सुनी-सुनाई – शराब की खेप पकड़ी, फोन की घंटियां बज उठीं, किले में सुशासन से ज्यादा किसका असर –

प्रदेश की औद्योगिक नगरी में एक अपार्टमेंट है। नाम ऐसा कि राजधानी के पुराने लोग नाम सुनते ही एक चर्चित व्यापारी की याद कर लें, जो सूर्य की तरह चमका और अस्त हो गया। मगर लगता है, उसकी तपिश अब भी बाकी है। कहते हैं, इस शहर को किला यूं ही नहीं कहा जाता, शायद पुराने किलों की कुछ गुप्त सुरंगें आज भी बची हुई हैं। बीते दिनों इसी नाम वाले अपार्टमेंट के “सुजीत के घोंसले” में शराब की बड़ी खेप पकड़ी गई। खेप पकड़ने वाली क्राइम ब्रांच ने भी बड़ी शालीनता दिखाई। माल पकड़ा और सूचना उस मोहल्ले वाले थाने को दे दी, इस तर्ज पर “हमने घंटी बजा दी है, अब दरवाजा आप खोलिए।”
दरवाजा खुला भी… मगर कार्रवाई के लिए कम और फोन उठाने के लिए ज्यादा।
इधर खेप पकड़े जाने की खबर फैली नहीं कि जिले के बड़े साहबों के फोन घनघनाने लगे। बताते हैं कि डीएम और कप्तान तक भी कॉल पहुंचा। संयोग देखिए, दोनों ही अफसर तत्कालीन सरकार के दौर में “नाक के बाल” माने जाते थे। और फिर पुराने दौर की “सुपर सीएम मैडम” की घंटी और एक बड़े राजनीतिक पुत्र की आवाज भी सुनाई दी। इसके बाद प्रशासन अचानक सक्रिय हुआ। अब यह सक्रियता कानून के लिए थी या मामले को ठंडा करने के लिए, यह तो फाइल ही जाने।
लेकिन अब मसला शराब की खेप का नहीं है। मसला तो उस घंटी का है, जो खेप पकड़े जाने के बाद बजी। आखिर किसकी घंटी बजी और क्यों बजी? किसकी आवाज में इतना वजन था कि किले की प्रशासनिक दीवारें तक हिल गईं? सरकार बदली, चेहरे बदले, कुर्सियां बदलीं, सत्ता का अंदाज बदला… तो क्या पुराने रसूख की घंटियों का सुर भी बदल गया, या नंबर भले पुराने हों, मगर नेटवर्क आज भी चालू है।
और यहीं से असली सियासी कहानी शुरू होती है। क्या अफसरशाही ने सत्ता के मौसम में आने वाले बदलाव की आहट पहले ही सुन ली है? क्या उसे अंदाजा है कि जो दौर अस्त हुआ दिख रहा है, वह फिर उग सकता है? और अगर ऐसा आभास है, तो क्या अभी से पुराने रिश्तों की धूल झाड़ी जा रही है कहीं फोन मिलाकर, कहीं झुककर, कहीं मनाकर।
यह सब देखकर सुशासन बाबू से सवाल तो बनता है कि उनकी नाक के नीचे आखिर कौन-सी तैयारी चल रही है। कानून के राज की या आने वाले कल के राज से अपने आज के रिश्ते बचाने की? क्योंकि राजनीति में मौसम बदलने में वक्त लगता हो या न लगता हो, अफसरशाही हवा का रुख बहुत पहले पहचान लेती है। तो क्या ये फोन सिर्फ आज की मुसीबत टालने के लिए थे, या कल की संभावित सत्ता के दरवाजे पर आज ही दस्तक देने की कवायद?
कमाल देखिए, कप्तान से लेकर डीएम तक की कुर्सियां हिलीं और आनन-फानन में मामला रफा-दफा भी हो गया। सुशासन के लिए इससे अच्छा संदेश भला क्या होगा! खेप भी पकड़ी गई, कार्रवाई भी हुई और फिर मामला भी निपट गया। वह भी “सुजीत के घोंसले” में अब इससे बेहतर प्रशासनिक दक्षता का उदाहरण और क्या चाहिए।
कहीं ऐसा तो नहीं कि किले पर झंडा अभी वही है, सरकार अभी वही है… मगर कुछ साहबों ने आने वाले मौसम की हवा पहचानकर अपनी पतंग की डोर पहले ही दूसरी तरफ बांध ली है।










