नक्सली संगठन के लोग सिर्फ आदिवासियों को गुलाम बनाना चाहते हैं, छोटे कैडर व ग्रामीणों की हत्या कर रहे – आत्मसमर्पित दिनेश

जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर में अलग-अलग नक्सली वारदातों में सैकड़ों जवानों की हत्या में शामिल रहे हार्डकोर नक्सली कमांडर दिनेश मोडिय़ाम केआत्मसमर्पण करने से नक्सली संगठन को बड़ा झटक लगा है। दिनेश मोडिय़ाम नक्सलियों की गंगालूर एरिया कमेटी का सचिव और पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी का सदस्य था, वह डीव्हीसीएम कैडर का नक्सली है, इस पर 8 लाख रुपए का इनाम घोषित है।
आत्मसमर्पित दिनेश 20 वर्षों तक नक्सली संगठन से जुड़े रहे होने पर एवं नक्सली हिड़मा, देवा, विकास, सुजाता समेत अन्य बड़े कैडरों के साथ काम कर चुका है।दिनेश को नक्सल संगठन में रहते एक महिला नक्सली ज्योति से प्यार हो गया था, दोनों का एक बच्चा भी है। ज्योति एसीएम कैडर की नक्सली है और इस पर 5 लाख रूपए का इनाम है। अब अंदरूनी इलाके में फोर्स के बढ़ते दबाव और कहीं मुठभेड़ न हो जाए इस डर से पति-पत्नी ने हिंसा छोड़ी और आत्मसमर्पण कर दिया है। दिनेश के नाम पर नक्सली संगठन के दक्षिण सब जोनल की प्रवक्ता समता के द्वारा पर्चा जारी करने से नक्सली संगठन को होने वाले नुकसान का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है, कि नक्सली संगठन के प्रवक्ता समता द्वारा पर्चा जारी कर दिनेश और इसकी पत्नी को गद्दार बताते हुए नक्सल संगठन का पैसा लेकर भागने और पुलिस के साथ मिल जाने का आरोप लगाया गया है, साथ ही 20 सालों तक नक्सली संगठन के साथ जुड़े रहने का उल्लेख भी किया गया है। वहीं दूसरी ओर पुलिस की ओर से अब आत्मसमर्पित हार्डकोर नक्सली कमांडर दिनेश मोडिय़ाम का भी बयान सार्वजनिक किया गया है, जिसमें आत्मसमर्पित नक्सली दिनेश ने नक्स्ली संगठन पर आरोप लगाते हुए कहा कि हिंसा का रास्ता गलत है। नक्सली संगठन के लोग सिर्फ आदिवासियों को गुलाम बनाना चाहते हैं। दिनेश ने कहा कि नक्सली ठेकेदारों से पैसे वसूलते हैं। छोटे कैडर बीमारी से मारे जा रहे, बड़े लीडरों को कुछ कह दिया तो वे मार डालते हैं।
आत्मसमर्पित नक्सली दिनेश ने कहा कि जिस दिन मैंने हथियार उठया तब सोच था कि मेरी लड़ाई आदिवासियों के हित के लिए है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नक्सल संगठन की विचारधारा एकदम गलत है। नक्सली संगठन के बड़े लीडर्स बंदूक के बल पर आदिवासियों को जबरदस्ती नक्सल संगठन में भर्ती कर रहे हैं। जिसका एक हिस्सा मैं खुद भी रहा हूं। जल-जंगल-जमीन का नारा देते हैं और आदिवासियों को भटकाते हैं। आदिवासियों को आदिवासियों के खिलाफ लड़वाकर हिंसा करवा रहे हैं। आदिवासियों की रोजी-रोटी छीनने का काम कर रहे हैं, इनका मकसद बड़े ठेकेदारों से पैसे वसूलना है, फिर उनके हिसाब से खर्च करना होता है। यदि कोई ग्रामीण गांव में विकास चाहता है तो नक्सली विकास होने नहीं देना चाहते हैं। यदि कोई भी ग्रामीण कह दे कि उन्हें गांव में सड़क, बिजली, पुल-पुलिया चाहिए तो उसे पुलिस का मुखबिर बताकर मार डालते हैं, यही नक्सली संगठन की असली सच्चाई है। मैं भी भटक चुका था, मेरी जिंदगी जंगल में ही गुजर रही थी। परेशान हो गया था, इसलिए मैंने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्य धारा में लौट आया हूं।

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