सुनी-सुनाई – शराब की खेप से खुली पुराने नेटवर्क की परत, ‘घोंसले’ तक पहुंची क्राइम ब्रांच, किले में घनघनाई घंटी, डीएम-कप्तान तक पहुंची आवाज फिर थम गई

राजधानी – पिछली बार बात निकली थी सुमित के घोंसले से और पहुंच गई थी किले की दीवारों तक अब आगे की सुनी-सुनाई यह है कि कहानी बोतलों से ज्यादा उन रिश्तों की है, जिनकी गर्मी आज भी महसूस होने की चर्चा है। सोमवार रात क्राइम ब्रांच ने इस घोंसले पर दबिश दी। करीब सवा सौ महंगी विदेशी शराब की बोतलें मिलने की बात सामने आई। माल जब्त हुआ और मामला आगे की कार्रवाई के लिए स्मृति नगर पुलिस के हवाले कर दिया गया। मगर इसके बाद अचानक खामोशी छा गई। बोतलें जब्त हुईं, मगर कार्रवाई की आहट सुनाई नहीं दी।
बताते हैं, इस किरदार के रिश्ते पुराने हैं। एक तरफ तपन की तपिश, दूसरी तरफ पुरानी फाइलों में चर्चित रही मैडम और सत्ता के गलियारों में घूमता एक युवा विधायक का नाम भी है। अब कौन किससे कितना करीब है, यह तो दस्तावेज बताएंगे, मगर चर्चाएं आज भी गर्म हैं। पुराने कॉल रिकॉर्ड में तपन की तपिश से संपर्क की बातें सामने आने का दावा भी किया जाता रहा है। इसी कड़ी में शराब कारोबार से जुड़े एक कारोबारी को पुराने जानकार सेतु की भूमिका में देखते हैं।
अब नई सुनी-सुनाई यह है कि मामला सिर्फ सवा सौ बोतलों तक सीमित नहीं है। करीब 600 बोतल प्रीमियर शराब की चर्चा भी चल रही है। ऐसी शराब, जो छत्तीसगढ़ में आसानी से उपलब्ध नहीं होती, उसकी घर पहुंच सेवा की भी बातें कही जा रही हैं तीन हजार की बोतल पांच हजार में घर पहुंचाने तक की चर्चा। यानी दुकान नहीं, डोर डिलीवरी… बस दरवाजा अपना होना चाहिए।
यहां एक और सवाल बड़ा दिलचस्प है।आबकारी कानून में मात्रा को लेकर सीमाएं हैं और पांच बल्क लीटर की सीमा का न्यायिक रिकॉर्ड में उल्लेख मिलता है। तो फिर अगर बरामदगी की चर्चा सैकड़ों बोतलों तक पहुंच रही है, मामला सिर्फ शराब रखने का कैसे रह सकता है? और अब सुनने में यह भी आ रहा है कि जब मामला कप्तान तक पहुंचा तो पीएचक्यू ने उन्हें तलब किया। चर्चा है कि वहां यह समझाने की तैयारी चल रही है कि बरामदगी 600 नहीं, सिर्फ 6 बोतलों की थी।
बस यहीं से थोड़ा हिसाब समझ में नहीं आता। अगर गिनती 600 की चर्चा में है और समझाने की तैयारी 6 की, तो बीच के शून्य आखिर गए कहां? इसी बीच जिले से ऊपर तक छह का एक और किस्सा घूम रहा है रिहर्सल भी चल रही है और कन्विंस करने की कवायद भी। इंटेलिजेंस वालों की सज्जनता भी कमाल की है, बताते हैं जल्दी समझ जाते हैं और जल्दी समझा भी देते हैं।
अब सवाल शराब का नहीं, उस व्यवस्था का है जिसमें बोतलें पकड़ी जाती हैं, फोन बजते हैं और फिर आंकड़ों की गिनती तक बदलने की चर्चा होने लगती है। किले की दीवारें बाहर से मजबूत हैं। मगर पुराने किलों की पहचान सिर्फ दीवारों से नहीं, उन रास्तों से भी होती है जो भीतर कहीं जाकर खुलते हैं।
सवाल यह है कि घंटी की आवाज किस पुराने रास्ते से होकर ऊपर तक पहुंची और अब 600 को 6 बताने की तैयारी उसी रास्ते का हिस्सा है या नहीं? झंडा आज का है, पहरेदार आज के हैं… मगर कहीं कुछ लोग आने वाले मौसम के लिए पुराने रास्तों की धूल तो नहीं झाड़ रहे?
बाकी किले के भीतर की खबर किले वाले ही जानें।










