर कहने लगे हैं कि फाइलों में विभाग चलता था लेकिन असली सिस्टम कहीं और से ऑपरेट हो रहा था।

चर्चा एक ऐसे अधिकारी की है, जिनका परिवार राजधानी के श्याम टॉकीज के पास रहने वाला बेहद संपन्न और पुराने कारोबारी नेटवर्क वाला परिवार माना जाता है। बर्तन और होम एप्लाइंसेस कारोबार में पहले से मजबूत पकड़ रखने वाले इस परिवार के बारे में कहा जाता है कि सिस्टम की नब्ज पकड़ने में इन्हें महारत हासिल है। लेकिन असली खेल तब शुरू हुआ जब विभाग में उनका सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी जुलाई 2025 में रिटायर हुआ। उसके बाद अंदरखाने कहा जाने लगा कि वर्षों से दबा बैठा नेटवर्क अचानक खुलकर मैदान में आ गया और अधिकारी ने अपना अभय रूप दिखाना शुरू कर दिया।

इसके बाद विभाग की खरीदी शाखा, आंगनबाड़ी सप्लाई, मातृ वंदना योजना, वेबसाइट, ऐप, डेटा मैनेजमेंट और आईटी प्रोजेक्ट्स तक में एक खास नेटवर्क का प्रभाव तेजी से बढ़ता चला गया। बाजार में चर्चा यह है कि विभाग से जुड़े कई सप्लायर्स के साथ साइलेंट शेयर मॉडल तैयार किया गया जहाँ सामने नाम किसी और का दिखाई देता था लेकिन हिस्सेदारी और नियंत्रण कहीं और से चलता था।

इसी बीच सबसे ज्यादा चर्चा उस सॉफ्टवेयर कंसल्टेंसी की हो रही है जो 2024 में अधिकारी ने अपने सुपुत्र को गौरव प्रदान करते हुए शुरू करवाई। बेहद कम समय में इस फर्म ने विभाग के डिजिटल सिस्टम में ऐसी एंट्री ली कि वेबसाइट, ऐप, तकनीकी सेवाएं, डेटा प्रबंधन और सॉफ्टवेयर आधारित मॉनिटरिंग से जुड़े कई काम एक सीमित दायरे में सिमटते चले गए। कहा जाता है कि सुपुत्र सिर्फ एक नहीं बल्कि दो कंपनियों के डायरेक्टर हैं जिनमें अधिकारी के अजेय-विजय कहे जाने वाले भाई भी शामिल बताए जाते हैं।

इन फर्मों के नाम भी बाजार में विक्टर और विक्ट्री जैसे नामों से चर्चित बताए जा रहे हैं। अब सवाल उठ रहा है कि आखिर कैसे एक ही परिवार और उससे जुड़े नेटवर्क को विभागीय डिजिटल प्रोजेक्ट्स में इतनी तेज़ और मजबूत एंट्री मिली? क्या यह सिर्फ तकनीकी दक्षता थी या फिर सिस्टम के भीतर पहले से बिछा कोई ऐसा तंत्र जहाँ फाइल खुलने से पहले ही मंजिल तय हो जाती थी?

लेकिन कहानी सिर्फ सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं है। चर्चा यह भी है कि होम एप्लाइंसेस और बर्तन कारोबार को रिलेशन मैनेजमेंट मॉडल की तरह इस्तेमाल किया गया। बड़े अधिकारियों और महिला सचिवों तक पहुंच बनाने के लिए घरेलू उपकरणों, डिजिटल सेटअप और टेक्नोलॉजी अपग्रेड का इस्तेमाल हुआ और फिर उन्हीं रिश्तों के जरिए विभागीय कामों का रास्ता तैयार किया गया। विभागीय गलियारों में तो यहां तक कहा जा रहा है कि होम एप्लाइंसेस की दुकान से शुरू हुई सप्लाई धीरे-धीरे आला अफसरों के घरों तक पहुंच गई और वहीं से फाइलों के रास्ते भी खुलते चले गए।

विभाग के भीतर महिला संचालकों, सचिवों और जिलों तक मजबूत ताल्लुकात दिखाकर काम निकलवाने के इनके किस्से लंबे समय से चर्चा में बताए जाते हैं। कई अधिकारियों के बीच यह धारणा भी बन चुकी है कि विभाग में सिर्फ नियम और प्रक्रिया जानना काफी नहीं बल्कि सही नेटवर्क में होना ज्यादा जरूरी माना जाता था।

विभागाध्यक्ष कार्यालय की दो महिला उपसंचालकों और इस चर्चित अधिकारी की तिकड़ी भी लंबे समय से बाजार और मंत्रालय में चर्चा का विषय बताई जाती है। कहा जाता है कि जिलों से काम निकलवाने, सप्लायर सेटिंग, खरीदी प्रक्रिया और फाइलों की गति तय करने में इस नेटवर्क की पकड़ बेहद मजबूत रही है। कई सप्लायर्स बंद कमरों में यह कहते सुने जाते हैं कि विभाग में बड़े काम लेने के लिए टेंडर से ज्यादा ताल्लुकात मायने रखते थे।

चर्चा यह भी है कि जो खरीदी, सप्लाई या प्रोजेक्ट आसानी से निकल जाए उसका श्रेय सीधे मंत्री बंगले तक अपनी पकड़ बताकर लिया जाता है। और जो मामला विवादों में फंस जाए उसका ठीकरा प्रशासनिक विभाग, सचिवालय या ऊपर बैठे अधिकारियों पर फोड़ दिया जाता है। हाल ही में एक आदिवासी अवर सचिव का तबादला भी अंदरखाने इसी तकनीक का हिस्सा बताया जा रहा है जहाँ पूरा दबाव बनाकर बाद में खुद को अलग कर लिया गया।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या महिला और बाल विकास जैसे संवेदनशील विभाग में सरकारी पद का इस्तेमाल निजी नेटवर्क खड़ा करने के लिए किया गया? क्या विभागीय प्रभाव के सहारे पारिवारिक फर्मों और करीबी सप्लायर्स को फायदा पहुंचाया गया? और क्या यही वजह रही कि विभाग में धीरे-धीरे अफसर और सप्लायर के बीच की रेखा धुंधली होती चली गई?

क्योंकि बाजार में अब खुलकर यह लाइन बोली जा रही है कि अफसर सरकारी कुर्सी पर बैठा रहा लेकिन काम सप्लायर की तरह चलता रहा। अगर इन फर्मों, सप्लायरों, डिजिटल प्रोजेक्ट्स, खरीदी आदेशों, भुगतान फाइलों, मातृ वंदना और आंगनबाड़ी से जुड़े कार्यों, तथा नेटवर्क कनेक्शनों की निष्पक्ष जांच हो जाए तो क्या सिर्फ तकनीकी अनियमितताएं सामने आएंगी? या फिर करोड़ों के उस साइलेंट सिंडिकेट का पूरा चेहरा भी बाहर आएगा जिसकी चर्चा अभी सिर्फ फुसफुसाहटों में जिंदा है।

सवाल अब सिर्फ एक अधिकारी या एक फर्म का नहीं रह गया है। सवाल उस सिस्टम का है जहाँ महिला और बाल विकास जैसे संवेदनशील विभाग में अगर सप्लायर, सॉफ्टवेयर और सिस्टम एक ही परिवार और नेटवर्क के इर्द-गिर्द घूमने लगें तो मामला सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं पूरे प्रशासनिक ढांचे की विश्वसनीयता का बन जाता है।

अब देखना यह है कि श्याम टॉकीज से शुरू हुआ यह अभय अस्त्र मंत्रालय की दीवारों के भीतर कब तक असर दिखाता है और जांच की रोशनी पड़ते ही कितने विक्टर और विक्ट्री सामने आते हैं। फिलहाल रायपुर से दिल्ली तक एक ही सवाल तैर रहा है क्या यह सिर्फ डिजिटल मॉडर्नाइजेशन था या फिर सिस्टम के भीतर खड़ा किया गया एक ऐसा परिवार मॉडल जहाँ सरकारी विभाग, निजी कारोबार, सप्लायर नेटवर्क और सत्ता की पहुंच एक साथ चलती रही?

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