पाँचवीं मंज़िल का सुशासन और मैदान की फजीहत कहीं सुशासन का स्क्रिप्ट राइटर ज़्यादा उत्साहित तो नहीं ?

पाँचवीं मंज़िल का सुशासन और मैदान की फजीहत कहीं सुशासन का स्क्रिप्ट राइटर ज़्यादा उत्साहित तो नहीं ?
राजधानी : – सुशासन का त्योहार मनाना बुरा नहीं है। सरकार जनता के बीच जाए, शिकायतें सुने, योजनाओं का लाभ पहुँचाए इससे अच्छी बात क्या होगी? लेकिन बड़ा सवाल यह है कि 45 डिग्री की गर्मी में अचानक यह महाअभियान शुरू करने की सलाह किस मौसम विज्ञानी ने दी थी?
दरअसल पिछले कुछ हफ्तों में सुशासन त्योहार की तस्वीरों को देखिए तो कहीं अधिकारी और जनप्रतिनिधि आपस मे ही भिड़ गए, कहीं कर्मचारी विवादों में आ गए, कहीं कार्रवाई करनी पड़ी, और बेमेतरा में तो मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना का कार्यक्रम ऐसी वजहों से चर्चा में आ गया जिनकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। अंत में हाल यह हुआ कि राज्य के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक को मंच से ही व्यवस्था पर नाराज़गी जतानी पड़ी।
अब दिलचस्प हिस्सा सुनिए। राजधानी की एक ऊँची मंज़िल है जहाँ की पांचवी मंजिल पर बैठे एक छोटे कद के बड़े प्रभाव वाले साहेब को सत्ता के गलियारों में मास्टर प्लानर माना जाता है। कहा जाता है कि कई बड़े अभियानों की पटकथा वहीं लिखी जाती है। लेकिन पिछले कुछ समय से पटकथा और मंचन का तालमेल कुछ बिगड़ा-बिगड़ा सा दिखाई दे रहा है।
अगर कार्यक्रम इतना महत्वपूर्ण था कि मुख्यमंत्री स्वयं उपस्थित थे, तो क्या व्यवस्थाओं की पूर्व समीक्षा हुई थी? अगर हुई थी, तो रिपोर्ट किसने देखी? और अगर नहीं हुई थी, तो फिर सुशासन के इस महाउत्सव का संचालन किस भरोसे किया जा रहा था?
राजधानी की एक ऊँची मंज़िल पर बैठे छोटे कद के एक प्रभावशाली साहेब इन दिनों वैसे भी चर्चा में हैं। एक परीक्षा को लेकर देशभर में सवाल उठ रहे हैं। छात्र संगठन आवाज़ उठा रहे हैं। विपक्ष के बड़े नेता भी बयान दे रहे हैं। ऐसे में शायद सलाह देने से पहले सलाह की गुणवत्ता की भी परीक्षा हो जानी चाहिए थी। क्योंकि जब मैदान में बार-बार विकेट गिरने लगें, तो सवाल केवल बल्लेबाज़ों पर नहीं उठता। कभी-कभी ड्रेसिंग रूम की रणनीति भी जांची जाती है।
याद कीजिए बिजली बिल से जुड़े फैसले पर कितना शोर हुआ था। फिर दस्तावेज़ और रजिस्ट्री से जुड़े एक निर्णय पर ऐसी प्रतिक्रिया आई कि सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े। विपक्ष ने घेरा, जनता ने सवाल पूछे और अंततः सफाई देने की नौबत आई। तब भी उंगलियाँ सीधे किसी मंत्री की तरफ़ नहीं, बल्कि सलाह देने वाली अदृश्य व्यवस्था की तरफ़ उठी थीं।
अब सुशासन तिहार के बाद फिर वही चर्चा है।
सरकार मैदान में है, मंत्री मैदान में हैं, विधायक मैदान में हैं, कलेक्टर मैदान में हैं। लेकिन रणनीति बनाने वाले सज्जन कहीं दिखाई नहीं देते। जब सब ठीक हो तो पोस्टर चमकते हैं, बधाइयाँ छपती हैं, तस्वीरें सजती हैं। लेकिन जब कोई कार्यक्रम बेमेतरा जैसी सुर्खियाँ बटोर ले, तब पोस्टर अचानक गायब क्यों हो जाते हैं?
सवाल यह भी है कि मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों की संवेदनशील जानकारी, प्रोटोकॉल और व्यवस्थाओं की समीक्षा आखिर किस स्तर पर होती है? यदि किसी आयोजन में ऐसी स्थिति बन सकती थी, तो क्या पहले से किसी ने चेतावनी नहीं दी? और अगर दी थी, तो सुनी क्यों नहीं गई?
राजनीति में एक पुरानी कहावत है जब जीत मिलती है तो उसके कई पिता होते हैं, लेकिन हार अक्सर अनाथ हो जाती है। सुशासन तिहार के बाद लगता है कि कुछ फैसलों की राजनीतिक अभिभावकता तय करने का समय आ गया है।
क्योंकि अगर हर बार मैदान में खड़े खिलाड़ी ही जिम्मेदार हैं, तो फिर ड्रेसिंग रूम में बैठा रणनीतिकार आखिर किस काम का है? और जनता के मन में अब धीरे-धीरे एक फुसफुसाहट सुनाई देने लगी है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार की सबसे बड़ी विपक्षी ताकत विपक्ष नहीं, बल्कि वही सलाहें हैं जो सरकार को बार-बार बैकफुट पर ला देती हैं?”










