41% का जश्न या 59% की चीख? वो हकीकत जो रिपोर्टों और पीआर के पुलिंदों में गुम है

41% का जश्न या 59% की चीख? वो हकीकत जो रिपोर्टों और पीआर के पुलिंदों में गुम है

राजधानी – सरकार अपने गले में 41% का हार पहनकर जश्न मना रही है , और चमकीले काग़ज़ों पर पीआर रिपोर्ट छपवा रही है। जहाँ दावों की झड़ी लगाई जा रही और तालियों की गूंज में मुखिया मुस्कुराते हुए जनता की आंखों में इमेज झोंक रहे हैं। लेकिन सवाल है क्या 41% पासिंग मार्क्स भी गर्व का विषय हैं क्या ? जब नौकरी में 99% से नीचे वालों को फेल कर दिया जाता है, तब शासन-प्रशासन को 41% पर शाबाशी क्यों?

जबकिं जमीनी हकीकत इन आकड़ो को मुहबाये चिढ़ा रहे है। प्रदेश में कानून व्यवस्था पूरी तरह ठप्प हो चुकी है। राजधानी अब ड्रग माफियाओं का अड्डा बन चुकी है। विदेश से माल आता है, मोहल्लों में बंटता है और सत्ता मूकदर्शक बनी बैठी है। एक साहब आये तो थे निजात दिलाने, मगर सिक्कों की खनक में बेआबरू हो गए। निजात ऐसा किया कि राजधानी आज इंटरनेशनल ड्रग सेंटर बन गई। और न्यायधानी अपराधधानी कहलाने लगी , जहाँ चाकूबाज़ी से लेकर हत्या तक खुलेआम हो रही है। गृहमंत्री का गृह ज़िला बेकाबू है। बस्तर में पत्रकार मारे जाते हैं, बलौदाबाज़ार में जिला कार्यालय जलाया जाता है, गाँव-गाँव में लूट और हत्या आम बात हो चुकी है। आंकड़े चाहे जितने छपवा लो साहब जनता महसूस कर रही है कि वह अब सुरक्षित नहीं है।

एक तरफ जहाँ सुरक्षा नदारद है, वहीं भ्रष्टाचार का ताज चमक रहा है। शायद इतिहास में पहली बार भ्रष्टाचार ने इतनी ऊँचाई छुई है। लाखों के सामान करोड़ों में खरीदे जा रहे हैं दस लाख की टीवी, 51 लाख के जग, लाखों की कुर्सियाँ यहाँ तक कि चप्पल तक घोटाले में घसीट ली गई। और यह सब उस विभाग में हो रहा है, जिसका नेतृत्व खुद मुखिया करते हैं। विभाग आदिवासी हित में सौंपा गया था, मगर आदिवासी मंत्री अब ठेकेदार के आगे नतमस्तक हैं। विभाग पूरी तरह ठेके पर है, और लक्ष्मीपुत्र की मरज़ी के बिना वहाँ पत्ता भी नहीं हिलता। नतीजा आदिवासियों का दोहन हो रहा और साहेब मुंबई के बंगले के झूमरों में खोए हुए।

स्वास्थ्य विभाग की हालत तो और भी बेहाल है। फंगस लगी दवाइयाँ बाजार में बिक रही हैं, अस्पताल खुद इलाज ढूँढ रहे हैं और मंत्री जी क्रीज़ पर पैर जमाने में व्यस्त हैं। लेब टेक्नीशियन से लेकर बड़े अफ़सर तक रिश्तेदारी की चेन में बंधे हैं। ट्रांसफ़र-पोस्टिंग का ऐसा बाजार सजा है कि कुर्सियाँ बोली लगाकर खरीदी जाती हैं। और मंत्री जी है कि कभी शराब भट्टी का निरीक्षण करने पहुँच जाते हैं, कभी पेड़ प्रमोशन की कहानियाँ सुनाने लगते हैं। साहेब, आपका काम स्वास्थ्य संभालना है, शराब पर भाषण देना नहीं। सिनेमाघर तक चेतावनी लिखते हैं शराब सेहत के लिए हानिकारक है कम से कम भट्टी जाते वक्त यही जुमला तो बोल दिया कीजिये।

राज्य में शराब बनाम शिक्षा की लड़ाई साफ़ दिख रही है। शराब की दुकानें खोलने के तर्क ढूँढे जा रहे हैं कि यह राजस्व का जरिया है। मगर दूसरी तरफ़ स्कूल बंद किए जा रहे हैं। देश की रीढ़ शिक्षा है, लेकिन इस राज्य की रीढ़ शराब से सींची जा रही है।

सूबे में जंगल और हसदेव की चीख़ भी गूंज रही है। जंगल कट रहे हैं, आदिवासियों की पुकार अनसुनी है। सरकार कहती है पिछली सरकार ने मंजूरी दी थी। सवाल है क्या आप अब भी पिछली सरकार हैं? केंद्र में भी आपकी ही सत्ता है, मंजूरी रद्द क्यों नहीं करते? हसदेव, तमनार और कोरबा कराह रहे हैं, मगर सत्ता के कानों में पीआर के ढोल बज रहे हैं। वही एक मंत्री साहेब हैं जिन्होंने अंजोर दिखाने के नाम पर अंधेरा परोस दिया। वित्त विभाग भी उन्हीं के पास है और नौकरशाही का घमंड 13 करोड़ के शाही दफ़्तर में बैठा है, जिसे अफ़सर 13 लाख बताते हैं। सवाल सीधा है लाख या करोड़? दफ़्तर सजाना ज़रूरी है या बेरोज़गार युवाओं को नौकरी देना? आज युवा रोजगार मांग रहा है, किसान खाद के लिए भटक रहा है, व्यापारी सुकून ढूँढ रहा है और सरकार 2047 के सपनों की ब्रांडिंग कर रही है। पीआर का खेल जारी है और साहेब युवाओं की फरियाद सुनकर मुस्कुराते हुए निकल जाते हैं।

महिला एवं बाल विकास विभाग भी तमाशा बन चुका है। महिला मंत्री जी रील बनाने में मशगूल हैं। न महिलाओं का विकास हो रहा है, न बच्चों का संरक्षण। संवेदनशील विभाग रील और विवाद में उलझ गया है। सवाल यह है कि आखिर इसे मज़ाक का मंच क्यों बना दिया गया?

किसान और आदिवासी दोनों विभाग सौदेबाज़ी में बदल चुके हैं। किसान खाद के लिए परेशान हैं, सरकार समर्थन मूल्य का श्रेय ले रही है। लेकिन खाद ही नहीं मिलेगा तो खेत में फसल कहाँ से उगेगी? आदिवासी विभाग सीधे ठेके पर दे दिया गया है जैसे कोई प्राइवेट कंपनी हो।

इन सब पर मुखिया चुप हैं और अफसरों का पीआर खेल जारी है। करोड़ों का बजट इमेज चमकाने में बहाया जा रहा है। रिपोर्टे छप रही हैं, कवर स्टोरी बन रही है और नेता हंसी के पात्र बनते जा रहे हैं। मगर जनता अब समझ चुकी है। सवाल सिर्फ इतना है जब 59% जनता दुखी है तो 41% का जश्न क्यों? अगर आंकड़े ही खरीदने हैं तो और करोड़ बहाकर 70% तक का स्कोर भी छपवा लीजिए। लेकिन जनता अब रिपोर्टो में नहीं, ज़मीन पर बदलाव चाहती है। उसे चाहिए कानून-व्यवस्था, रोजगार, भ्रष्टाचार से निजात, स्वास्थ्य और शिक्षा।

ऐसे में मुखिया को जापान कोरिया की बातें छोड़कर, पहले अपने गाँव-गली और शहर संवारने की जरूरत है। वरना आने वाला वक्त यही कहेगा साहेब ने आंकड़े दिखाए लेकिन ज़मीन चीख़ रही थी और जनता ने आखिरकार इमेज झोंकने वालों को धूल चटा देगी।

 

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