तीन डीजी की तैयारी, नियमों की माला… और बीच में बगुला भगत! वाह आईपीएस लॉबी…

तीन डीजी की तैयारी, नियमों की माला… और बीच में बगुला भगत! वाह आईपीएस लॉबी…

रायपुर – छत्तीसगढ़ में तीन वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों को डीजी स्तर पर पदोन्नति देने की तैयारी ने पुलिस मुख्यालय से लेकर महकमे के गलियारों तक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। आख़िर नियम किसके लिए? एसआरपी कल्लूरी, प्रदीप गुप्ता और विवेकानंद सिन्हा को डीजी स्तर पर पदोन्नति देने की तैयारी है। तीनों वर्तमान में एडीजी स्तर के अधिकारी हैं। दूसरी ओर पुलिस विभाग के छोटे कर्मचारी और पुलिस मुख्यालय के बाबू वर्षों से पदोन्नति की राह देख रहे हैं। किसी की सेवा 15 साल से अधिक हो चुकी है तो कोई पांच साल से प्रमोशन का इंतजार कर रहा है। पुलिस मुख्यालय में तो स्थिति यह है कि 2013 के बाद भर्ती नहीं हुई और पदोन्नति का इंतजार भी लंबा खिंचता जा रहा है। ऐसे में ऊपर डीजी स्तर पर तीन नई कुर्सियों की तैयारी ने नीचे बैठे कर्मचारियों के मन में एक ही सवाल खड़ा कर दिया है नियम आखिर हैं किसके लिए?

महकमे में सवाल है नीचे वालों की पदोन्नति आए तो नियमों की पूरी किताब खुल जाती है, लेकिन आईपीएस की बारी आए तो व्यवस्था में नए रास्ते तलाशे जाने लगते हैं।

बगुला, चोंच और नया तालाब…
इसी पूरे घटनाक्रम में एक नाम बगुला भगत भी तंज भरे अंदाज में लिया जा रहा है। बगुले की फितरत पर पुराना रूपक है नजर तालाब पर और चोंच मछली पर। मौजूदा डीजी पदोन्नति की कवायद में भी इस रूपक को अपने-अपने ढंग से जोड़ा जा रहा है। बगुला भगत का अपना पुराना ट्रैक रिकॉर्ड भी महकमे में याद किया जा रहा है। सत्ता और प्रभाव के बदलते केंद्रों के साथ तालाब बदलते रहे और बगुले की मौजूदगी भी। अब आईपीएस महकमे में तीन नई डीजी कुर्सियों की आहट है तो बगुले की चोंच और तालाब, दोनों का हिसाब-किताब फिर याद आ रहा है।

तीन नए डीजी पदों के साथ कल्लूरी, प्रदीप गुप्ता और विवेकानंद सिन्हा के नाम सामने हैं तो सवाल यह भी है तालाब के पानी में उठ रही लहर आखिर किस दिशा में बह रही है?

पहले भी तीन का खेल…
डीजी पदोन्नति को लेकर छत्तीसगढ़ का पुराना इतिहास भी कम दिलचस्प नहीं है। 2018 में रमन सरकार के दौरान तीन एक्स-कैडर डीजी स्तर के पद बनाए गए और संजय पिल्लै, आर.के. विज और मुकेश गुप्ता को पदोन्नति दी गई। लेकिन केंद्र की सहमति का पेंच फंसा और बाद में पदों के सृजन के साथ तीनों पदोन्नतियों को रद्द करना पड़ा। मामला न्यायिक लड़ाई तक पहुंचा।

अब फिर तीन नाम एसआरपी कल्लूरी, प्रदीप गुप्ता और विवेकानंद सिन्हा।

इसलिए पुलिस गलियारों में पुरानी फाइलें भी खुल रही हैं और तंज है “तीन का अंक डीजी प्रमोशन में बड़ा शुभ है… बस पिछली बार वाला पेंच इस बार नहीं फंसना चाहिए!”

तीन डीजी के पीछे सिर्फ तीन कुर्सियां नहीं…
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब पदानुसार डीजी स्तर के पद पहले से हैं, तो अलग से तीन डीजी स्तर की व्यवस्था की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या इस पूरी कवायद के पीछे भविष्य की किसी बड़ी कुर्सी का हिसाब भी जुड़ा हुआ है? तीन नए डीजी बनने के बाद पुलिस महकमे के शीर्ष स्तर की तस्वीर बदलेगी और आने वाले समय में सबसे ऊंची पुलिस कुर्सी के लिए समीकरण भी नए सिरे से बनेंगे। जानकार इसे केवल तीन अधिकारियों की पदोन्नति भर नहीं मान रहे। आज बनाई जा रही वरिष्ठता की सीढ़ी पर कल कौन किस पायदान पर खड़ा होगा, इसका गणित भी फाइलों के साथ-साथ चल रहा है।

यहां मामला केवल आज की कुर्सियों का नहीं है। कल की कतार में कौन आगे और कौन पीछे होगा उसका हिसाब भी आज की फाइलों में लिखा जा सकता है। पुलिस मुख्यालय से लेकर गृह विभाग तक इस कवायद पर अलग-अलग मत बताए जा रहे हैं, लेकिन आईपीएस महकमे के भीतर इसे आगे बढ़ाने की कवायद तेज मानी जा रही है। यानी खेल सिर्फ आज तीन को डीजी बनाने का नहीं, बल्कि कल डीजी की कतार में कौन किस जगह खड़ा होगा इसका भी है।

पिछली डीजी पदोन्नति का एक पन्ना…
इस पूरी कहानी में पिछली डीजी पदोन्नति का एक पन्ना भी अनायास याद आ रहा है। अरुण देव गौतम और हिमांशु गुप्ता के डीजी बनने के समय जीपी सिंह का नाम सूची में नहीं आया था। बाद में समय ने करवट ली और जीपी सिंह भी डीजी स्तर तक पहुंच गए। बस, इस पुराने पन्ने और मौजूदा तैयारी को साथ रखकर पढ़ने वाले अपने-अपने अर्थ निकाल रहे हैं।

आईपीएस महकमे में नामों की सूची केवल नामों की सूची नहीं होती उसके पीछे वरिष्ठता, रिक्तियां, कैडर की जरूरत, नियम और समय सबकी अपनी-अपनी भूमिका होती है। कई बार तस्वीर वही रहती है, बस उसे देखने का कोण बदल जाता है। और कई बार सूची में दर्ज नामों से ज्यादा महत्वपूर्ण वह क्रम होता है, जिसमें नाम दर्ज किए जाते हैं। इसलिए पुराने पन्नों को पढ़ने वाले लोग नई फाइल के अक्षरों के साथ-साथ उनके बीच की खाली जगहों को भी पढ़ रहे हैं।

नियमों की माला और आईपीएस का हिसाब…
मामला सिर्फ तीन आईपीएस अधिकारियों को डीजी बनाने का नहीं है। असली सवाल उस दोहरी तस्वीर का है एक तरफ पुलिस कर्मचारी वर्षों से पदोन्नति की राह देख रहे हैं, पुलिस मुख्यालय के बाबू पांच साल से इंतजार में हैं और छोटी-सी पदोन्नति के लिए नियमों की हर कसौटी से गुजरना पड़ता है। दूसरी तरफ आईपीएस कैडर की जरूरत सामने आते ही डीजी स्तर पर नए पदों और नए समीकरणों की तैयारी शुरू हो जाती है। क्या “नियमों की सख्ती सिर्फ नीचे वालों के लिए है क्या?”

पुराने दौर में संजय पिल्लै, आर.के. विज और मुकेश गुप्ता तीन नाम। फिर अरुण देव गौतम और हिमांशु गुप्ता का दौर, जिसमें एक नाम सूची से बाहर रहा, लेकिन समय के साथ कहानी का पन्ना भी बदला। अब एसआरपी कल्लूरी, प्रदीप गुप्ता और विवेकानंद सिन्हा फिर तीन नाम।

महकमे के लोग बस इतना कह रहे हैं डीजी की कुर्सी जनाब, बड़ी दिलचस्प चीज है। आज नियम फाइल में होते हैं, कल फाइल नियमों की नई व्याख्या ढूंढ लेती है। और आईपीएस की फाइलों में सिर्फ आज नहीं लिखा जाता… कई बार उनमें कल की कतार भी दर्ज हो जाती है।
और इस पूरी कहानी पर बगुला भगत की नजर बनी हुई है।

चोंच पुरानी है, तालाब नया है और मछलियां तीन अब देखना सिर्फ इतना है कि पानी की यह हलचल आखिर किसके लिए है!

वाह आईपीएस लॉबी… वाह बगुला भगत!

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