अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)
बिना संभाग आईजी रेंज –
यह एक ऐसी आईजी रेंज की कहानी है, जो नक्शे पर भले संभाग न हो, लेकिन कभी किसी खास बगुले को बैठाने के लिए बनाई गई थी। आज वही रेंज फिर सुर्खियों में है लेकिन इस बार वजह अलग है। बताया जाता है कि इस रेंज में पदस्थ एक कप्तान के द्वारा मौजूदा आईजी को हटाने का जी-तोड़ प्रयास जारी है। उनकी इच्छा है कि कुर्सी पर एक कमल खिले। उधर आईजी की कुर्सी पर बैठे साहब भी कम अनुभवी नहीं है। लेकिन दोनों के बीच टकराव अब फाइलों से निकलकर फिज़ा में तैरने लगा है। कहानी यहीं खत्म नहीं होती है। इसके ठीक बगल का एक जिला है, जो कला-संगीत के लिए जाना जाता है, वहीं से इस पूरी पटकथा का एक और किरदार उभरता है। एक युवा चेहरा जिसकी मौजूदगी, और दखल ऐसी है कि कभी-कभी एसपी ऑफिस की हवा तक बदल देती है। यह रिश्तों की डोर ऑफिस से घर तक पहुँच जाती है, इसलिए असर भी सीधा दिखलाई पड़ता है। कहते हैं, कप्तान को यही साया यहाँ तक पहुँचाया है। और अब दावा है कि उनके सिर पर इंटेलिजेंस का हाथ है। अब यह हाथ कितना मजबूत है यह तो वही जानें पर सवाल यह है कि क्या असली इंटेलिजेंस को भी खबर है कि उसकी आड़ में क्या-क्या खेल हो रहा है? इस रेंज में आज फाइलें कम, फुसफुसाहटें ज्यादा चल रही हैं। क्या यह प्रशासन है या प्रभाव का शतरंज, जहाँ हर चाल कुर्सी से बड़ी हो चुकी है।
लंबू साहब, सट्टा और गांजा की पुड़िया –
राजधानी में इन दिनों एक अजीब संतुलन दिख रहा है एक तरफ कॉलम लिखे जाने के बाद आईपीएल सट्टे पर कार्रवाई तो दिखी, वही दूसरी तरफ खुलेआम गांजा की बिक्री के साथ साथ पुड़िया का रेट भी बढ़ गया है। शहर के मुख्य चौक चौराहों जैसे मोती बाग, कालीबाड़ी, मरीन ड्राइव जैसे इलाकों में खुलेआम गांजा की पुड़िया बिक रही है। जहाँ पहले सौ रुपये में मिलने वाली गांजा की पुड़िया, अब पाँच सौ तक पहुँच गई है। कारण पूछो तो जवाब साफ मिलता है ऊपर का हिसाब बदल गया है।कमिश्नर सिस्टम लागू होते ही नीचे का पूरा नेटवर्क नए तरीके से सेट हो गया। हर स्तर पर हिस्सा बढ़ा, तो गांजा की पुड़िया का रेट भी बढ़ गया। सवाल यह नहीं कि बिक्री क्यों हो रही है, सवाल यह है कि यह सब किसकी निगरानी में हो रहा है? अंदरखाने एक सेटलमेंट की चर्चा भी है, जहाँ रिश्ते और रसूख दोनों बराबर काम कर रहे हैं। साहब रिटायरमेंट के करीब हैं, और तैयारी ऐसी जैसे यह भी एक प्रोजेक्ट हो। शहर में कार्रवाई का शोर है, लेकिन गलियों में गांजा की पुड़िया का कारोबार जारी है। और धंधे की जड़ और गहरी हो चुकी है। क्या यह सफाई है या सिस्टम को नए सिरे से जमाने की चाल?
आईएएस दीदी –
सूबे में इन दिनों एक आईएएस दीदी खासा चर्चाओं में हैं। दीदी का प्रभाव ऐसा है कि उनके नक्शे कदम पर एक कुनबा चल पड़ता है। दीदी का एजेंडा थोड़ा अलग है। वे रिश्तों को पारंपरिक नजरिए से नहीं, आज़ादी के तराजू पर तौलती हैं। उनका मानना है कि बंधन जितना कम होगा, जीवन उतना हल्का और स्वतंत्र होगा। इसी सोच के साथ एक अनौपचारिक मंडली भी बन गई है, जिसमें चार-पाँच महिला आईएएस का एक सर्कल सक्रिय बताया जाता है। जहाँ निजी रिश्तों से दूरी यानी पति से अलग रहना धीरे-धीरे एक चुनाव से बढ़कर पहचान बनती जा रही है। दीदी खुद भी उसी राह पर चल रही हैं। कुछ इसे आधुनिकता का प्रतीक मानते हैं, तो कुछ इसे सामाजिक संतुलन के लिए चुनौती। दिलचस्प यह है कि यह चर्चा अब बंद कमरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि शहर की फुसफुसाहटों में भी शामिल हो चुकी है। कहा जाता है कि इस मंडली में रिश्तों की परिभाषाएँ आपस मे ही थोड़ी अलग ढंग से लिखी जा रही हैं जहाँ परंपराओं से इतर अपनापन भी अपने दायरे खुद तय करता है। और यही वजह है कि पारंपरिक बंधनों से दूरी यहाँ सिर्फ निजी फैसला नहीं, एक सोच बनती जा रही है। अब यह बदलाव है या नया चलन यह तो समय तय करेगा। लेकिन क्या हर आज़ादी सच में आज़ादी होती है, या फिर वह भी एक नए दायरे में बंध जाती है ?
176 करोड़ और न्यूज़ चैनल – पार्ट 2
तंबाकू, गुटखा, सिगरेट से कैंसर होता है यह इन पैकेट पर लिखा होता है। पर असली खतरा तब शुरू होता है जब यही कारोबार सत्ता के फेफड़ों तक पहुँच जाए तो सिर्फ शरीर नहीं, पूरे सिस्टम को खोखला कर देता है और आवाज़ भी नहीं होती। यह वही कहानी है 176 करोड़ के टेक्स चोर से मीडिया मालिक बने उस किरदार की, जिसने व्यापार से शुरुआत कर प्रभाव का साम्राज्य खड़ा कर लिया। कागज़ों में सवाल आज भी जिंदा हैं, लेकिन कैमरे की चमक में वे दिखाई नहीं देते। सरकार द्वार तक पहुँचे या सुशासन तिहार में उलझी रहे, लेकिन यह किरदार रामकथा का मंच सजाकर सत्ता को खुद अपने दरबार में बुला लेता है। एक तरफ तंबाकू की गंध, दूसरी तरफ भक्ति का धुआँ, बीच में न्यूज़ की रोशनी और कहानी का रंग बदल जाता है। जहाँ कभी श्रद्धा थी, अब नेटवर्क है। जहाँ नेता सिर झुकाते हैं और फाइलें सिर उठाने से डरती हैं। जो सवाल पूछने वाला तंत्र था, अब निमंत्रित दर्शक बन गया है। और कथा कहने वाला कवि कब किसके पक्ष में खड़ा हो जाए यह भी कथा का हिस्सा है। इस न्यूज पोर्टल में हरे रंग की परत भी यूँ ही नहीं है, इस रंग के पीछे भी एक गठजोड़ की कहानी है। यह सिर्फ कारोबार नहीं, प्रभाव के विस्तार की पटकथा है। जहाँ बार, क्लब, पोर्टल और कथा सब एक ही धागे में बंधे हैं। गोली चली, एफआईआर हुई, खबर भी बनी पर रफ्तार वही रही बिना ब्रेक, बिना सवाल। फर्क बस इतना है पहले नाम फाइलों में था, आज वही चेहरा फ्रेम में है। असल बात यही अटकती है कि सफाई हुई है या सिर्फ आईना बदल दिया गया है?
शराब कारोबारी सरदार –
छत्तीसगढ़ यह सिर्फ नक्शे का एक राज्य नहीं है, यह विरासत, कला और श्रम की एक जीवित कहानी है। जहाँ Habib Tanvir की रंगमंचीय गूंज, Teejan Bai की पंडवानी, नाचा, लोकगीत और मिट्टी से उठती आवाज़ें है यही इसकी असली पहचान गढ़ते हैं। इसी धरती पर Bhilai Steel Plant देश की औद्योगिक रीढ़ कहलाता है, NMDC Limited की खदानों से निकला लोहा
राष्ट्र की ताकत बनता है। और आस्था में Danteshwari Temple की घंटियाँ गूंजती हैं, Mahamaya Temple Ratanpur की श्रद्धा सिर झुकाती है, और अरपा, शिवनाथ, इन्द्रावती ये नदियाँ सिर्फ बहती नहीं, इस प्रदेश की पहचान को जीवित रखती हैं। लेकिन इसी पहचान के बीच एक शराब कारोबारी सरदार यह दावा करता है कि छत्तीसगढ़ को उसकी दारू की ब्रांड से जाना जाता है। यानी सदियों की संस्कृति, श्रम और आस्था को एक बोतल में बंद करने की कोशिश की जा रही है। क्या यह वही प्रदेश है जिसे गीत, गाथा और गौरव ने गढ़ा? या अब उसे विज्ञापनों की लाइन में खड़ा किया जा रहा है? साफ बात है छत्तीसगढ़ किसी ब्रांड का मोहताज नहीं है। यहाँ पहचान बिकती नहीं, पीढ़ियों में बनती है। और याद रखने वाली बात यही है बोतलें खाली हो जाती हैं, लेकिन मिट्टी की पहचान कभी खत्म नहीं होती।
क्रिकेट का करंट कनेक्शन
खेल के नाम पर मैदान सजता है, पर असली मैच अक्सर फाइलों में खेला जाता है। कहानी उसी शराब कारोबारी सरदार की है जो ब्रांड से पहचान गढ़ने में लगा है, और अब क्रिकेट के मैदान तक अपनी पहुँच बना चुका है। बताया जाता है, यह कनेक्शन अकेला नहीं है। इसके साथ एक पाँचवीं मंज़िल वाला किरदार भी है।कद में छोटा, लेकिन कुर्सी में लंबा असर रखने वाला। ऊर्जा के गलियारों से लेकर बोर्डरूम तक, जिनके हस्ताक्षर से बिजली का हिसाब बदलता है। कहते हैं, यहीं से खेल शुरू हुआ जहाँ करंट सिर्फ तारों में नहीं, फैसलों में दौड़ता है। स्टेडियम की कहानी भी कुछ ऐसी ही है पहले मरम्मत के नाम पर चमकाया गया, फिर धीरे से नियंत्रण सरका दिया गया। बिजली का हिसाब ऐसा एडजस्ट हुआ जैसे कभी बकाया था ही नहीं। अब मैदान में सिर्फ क्रिकेट नहीं होता यहाँ नेटवर्क खेलता है, और हर ओवर में कोई न कोई सेटिंग छिपी होती है। टिकटो की कालाबाजारी तो आसमान छू रही हैं, स्टेडियम के अंदर हर चीज़ स्पेशल रेट पर मिलती है,और बाहर सवाल हवा में लटकते रहते हैं। यह खेल बल्ले और गेंद का कम, कनेक्शन और करंट का ज्यादा लगने लगा है। क्या यह क्रिकेट है या फिर सिस्टम के भीतर खेला जा रहा एक और मैच, जहाँ स्कोरबोर्ड पर रन नहीं, रिश्ते और फायदे जुड़ते हैं?
यक्ष प्रश्न –
1 – रेंज मुख्यालय में पदस्थ एक कप्तान के यहाँ सिपाही काम करने से क्यों कतराते है वजह बताइये ?
2 – वन प्रमुख के खिलाफ गंभीर शिकायतों के बाद भी क्या वह 3 महीने का बढ़ोतरी प्राप्त कर सकते हैं?








