अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

लोहे के नेटवर्क में किन अफसरों की तस्वीरें? आखिर CMO से लेकर सचिव तक कौन रख रहा है किसकी निगरानी? क्या शुक्ला जी बचा पाएंगे तिवारी जी की कुर्सी? संगठन की रीति-नीति में भाई-भतीजावाद की एंट्री कब हुई? और ‘अयोग्य’ DGP की कुर्सी तक पहुंचने की कहानी क्या है? इन तमाम सवालों के जवाब और सत्ता-सिस्टम के भीतर की कई अनकही परतें पढ़िए इस रविवार ‘अफ़सर-ए-आ’ला’, सुशांत की कलम से।

 

लोहे का नेटवर्क
भिलाई में इन दिनों लोहा चोरी की चर्चा सिर्फ कबाड़ तक सीमित नहीं है। एक नाम है छोटू, लेकिन काम बड़ू है। एक ही नंबर की कई ट्रक और उन ट्रकों में लोहे का बड़ा कारोबार चलता है। ऐसे में सवाल ट्रैफिक से लेकर पूरी व्यवस्था से है। सीट बेल्ट से लेकर शराब तक की चेकिंग करने वाले तंत्र को एक ही नंबर से कई ट्रक पर मोतियाबिंद क्यो हो जाता है। शायद इसलिए कि इस खेल में लोहे से ज्यादा मजबूत कुछ रिश्ते हैं, और वे रिश्ते बाकायदा तस्वीरों में नजर आते हैं। पुलिस से लेकर प्रशासन और राजनीति तक कई चेहरे कारोबारी की तस्वीर में नजर आते है। 40 साल से चल रहे इस खेल में दस हजार करोड़ से ज्यादा का लोहा इधर से उधर हो चुका है। एक दिलचस्प किस्सा सुनिए महकमे के एक चर्चित चेहरे का अरुणोदय हुआ था। उनके बेटे की शादी हुई और शादी का पूरा खर्च इसी कारोबारी ने उठाया। अब जब अरुणोदय साथ हो तो फिर किसे किसकी चिंता! यही नहीं, वर्तमान से लेकर तत्कालीन कई अफसरों की तस्वीरें भी इस कारोबारी के दफ्तर में मत्था टेकती नजर आती है। तस्वीरों की भाषा समझे तो तस्वीरे बहुत कुछ बोलती है। इस कहानी में एक रील बाज विधायक भी हैं। रोज सोशल मीडिया पर नए खुलासे, इशारों में नाम और अपनी ही सरकार से सवाल पूछते है। कभी यही विधायक साहब सुप्रीम कोर्ट के वकील लाने का दावा करते थे, आज सोशल मीडिया पर ही गरियाते नजर आते हैं। वजह साफ है, कारोबारी की नजर अब उसी राजनीतिक सीट पर है। कारोबार, पैसा और प्रशासनिक पकड़ अगर एक जगह जमा हो जाए तो विधायक साहब की बेचैनी स्वाभाविक है। सो उन्होंने भी मोर्चा संभाल रखा है। लेकिन असली खेल यहीं है। पैसा, पावर और नेटवर्क इन तीनों के आगे जांच की रफ्तार कितनी चलेगी? क्योंकि अगर जांच सचमुच आगे बढ़ी तो सिर्फ कबाड़ी के गोदाम सील नही होंगे, बल्कि कई ऐसे चेहरे भी सामने आ सकते हैं जो आज वर्दी, प्रशासनिक चोले और सफेद कॉलर में घूम रहे हैं। चर्चा यह भी है कि एक सांसद के करीबी इसी कारोबारी के यहां काम करते हैं। पुलिस महकमे की सूची आने से पहले एक और चर्चा चली थी जिले वाले साहब न्याय की नगरी जाएंगे और न्याय की नगरी वाले यहां आएंगे। लेकिन सूची आई तो दोनों यथावत। संयोग देखिए, न्याय की नगरी वाले साहब की तस्वीर भी इसी कारोबारी के साथ दिखाई देती है। अब भिलाई की कहानी में लोहा कितना है और नेटवर्क कितना, यह तो जांच बताएगी। मगर इतना जरूर है कि अगर ट्रक का नंबर, CCTV, कॉल रिकॉर्ड, GST के कागज और बैंक लेनदेन एक साथ खोल दिए जाएं तो कहानी कबाड़ी से शुरू होकर राजधानी तक जा सकती है। क्योकि लोहा चोरी में सबसे मजबूत चीज लोहा नहीं नेटवर्क है।

जब बात CMO तक पहुंची और साहब भी स्तब्ध रह गए –
सरकारी महकमों में शिकायतें आती हैं, फाइलें चलती हैं और मामला सरकारी भाषा में सिमट जाता है। लेकिन इस बार बात कुछ ऊपर तक पहुंची। इतनी ऊपर कि CMO से आई सूचना ने सचिव स्तर के अधिकारी को ही नहीं, CMO को भी स्तब्ध कर दिया। बीते दिनों विभागीय ग्रुप में साझा संदेश में साहब ने लिखा “वे और मैं, दोनों स्तब्ध हैं।” आगे बताया गया कि अगर सामने आई जानकारी सही है तो जांच एजेंसियां फोन रिकॉर्ड, संदेशों और मुलाकातों तक की पड़ताल कर रही हैं। दोषी मिला तो कार्रवाई होगी। साहब की चिंता अपने ही लोगों को लेकर थी। उन्होंने लिखा कि जो लोग इसी विभाग से रोजी-रोटी, वेतन और पेंशन पाते हैं, वे अपने ही विभाग के खिलाफ कैसे काम कर सकते हैं? इसे उन्होंने गंभीर कदाचार बताया और कहा कि इसे माफ नहीं किया जा सकता। फिर लिखा “यह विभाग के लिए बेहद दुखद दिन है। मैं बहुत दुखी और बेहद निराश हूं।” साथ ही यह भी कि विभागाध्यक्ष भी उतने ही स्तब्ध और आहत हैं। अब इसके बाद का घटनाक्रम देखिए। संदेश सामने आया और करीब दस साल से संविदा व्यवस्था में जमे एक मुख्य अभियंता को हटा दिया गया। नाम संदेश में नहीं था, लेकिन घटनाक्रम ने चर्चा को जरूर हवा दे दी। आखिर ऐसा क्या था कि मामला CMO स्तर तक पहुंचा, फोन और मुलाकातों के रिकॉर्ड खंगालने की नौबत आई और फिर संवेदनशील व्यवस्था में बदलाव भी हुआ? साहब आखिर तक कह रहे है कि “अगर यह जानकारी सही है।” यानी फैसला जांच करेगी। लेकिन साहब स्तब्ध थे, CMO स्तब्ध था…अब देखना है जांच के बाद कौन-कौन स्तब्ध होता है।

तिवारी जी और शुक्ला जी
एक तिवारी जी हैं वही तिवारी जी, जो राज्य बनने के बाद से ही सरकार की छवि चमकाने वाले महकमे के आसपास अपनी मौजूदगी बनाए हुए हैं। सरकारें बदलीं, चेहरे बदले, साहबों की कुर्सियां बदलीं, मगर तिवारी जी वहीं के वहीं। विवादों से उनका पुराना नाता है। कभी कार्यालय में पत्रकार को थपडिया देते है। कभी किसी से उलझ जाते है। तो कभी तालाब की भूमि में आलीशान कारोबार करते नजर आते है। हाल ही में साहब लेह-लद्दाख की ठंडी हवा भी खा आए हैं। मगर मजे की बात यह है कि इतनी ठंडी हवा भी उनकी कुर्सी की गर्मी कम नहीं कर पाई। आखिर तिवारी जी को किसका वरदहस्त है? बताते है कि तिवारी जी को शुक्ला जी का आशीर्वाद मिला है। वही शुक्ला जी, जो सत्ता में तो नही है लेकिन उनकी पकड़ आज भी मजबूत बताई जाती है। कहते हैं तिवारी जी को भी मालूम है कि उनकी कुर्सी के पीछे कौन-सा साया खड़ा है। और जब साया इतना मजबूत हो तो फिर विभागीय शिकायतें हों, पत्रकार नाराज हों या साहब की कार्यशैली खराब हो कुर्सी को क्या फर्क पड़ना! बात यहाँ तक है कि तिवारी जी ज्यादा चूं-चां करें तो गृह विभाग का डंडा बज जाता है। गृह महकमे की अपनी ताकत है और शुक्ला जी की अपनी पहुंच। तिवारी जी की ताकत शायद इन्हीं दोनों के बीच कहीं छिपी है। जो कुर्सी तो बचा लेती है लेकिन आबरू नही बचा पाती। दिलचस्प यह भी है कि साहब सब जानते हैं, आसपास वाले भी सब जानते हैं, मगर मौन ही सबसे सुरक्षित नीति है। आखिर एक तरफ कुर्सी है और दूसरी तरफ गृह महकमे का डंडा और तीसरी तरफ शुक्ला जी की ताकत तीनो को साधना हो तो शांति ही सबसे बड़ा मूलमंत्र है।

भतीजावाद का नया मठ –
कहते थे संगठन की रीति-नीति में परिवारवाद की कोई जगह नहीं। अब लगता है, रीति-नीति की किताब के कुछ पन्ने शायद रिश्तेदारों के लिए अलग रख दिए गए हैं। बानगी देखिए एक तरफ अजेय योद्धा का भतीजा, दूसरी तरफ वीआईपी रोड के मठाधीश का मठ का युवराज। दोनों की राह अलग है, मगर मंजिल एक चाचा की छांव में अपना मुकाम। पहले वाले के भतीजे का नाम भी ऐसा कि कमल पर विराजमान होने के लिए इससे बेहतर नाम क्या होगा! सरकारी टेंडर हो, सप्लाई हो या कोई और काम कमल कहीं न कहीं खिल ही जाता है। अजेय योद्धा खुद को संगठननिष्ठ और ईमानदार बताते हैं, लेकिन भतीजे की यह उड़ान अब उनके लिए भी परेशानी का सबब बताई जाती है। घर का आदमी जब कमल पर सवार हो जाए तो संगठन की रीति-नीति भी आखिर कितनी देर रोक पाएगी? अब मठ के युवराज पर आइए। वीआईपी रोड के उसी मठ के, जहां पहले लालबत्तियों की आवाजाही हुआ करती थी और अब दरबार का तरीका बदल गया है। पहले आशीर्वाद से रास्ते खुलते थे, फिर फोन चले और अब खबरों और शिकायतों के रास्ते समीकरण साधे जाते हैं। लेकिन मठाधीश ने एक काम समय रहते समझ लिया मठ चलाना हो तो युवराज को हाउस तक पहुंचाना जरूरी है। बताया जाता है कि सूचना पहुंचानी हो, किसी काम से कलेक्टर साहब को बुलाना हो या ऊपर तक संदेश पहुंचाना हो, युवराज को रास्ता मालूम है और रास्ते वाले भी पहचानते हैं। संगठन की रीति-नीति में यह कौन-सा नया अध्याय है, इसका पाठ शायद अगली बैठक में पढ़ाया जाएगा। मठाधीश की महिमा भी कम नहीं। विकलांगता प्रमाणपत्र से आखिर क्या-क्या फायदे मिल रहे हैं, यह सवाल पहले भी उठ चुका है। चंदे को लेकर चर्चाएं अयोध्या से राजधानी की वीआईपी रोड तक पहुंची हैं। लेकिन मठाधीश तो मठाधीश हैं दरबार में सवाल पूछने की परंपरा थोड़ी कमजोर ही रहती है। और यही तो भतीजावाद की खूबी है योग्यता की परीक्षा भतीजे की नहीं, चाचा की पहुंच की होती है। चाचा मजबूत हो तो भतीजा अपने आप “सेट” हो जाता है।

DGP पूरी तरह अयोग्य –
कस्टोडियल डेथ की सबसे बड़ी त्रासदी सिर्फ मौत नहीं, मौत के बाद इंसाफ तक पहुंचने का रास्ता है। हर पीड़ित परिवार सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक नहीं पहुंच सकता। जिसके पास साधन नहीं, कानूनी लड़ाई लड़ने की ताकत नहीं, उसकी कहानी अक्सर थाना, जांच और फाइलों के बीच ही सिमट जाती है। छत्तीसगढ़ में सरकारी आंकड़े बताते हैं कि यह कोई एक मामला नहीं है। पिछले करीब तीन वित्तीय वर्षों में पुलिस कस्टडी में मौत के 9 मामले NHRC के रिकॉर्ड में दर्ज हुए। वर्ष 2023-24 में 2, 2024-25 में 3 और 2025-26 में 15 मार्च तक 4 मामले। इससे पहले 2021-22 में 2 और 2022-23 में 1 मामला दर्ज हुआ था। अब एक मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो तस्वीर का दूसरा पहलू सामने आया। जनवरी 2024 में हिरासत में मौत हुई, लेकिन FIR करीब ढाई साल बाद दर्ज हुई। परिवार न्याय की तलाश में हाईकोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। वहां अदालत ने जांच और कार्रवाई में हुई देरी पर बेहद कड़ी टिप्पणी की और छत्तीसगढ़ के DGP की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए उन्हें “पूरी तरह अयोग्य” तक कह दिया। अब जरा सोचिए जिस परिवार को इंसाफ के लिए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचना पड़ा, वह परिवार अगर वहां तक पहुंच ही नहीं पाता तो? सरकारी रिकॉर्ड में नौ कस्टोडियल डेथ के मामले दर्ज हैं। लेकिन इन नौ मामलों के पीछे कितने परिवार हैं, कितनों ने न्याय के लिए लंबी लड़ाई लड़ी और कितने रास्ते में ही थक गए इसका हिसाब शायद किसी सरकारी आंकड़े में नहीं है। एक परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो देश ने देख लिया कि नीचे से ऊपर तक व्यवस्था की कौन-सी परत कहां कमजोर पड़ी। लेकिन जिन परिवारों की आवाज उस अदालत तक नहीं पहुंचती, उनकी सुनवाई कौन करेगा? कस्टोडियल डेथ के ये आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं। हर संख्या के पीछे एक परिवार है, एक मौत है और इंसाफ की एक अधूरी यात्रा है। सुप्रीम कोर्ट की इस कड़ी टिप्पणी ने एक बात जरूर सामने रख दी है मामला सिर्फ एक कस्टोडियल डेथ का नहीं, उस पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का है जो मौत के बाद भी इंसाफ को फाइलों में भटकने दे सकती है।

कल की उंगली, आज की अदालत –
सुप्रीम कोर्ट में कस्टोडियल डेथ के मामले में छत्तीसगढ़ के DGP अरुण देव गौतम की कार्यप्रणाली पर अदालत की इतनी कड़ी टिप्पणी आई कि उन्हें “पूरी तरह अयोग्य” तक कह दिया गया। अब सवाल सिर्फ एक केस की जांच का नहीं है। अदालत की टिप्पणी ने उस रास्ते की धूल भी उड़ा दी है, जिस रास्ते से गौतम साहब DGP की कुर्सी तक पहुंचे थे। कहानी थोड़ी पीछे लिए चलते है। DGP चयन के लिए UPSC को भेजे गए शुरुआती चार नाम थे। पवन देव, अरुण देव गौतम, जीपी सिंह और हिमांशु गुप्ता। फिर पैनल छोटा हुआ और मैदान में बचे गौतम और हिमांशु गुप्ता। बाकी दो नाम किस कसौटी पर बाहर हुए? फाइल में क्या तर्क था और उस तर्क का लेखक कौन था? और यहीं से कहानी में तत्कालीन मुख्य सचिव अमिताभ जैन का अध्याय खुलता है। जैन साहब भूपेश बघेल सरकार के बनाए हुए मुख्य सचिव थे। उस दौर में सत्ता की पसंद-नापसंद को लेकर प्रशासनिक गलियारों में खूब चर्चाएं थीं। इनमें सबसे चर्चित बात यह भी थी कि जीपी सिंह को किसी भी कीमत पर DGP की दौड़ में आगे नहीं आने देना है। अगर ऐसी कोई हिदायत थी और एक मुख्य सचिव ने उसे पूरी निष्ठा से निभाया, तो फिर सवाल यह नहीं कि अफसर किसके प्रति जवाबदेह था सवाल यह है कि कुर्सी संविधान की थी या सत्ता की? इसके बाद सत्ता बदल गई, सरकार बदल गई, झंडे का रंग बदल गया। मगर पुरानी सत्ता की पसंद का असर फैसलों की फाइल में बना रहा, तो इसे प्रशासनिक निरंतरता कहें या अद्भुत स्वामीभक्ति इतिहास खुद तय करेगा! तब सवाल था गौतम का चयन कैसे हुआ? आज सवाल है गौतम के नेतृत्व में व्यवस्था कैसी चली? कल उंगली चयन की फाइल पर उठी थी। आज अदालत ने उसी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर उंगली रख दी है। साहब, सरकारी कुर्सियां बदलती रहती हैं। मगर कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता और कुर्सी पर बैठकर किए गए फैसले दोनों का हिसाब इतिहास में है। कल फाइल बोल नहीं रही थी… आज अदालत बोल रही है।

यक्ष प्रश्न –

1 – संगठन की रीति-नीति में परिवारवाद की एंट्री कब हुई, या फिर यह नियम सिर्फ दूसरों के लिए था?

2 – सुप्रीम कोर्ट में घटी अप्रत्याशित घटना के बाद छत्तीसगढ़ के डीजीपी क्या पद में रहना पसंद करेंगे

 

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