PMGSY के प्रभारी प्रमुख अभियंता के.के. कटारे पर फिर उठे सवाल, मुख्य सचिव के निर्देश के बाद बढ़ा दबाव, अब होगी कार्रवाई या मिलेगा अभयदान?

PMGSY के प्रभारी प्रमुख अभियंता के.के. कटारे पर फिर उठे सवाल, मुख्य सचिव के निर्देश के बाद बढ़ा दबाव, अब होगी कार्रवाई या मिलेगा अभयदान?
रायपुर : – छत्तीसगढ़ में फर्जी जाति प्रमाण-पत्र के आधार पर सरकारी सेवा प्राप्त करने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों पर नियमानुसार कार्रवाई के मुख्य सचिव विकासशील के निर्देशों के बाद एक बार फिर प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के प्रभारी प्रमुख अभियंता के.के. कटारे का मामला चर्चा में आ गया है।
कटारे का जाति प्रमाण-पत्र उच्च स्तरीय प्रमाणीकरण छानबीन समिति द्वारा निरस्त किए जाने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार केवल सामान्य निर्देशों तक सीमित रहेगी या इस बहुचर्चित मामले में ठोस प्रशासनिक कार्रवाई भी होगी?
सवाल सिर्फ जाति प्रमाण-पत्र का नहीं, पूरी नियुक्ति प्रक्रिया का –
इस पूरे मामले में अब केवल जाति प्रमाण-पत्र ही नहीं, बल्कि वर्ष 1994 में हुई नियुक्ति प्रक्रिया भी जांच के दायरे में है। दस्तावेज बताते है कि के.के. कटारे का जन्म महाराष्ट्र के भंडारा जिले के तुमसर में हुआ था। वे वर्ष 1992 की विशेष भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से अनुसूचित जाति वर्ग में चयनित होकर बाद में सहायक यंत्री बने और लगभग तीन दशक में पदोन्नति पाकर आज PMGSY प्रभारी प्रमुख अभियंता के पद तक पहुंचे। ऐसे में यदि जाति प्रमाण-पत्र की वैधता पर ही गंभीर आपत्ति थी, तो नियुक्ति, पदोन्नतियों और आरक्षण का लाभ किस वैधानिक आधार पर मिलता रहा?
चयन सूची में नाम नहीं, फिर नियुक्ति कैसे?
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा 24 अगस्त 1994 को जारी प्रारंभिक नियुक्ति सूची में सात अभ्यर्थियों के नाम थे, जिनमें के.के. कटारे का नाम शामिल नहीं था। बाद में उनकी नियुक्ति किस प्रक्रिया, किस आदेश और किस नियम के तहत हुई, यही अब जांच का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु माना जा रहा है।
PSC के रोके गए परिणाम से जुड़ा है मामला –
रिकॉर्ड बताते हैं कि तत्कालीन मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग ने मार्च 1994 में एक आरक्षित पद का परिणाम रोकने की सूचना दी थी। बाद में उसी प्रक्रिया में के.के. कटारे का चयन हुआ। अब सवाल यह उठ रहा है कि उस पूरी चयन प्रक्रिया में क्या सभी वैधानिक नियमों का पालन किया गया था या नहीं। जब प्रारंभिक नियुक्ति ही विवादित है तो उसके बाद मिली पदोन्नतियों, वरिष्ठता और सेवा लाभों की वैधानिक कैसे सही हो सकती है?
मुख्य सचिव के निर्देश के बाद अब क्या? –
हाल ही में मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि फर्जी जाति प्रमाण-पत्र के आधार पर नियुक्ति या पदोन्नति पाने वालों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होगी। जाति प्रमाण-पत्र जांच प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाएगा। संबंधित विभागों के बीच समन्वय बढ़ाया जाएगा। आदिवासी हितों से जुड़े मामलों की निगरानी के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित होगी। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जिस अधिकारी का मामला पहले से राज्य की उच्च स्तरीय जांच समिति तक पहुंच चुका है, उसके मामले में अब प्रशासन अगला कदम क्या उठाएगा?
आखिर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं?
यही वह प्रश्न है जो पूरे प्रकरण को सबसे अधिक संवेदनशील बनाता है। यदि उच्च स्तरीय समिति जाति प्रमाण-पत्र निरस्त करने का आदेश दे चुकी है, तो क्या विभागीय जांच शुरू हुई? क्या सेवा अभिलेखों की समीक्षा की गई? क्या नियुक्ति और पदोन्नति की वैधानिक जांच प्रारंभ हुई? क्या संबंधित अधिकारी को जांच पूरी होने तक पद से अलग करने पर विचार हुआ? आखिर किस स्तर पर फाइल रुकी हुई है?
गौरतलब है कि वर्तमान में के.के. कटारे को शासन ने PMGSY एवं ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (RES) के प्रभारी प्रमुख अभियंता की जिम्मेदारी सौंप रखी है। इसके अलावा उनके पास मुख्य अभियंता (निर्माण), संधारण, MMGSY, RCTRANC, RRNMU, सेतु, स्थापना तथा टेंडर सेल सहित कई महत्वपूर्ण शाखाओं का अतिरिक्त प्रभार भी है। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि जब जाति प्रमाण-पत्र और नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर गंभीर विवाद एवं जांच के आदेश पहले से मौजूद हैं, तब इतने महत्वपूर्ण प्रभार एक ही अधिकारी के पास क्यों बनाए रखे गए हैं? क्या जांच पूरी होने तक इन प्रभारों की समीक्षा नहीं होनी चाहिए?
क्या किसी का संरक्षण?
प्रशासनिक गलियारों में अब चर्चा इस बात की भी है कि इतने गंभीर आदेशों के बावजूद यदि कार्रवाई लंबित रहती है, तो यह स्वाभाविक रूप से कई सवाल खड़े करेगी। क्या वर्षों से प्रभावशाली पदों पर बने रहने के कारण यह मामला फाइलों में दबा रहा? क्या विभागीय स्तर पर किसी ने कार्रवाई टाली? क्या राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण के कारण अब तक निर्णायक कदम नहीं उठाया गया?
इन सवालों का उत्तर केवल सरकार और संबंधित विभाग ही दे सकते हैं।
अब निगाहें मुख्य सचिव और सरकार पर –
मुख्य सचिव के ताज़ा निर्देशों के बाद अब यह मामला एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर दिखाई दे रहा है। यदि सरकार अपने ही निर्देशों के अनुरूप पारदर्शी जांच कराती है तो यह केवल एक अधिकारी का मामला नहीं रहेगा, बल्कि आरक्षण व्यवस्था की विश्वसनीयता और प्रशासनिक जवाबदेही की भी बड़ी परीक्षा होगी।










