नकटी में बुलडोजर, जनसम्पर्क विभाग के संजीव तिवारी से जुड़े तालाब विवाद पर सन्नाटा! गरीब के लिए कानून, रसूखदारों के लिए रहम –

नकटी में बुलडोजर, जनसम्पर्क विभाग के संजीव तिवारी से जुड़े तालाब विवाद पर सन्नाटा! गरीब के लिए कानून, रसूखदारों के लिए रहम –
रायपुर : – कानून की सबसे बड़ी ताकत उसकी निष्पक्षता होती है। लेकिन रायपुर में इन दिनों एक ऐसा सवाल खड़ा हो गया है, जिसका जवाब शायद प्रशासन के पास भी नहीं है। सवाल यह है कि आखिर सरकारी जमीन पर कार्रवाई का पैमाना अलग-अलग क्यों है? गरीब के घर पर बुलडोजर चंद घंटों में पहुंच जाता है, लेकिन जब सवाल रसूखदारों से जुड़े मामलों का आता है तो फाइलें चलती हैं, नोटिस निकलते हैं, जांच बैठती है, अधिकारी बदल जाते हैं, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं बदलता।
इसका ताजा उदाहरण नकटी गांव और अमलीडीह के दो मामले हैं। नकटी गांव में सरकारी जमीन खाली कराने के लिए पूरा प्रशासन उतर पड़ा। हजारों पुलिसकर्मी, बुलडोजर, बेरिकेडिंग, ड्रोन निगरानी और घंटों तक चला अभियान। प्रशासन यह संदेश देना चाह रहा है कि सरकारी जमीन पर किसी भी प्रकार का अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। लेकिन नकटी गांव में गरीब परिवारों के मकान देखते-देखते मलबे में बदल गए। प्रशासन ने कानून का हवाला दिया और कहा कि सरकारी जमीन हर हाल में खाली कराई जाएगी।
लेकिन इसी रायपुर में एक दूसरा मामला वर्षों से सरकारी फाइलों में कैद है।
यह मामला अमलीडीह स्थित एटमोसफिरिया रेस्टोरेंट का है। जिस भूमि पर आज यह व्यवसायिक प्रतिष्ठान संचालित हो रहा है, वह सरकारी रिकॉर्ड में तालाब के रूप में दर्ज है। पहले धीरे-धीरे तालाब का भराव कर उसका मूल स्वरूप समाप्त कर दिया गया और आज उसी स्थान पर व्यवसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं।
दरअसल तालाब केवल पानी से भरा गड्ढा नहीं होता। तालाब शहर का जल बैंक होता है। भूजल को जीवित रखता है। बारिश के पानी को समेटता है। गर्मी में धरती को सांस देता है। सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर अमृत सरोवर, जल संरक्षण और जल संवर्धन की योजनाएं चला रही है। मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक जल संरक्षण की बात करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि अगर सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज एक तालाब ही खत्म हो जाए तो सिस्टम की संवेदनशीलता आखिर कहाँ चली जाती है?
इस पूरे मामले में लंबे समय से जनसम्पर्क विभाग में पदस्थ संजीव तिवारी (एस.के. तिवारी) का नाम है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार रेस्टोरेंट का संचालन उनकी पत्नी सरिता तिवारी के नाम से है, जबकि परिवार की सदस्य श्रेष्टा तिवारी का नाम किरायानामे से जुड़े दस्तावेजों में दर्ज है। दस्तावेजों के अनुसार प्रतिमाह लगभग 1.65 लाख रुपये किराये का उल्लेख भी है।
यह मामला केवल शिकायतों तक सीमित नहीं रहा। शिकायतें रायपुर कलेक्टर, संभागायुक्त और नगर निगम तक पहुंचीं। नगर निगम की ओर से नोटिस जारी हुआ। संभागायुक्त कार्यालय ने कार्रवाई के निर्देश दिए। पत्राचार हुआ। जांच की बात हुई। लेकिन एक साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यदि संबंधित स्थल पर स्थिति यथावत दिखाई देती है तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर कार्रवाई किस मोड़ पर रुक गई?
यहीं से व्यवस्था कठघरे में खड़ी हो जाती है।
अगर नकटी गांव में सरकारी जमीन बचाने के लिए पूरा प्रशासन रातों-रात सक्रिय हो सकता है, तो फिर तालाब बचाने के लिए वही तत्परता क्यों नहीं दिखाई देती? क्या तालाब की जमीन सरकारी जमीन नहीं है? क्या प्राकृतिक जलस्रोतों की कोई कीमत नहीं है? क्या पर्यावरण संरक्षण केवल भाषणों और सरकारी विज्ञापनों तक सीमित रह गया है?
सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जिस विभाग की जिम्मेदारी सरकार की छवि बनाना है, उसी विभाग से जुड़े अधिकारी का नाम इस पूरे विवाद में शिकायतों के है। ऐसे में यह मामला केवल एक रेस्टोरेंट या एक अधिकारी तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि सरकार की उस व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है जो दावा करती है कि कानून सबके लिए बराबर है।
आज रायपुर की जनता प्रशासन से सिर्फ एक जवाब चाहती है। यदि शिकायतें गलत हैं तो स्पष्ट रूप से कहा जाए कि वे गलत हैं। यदि शिकायतें सही हैं तो कार्रवाई कब होगी? आखिर सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज तालाब की जमीन पर उठे सवालों का जवाब कौन देगा?
नकटी गांव ने यह साबित कर दिया कि बुलडोजर चलाना प्रशासन के लिए मुश्किल काम नहीं है। अब रायपुर यह देखना चाहता है कि कानून की धार सिर्फ गरीब की झोपड़ी तक सीमित है या फिर वह रसूखदारों के दरवाजे तक भी पहुंचती है।
“झोपड़ी पर चला बुलडोजर व्यवस्था की ताकत दिखाता है, लेकिन अगर तालाब बचाने में वही व्यवस्था कमजोर पड़ जाए, तो सवाल बुलडोजर पर नहीं, नीयत पर उठते हैं।”










