भूपेश के बयान के चार दिन बाद उनके पूर्व ओएसडी को आयुष्मान की कमान! स्वास्थ्य विभाग खुद आईसीयू में, CGMSC से डॉक्टरों की कुर्सियों तक घमासान –

 

रायपुर – छत्तीसगढ़ का स्वास्थ्य विभाग अब मरीजों का इलाज करने वाले महकमे से ज्यादा खुद बीमार व्यवस्था की तस्वीर पेश कर रहा है। आयुष्मान में अस्पतालों के क्लेम और मरीजों से वसूली का विवाद, CGMSC की दवा खरीदी में सैकड़ों करोड़ के आरोप और चिकित्सा विशेषज्ञता वाले पदों पर प्रशासनिक अधिकारियों की तैनाती। तीनों मोर्चों पर सवाल हैं, लेकिन जवाबदेही का हिसाब अब भी धुंधला है। अस्पतालों में मरीज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं और विभाग की व्यवस्था खुद प्रशासनिक आईसीयू में पड़ी नजर आती है।

भूपेश बघेल ने आयुष्मान योजना में गड़बड़ी का मुद्दा उठाया। इसके चार दिन बाद, 5 अक्टूबर को पूर्व मुख्यमंत्री के ओएसडी रह चुके देवेंद्र कुमार प्रधान को राज्य नोडल एजेंसी के प्रोजेक्ट डायरेक्टर से जुड़े अहम काम सौंप दिए गए। प्रधान राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं। जिस योजना में अस्पतालों के दावे, उपचार की पात्रता और भुगतान की निगरानी अहम है, उसकी जिम्मेदारी ऐसे अधिकारी को सौंपने के फैसले ने नियुक्ति के नियमों और चिकित्सा विशेषज्ञता की भूमिका को बहस के केंद्र में ला दिया है।

आयुष्मान में अस्पतालों पर शिकंजा, निगरानी तंत्र बेनकाब –

आयुष्मान योजना में अस्पतालों पर मरीजों से अतिरिक्त वसूली, गलत पैकेज में क्लेम, बिना जरूरी जांच आईसीयू में भर्ती दिखाने और रिकॉर्ड में गड़बड़ी जैसे आरोप सामने आए हैं। अस्पतालों को नोटिस जारी हो रहे हैं और दस्तावेजों की जांच चल रही है। लेकिन इन मामलों ने निगरानी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। मरीजों के इलाज के नाम पर सरकारी खजाने से भुगतान होता रहा और गड़बड़ियों की शिकायतें सामने आईं, तो निगरानी तंत्र की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। अस्पतालों पर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन निगरानी करने वाली व्यवस्था को जवाबदेही से बाहर नहीं रखा जा सकता।

CGMSC: खरीदी के खेल में करोड़ों का खेल –

सरकारी अस्पतालों के लिए दवा और उपकरण खरीदने वाले छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन यानी CGMSC का ‘हमर लैब’ मामला भी स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। एसीबी की जांच और अभियोजन से जुड़े विवरण में टेंडर प्रक्रिया में मिलीभगत, जरूरत से ज्यादा रिएजेंट खरीदने और करीब ₹161 करोड़ के रिएजेंट इस्तेमाल से पहले एक्सपायर होने के आरोप सामने आए। पूरे मामले में करीब ₹550 करोड़ के घोटाले की जांच चल रही है।

मार्च 2025 में विधानसभा में खरीदी की दरों, मशीनों के चालू नहीं होने और बजट से अधिक खर्च का मुद्दा उठा था। स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने जांच और अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जानकारी दी थी। लेकिन इतने बड़े मामले में असली कसौटी जांच की घोषणा नहीं, बल्कि कार्रवाई का परिणाम है। खरीदी किसके निर्णय पर हुई, जरूरत का आकलन किसने किया, गुणवत्ता की निगरानी कहां हुई और नुकसान की जिम्मेदारी किस पर तय हुई इनका पूरा हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए।

डॉक्टरों की विशेषज्ञता को किनारे, अफसरशाही आगे –

स्वास्थ्य विभाग में चिकित्सा और तकनीकी जिम्मेदारियों वाले पदों पर प्रशासनिक अधिकारियों की तैनाती को लेकर डॉक्टरों ने विरोध जताया है। डॉक्टरों का कहना है कि चिकित्सा सेवाओं में वर्षों का अनुभव रखने वाले विशेषज्ञ पदोन्नति की प्रतीक्षा करते रह जाते हैं, जबकि महत्वपूर्ण पद प्रशासनिक अधिकारियों को सौंपे जा रहे हैं।

आयुष्मान जैसी योजना में प्रशासनिक प्रबंधन अपनी जगह है, लेकिन अस्पतालों के क्लेम, उपचार की पात्रता और चिकित्सा रिकॉर्ड की तकनीकी जांच के लिए विशेषज्ञता भी जरूरी है। उपलब्ध नियमावली में संबंधित पदों के लिए चिकित्सा, स्वास्थ्य प्रबंधन और निर्धारित अनुभव जैसी योग्यताओं का उल्लेख है। ऐसे में पद की प्रकृति और निर्धारित योग्यता को नजरअंदाज करके जिम्मेदारी सौंपना सामान्य प्रशासनिक फेरबदल भर नहीं माना जा सकता। विभाग को स्पष्ट करना होगा कि लागू नियमों के अनुरूप नियुक्ति कैसे हुई और तकनीकी निर्णयों की जिम्मेदारी किसके पास है।

स्वास्थ्य मंत्री के विभाग में जवाबदेही का संकट –

स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के सामने अब सिर्फ अस्पतालों पर कार्रवाई का सवाल नहीं है। आयुष्मान की निगरानी, CGMSC की खरीदी, दवाओं की गुणवत्ता और डॉक्टरों की पदस्थापना इन सभी मामलों में विभागीय जवाबदेही सामने आनी चाहिए। स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया से जुड़े प्रशासनिक विवादों पर भी सार्वजनिक चर्चा हुई है। अगस्त 2026 में कर्मचारी के स्थानांतरण मामले में हाईकोर्ट के आदेश के पालन को लेकर उन्हें अवमानना नोटिस जारी किए जाने की खबर सामने आई थी।

इन मामलों को अलग-अलग फाइलों में बंद करके विभाग अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। स्वास्थ्य मंत्री को बताना होगा कि CGMSC मामले में अब तक क्या कार्रवाई हुई, खरीदी और गुणवत्ता की निगरानी में किस स्तर पर चूक हुई, आयुष्मान की गड़बड़ियों पर किसकी जवाबदेही तय की गई और तकनीकी पदों पर नियुक्तियों में निर्धारित योग्यता का पालन कैसे सुनिश्चित किया जा रहा है।

आयुष्मान में अस्पतालों के क्लेम, CGMSC में खरीदी और डॉक्टरों की कुर्सियों पर तैनाती हर तरफ व्यवस्था की परीक्षा है। स्वास्थ्य विभाग को अब सफाई नहीं, हिसाब देना होगा। मरीजों की सेहत संभालने का दावा करने वाले महकमे की अपनी प्रशासनिक सेहत बिगड़ी हुई है। इसे दुरुस्त करने की जिम्मेदारी भी उसी विभाग और उसके नेतृत्व की है।

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