नीति या खेल? प्लास्टिक फैसले ने सुखाया बाजार, 15 दिन में 500 करोड़ का झटका, पांचवीं मंज़िल से राजनांदगांव तक सवाल

नीति या खेल? प्लास्टिक फैसले ने सुखाया बाजार, 15 दिन में 500 करोड़ का झटका, पांचवीं मंज़िल से राजनांदगांव तक सवाल
रायपुर : – शराब नीति में किया गया प्लास्टिक वाला बदलाव का असर अब सीधे जमीन पर असर दिखा रहा है। जो फैसला कागज पर सिस्टम सुधार के तौर पर पेश किया गया था, उसने महज 15 दिनों में करीब 500 करोड़ रुपये का नुकसान खड़ा कर दिया है और बाजार में सप्लाई की रीढ़ तोड़ दी है। प्रदेश की करीब 800 दुकानों तक सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। कई जगह स्टॉक एक-तिहाई पर सिमट गया है, तो कई दुकानों में पसंदीदा ब्रांड पूरी तरह गायब हैं। हालात यह हैं कि रोज कतारें लंबी हो रही हैं, लेकिन बोतलें कम पड़ रही हैं।
इस अव्यवस्था की सबसे बड़ी वजह वही प्लास्टिक बोतल वाला फैसला बना, जिसे लागू तो कर दिया गया, लेकिन उसकी तैयारी अधूरी थी। डिस्टिलरियों को नई व्यवस्था के तहत अनुमति मिलने में ही करीब 10 दिन लग गए, जिससे उत्पादन और बॉटलिंग ठप जैसी स्थिति में पहुंच गए। नतीजा सप्लाई चेन टूट गई।इसका सीधा असर राजस्व पर पड़ा। अनुमान है कि राज्य को रोजाना करीब 70 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। खासकर देसी और सस्ती अंग्रेजी शराब का सेगमेंट सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है, जहां मांग लगातार बनी रहती है।
लेकिन कहानी सिर्फ यहीं तक नहीं है। इस पूरे फैसले के पीछे अब सवाल सिर्फ तैयारी पर नहीं, बल्कि तय करने वाली जगह पर भी उठने लगे हैं। राजधानी की वह चर्चित जगह पांचवीं मंज़िल, जहाँ एक छोटे कद काठी वाला अधिकारी बैठता है। यहाँ फाइलें कम और फैसले ज्यादा बनते हैं, यह जगह एक बार फिर चर्चा में है। क्योंकि जमीन पर जो हालात हैं, वह सिर्फ तकनीकी गलती नहीं लगते।
इस पूरे बदलाव में राजनांदगांव से जुड़े एक प्रभावशाली शराब कारोबारी का नाम भी धीरे-धीरे चर्चा में आ रहा है। कहा जा रहा है कि प्लास्टिक शिफ्ट के इस फैसले में किसे फायदा और किसे नुकसान होगा यह गणित पहले से तय था। प्लास्टिक बोतलों की अनिवार्यता ने जहां एक तरफ पूरी इंडस्ट्री को अचानक बदलाव के लिए मजबूर कर दिया, वहीं दूसरी तरफ उत्पादन लागत में भारी इजाफा हुआ।
प्लास्टिक रॉ-मैटेरियल के दाम 40 से 70% तक बढ़े –
नई बॉटलिंग लाइन और सेटअप पर अतिरिक्त निवेश , सप्लाई में देरी से स्टॉक ब्लॉकेज ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स लागत में बढ़ोतरी यानी सिर्फ सरकारी राजस्व ही नहीं, बल्कि पूरी सप्लाई चेन आर्थिक दबाव में आ गई।
हालात इतने बिगड़े कि आखिरकार फिर से कांच की बोतलों में सप्लाई की अनुमति देनी पड़ी, लेकिन तब तक बाजार का संतुलन बिगड़ चुका था।
बार-बार बदलते फैसलों ने लॉजिस्टिक्स सिस्टम को और उलझा दिया। जमीनी तस्वीर अब साफ है बड़े शहरों में लंबी कतारें छोटे शहरों में सप्लाई का संकट , दुकानों में सीमित विकल्प और अवैध बाजार के पनपने की आशंका अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि प्लास्टिक बोतल सही थी या गलत। सवाल यह है कि क्या यह फैसला पूरी तैयारी के साथ लिया गया था… या फिर कहीं और बैठकर ऐसा समीकरण बनाया गया, जिसमें सिस्टम बाद में और लाभ-हानि पहले तय हो चुके थे?
जब नुकसान 500 करोड़ तक पहुंच जाए, सप्लाई चेन डगमगा जाए और बाजार असंतुलित हो जाए तो नजरें अपने-आप उस जगह की ओर उठती हैं, जहां से फैसले निकलते हैं। पांचवीं मंज़िल… और उससे जुड़े वे चेहरे, जो दिखते कम हैं, लेकिन असर छोड़ते ज्यादा हैं।










