राहुल गांधी के ट्वीट के बाद घिरा पाँचवीं मंज़िल का IPL मॉडल? NEET विवाद वाले पूर्व NTA DG, सरदार क्रिकेट नेटवर्क, BCCI कनेक्शन और VIP बीयर पार्टी पर उठे बड़े सवाल –

राहुल गांधी के ट्वीट के बाद घिरा पाँचवीं मंज़िल का IPL मॉडल? NEET विवाद वाले पूर्व NTA DG, सरदार क्रिकेट नेटवर्क, BCCI कनेक्शन और VIP बीयर पार्टी पर उठे बड़े सवाल –

रायपुर : – नया रायपुर के शहीद वीर नारायण सिंह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में हुआ RCB vs MI मुकाबला अब सिर्फ क्रिकेट मैच नहीं रह गया है। यह आयोजन अब सत्ता, सिस्टम, शराब नेटवर्क, वीआईपी कल्चर और पाँचवीं मंज़िल की ताकत को लेकर बड़े सवालों के केंद्र में आ गया है। मैदान में चौके-छक्के जरूर लगे, लेकिन स्टेडियम के बाहर जनता जिस अव्यवस्था, लूट और अपमान से गुजरी, उसने पूरे सिस्टम को कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया है।

अब यह सिर्फ एक मैच की कहानी नहीं रही।
यह उस पूरे मॉडल की कहानी बनती जा रही है जहाँ सरकारी संसाधन लगते हैं, सरकारी मशीनरी लगती है, सरकारी बिजली लगती है, सरकारी स्टेडियम लगता है… लेकिन फायदा कुछ खास नेटवर्क और रसूखदार लोगों तक सीमित दिखाई देता है।

सबसे बड़ा सवाल अब फिर उसी पाँचवीं मंज़िल को लेकर उठ रहा है। हाँ वही पाँचवीं मंज़िल जहाँ सत्ता के सबसे बड़े फैसले होते हैं। जहाँ फाइलें सिर्फ साइन नहीं होतीं, पूरा खेल तय होता है। सत्ता के गलियारों में यह चर्चा तेज है कि IPL आयोजन से लेकर स्टेडियम लीज, व्यवस्थाओं और पूरे संचालन का खाका ऊपर ही तय हुआ था। और अब इस पूरे मामले में नया राजनीतिक विस्फोट Rahul Gandhi के ताज़ा सोशल मीडिया पोस्ट ने कर दिया है।

राहुल गांधी ने NEET-2024 विवाद को लेकर सवाल उठाते हुए पूछा कि उस समय NTA का DG कौन था और आज वह कहाँ बैठा है। यह सवाल आते ही छत्तीसगढ़ की नौकरशाही और सत्ता के गलियारों में अचानक हलचल तेज हो गई। क्योंकि जिस अफसर पर आज युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ के आरोपों के संदर्भ में सवाल उठ रहे हैं, वही अफसर आज छत्तीसगढ़ की सत्ता के सबसे ताकतवर चेहरों में गिना जाता है।

राष्ट्रीय परीक्षा व्यवस्था पर सवालों और NEET परीक्षा में भारी गड़बड़ियों के आरोपों के बीच चर्चा यह भी रही कि केंद्र ने प्रतिनियुक्ति अवधि पूरी होने से पहले ही उन्हें वापस भेज दिया गया। और यहाँ सत्ता के भीतर यह नैरेटिव फैलाया गया कि उन्हें विशेष जिम्मेदारी के तहत छत्तीसगढ़ भेजा गया है। रायपुर पहुँचते ही उन्होंने कई बैठकों में यह संदेश दिया कि उन्हें केंद्र ने सरकार की मॉनिटरिंग, समीक्षा और प्रशासनिक कामकाज को ट्रैक करने के लिए भेजा है। लेकिन सत्ता के गलियारों में अब तंज कुछ और ही सुनाई देता है कि मॉनिटरिंग करते-करते कब यह अफसर खुद पूरा सिस्टम ऑपरेट और खुद सरकार बन गया यह पता ही नही चला, ऊर्जा विभाग से लेकर मुख्यमंत्री सचिवालय और पाँचवीं मंज़िल की सबसे प्रभावशाली कुर्सियों तक पहुँच गया। अब सत्ता के भीतर कई लोग कटाक्ष में कहते हैं दिल्ली में परीक्षा गड़बड़ी का मुख्य आरोपी आज पूरा पॉवर सिस्टम बन गया है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या केंद्र को इन परिस्थितियों की जानकारी नहीं थी? क्या इंटेलिजेंस एजेंसियों तक फीडबैक नहीं पहुँचा? या फिर सिस्टम के भीतर कुछ चेहरे इतने मजबूत हो चुके हैं कि सवाल उठने के बाद भी उनकी ताकत कम नहीं होती बल्कि और बढ़ती जाती है?

राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा भी तेज है कि छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक और नीतिगत फैसलों के पीछे इसी अफसर की बड़ी भूमिका मानी जाती रही है। IPL आयोजन, स्टेडियम संचालन, क्रिकेट नेटवर्क और कुछ खास कारोबारी समूहों की बढ़ती पकड़ को भी अब उसी पाँचवीं मंज़िल से जोड़कर देखा जा रहा है। बतादें कि शहीद वीर नारायण सिंह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम लगभग 145 करोड़ रुपये की लागत से बना था। 65 हजार क्षमता वाला यह स्टेडियम राज्य की पहचान है। लेकिन रखरखाव के नाम पर इसे क्रिकेट संघ को लीज पर दे दिया गया। इसी परिसर में क्रिकेट अकादमी के लिए लगभग 7.96 एकड़ जमीन भी दी गई। जिसका पूरा खाका पांचवी मंजिल में ही तय हुआ।

अब सवाल उठ रहा है कि क्या यह सिर्फ खेल विकास था या एक बड़ा नेटवर्क तैयार किया जा रहा था? क्योंकि जिस आयोजन को क्रिकेट उत्सव कहा गया, वहाँ जनता को सुविधा नहीं, रेट कार्ड मिला। 2500 रुपये से लेकर 50 हजार रुपये तक टिकट बिके। सोशल मीडिया पर टिकट कालाबाजारी की चर्चाएँ चलती रहीं। हजारों दर्शकों का आरोप रहा कि टिकट होने के बावजूद सीटें किसी और को दे दी गईं। अगर 43 हजार लोगों की एंट्री हुई तो टिकट मॉनिटरिंग कौन कर रहा था? GST विभाग कहाँ था? कमर्शियल टैक्स विभाग क्या कर रहा था? खाद्य विभाग ने रेट चेक क्यों नहीं किया? नापतौल विभाग ने पानी और खाद्य सामग्री की कीमतों पर निगरानी क्यों नहीं की?
क्या पूरा सिस्टम सिर्फ VIP लाउंज की मेहमाननवाजी में लगा हुआ था?

दर्शकों ने बताया कि 10-20 रुपये का पानी 150 से 200 रुपये तक बेचा गया। समोसे 50-100 रुपये तक। पार्किंग के नाम पर अलग वसूली लेकिन व्यवस्था पूरी तरह बिखरी हुई। यानी जनता पैसा देती रही और सिस्टम तमाशा देखता रहा। दूसरी तरफ VVIP बॉक्स में एसी लाउंज, स्पेशल सर्विस और बीयर पार्टी की तस्वीरें चर्चा में रहीं। सबसे ज्यादा चर्चा शिम्बा बीयर ब्रांड को लेकर हुई। सोशल मीडिया पर लोग लिखते रहे कि यह मैच कम और ब्रांड प्रमोशन ज्यादा था।

अब राजनीतिक हलकों में सवाल और तेज हो गया है कि क्या शराब कारोबार से जुड़े नेटवर्क अब क्रिकेट और सरकारी ढाँचों तक गहरी पकड़ बना चुके हैं? क्योंकि जिस सरदार नेटवर्क की चर्चा शराब कारोबार में होती थी, अब वही क्रिकेट सिस्टम के भीतर भी सबसे प्रभावशाली माना जा रहा है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसी कारोबारी परिवार का एक चेहरा राष्ट्रीय क्रिकेट प्रशासन में भी बेहद प्रभावशाली माना जाता है और उसका नाम Board of Control for Cricket in India के जॉइंट सेक्रेटरी पद तक जुड़ चुका है। यही वजह है कि अब रायपुर IPL आयोजन को लोग सिर्फ एक स्पोर्ट्स इवेंट नहीं, बल्कि सत्ता, कारोबार और क्रिकेट नेटवर्क के बड़े गठजोड़ के रूप में देखने लगे हैं।

महिलाओं की सुरक्षा पर भी सवाल उठे। पर्स तक पर रोक लेकिन अंदर धक्का-मुक्की, झगड़े, सीट विवाद और सुरक्षा अव्यवस्था खुलकर दिखाई दी। क्रिकेट प्रेमियों का सबसे बड़ा दर्द यह भी है कि जिन लोगों ने जिंदगी में क्रिकेट खेला तक नहीं, वही आज करोड़ों के क्रिकेट सिस्टम और फैसलों पर बैठे हैं। अब सरकार कह रही है स्टेडियम लीज पर है, जिम्मेदारी क्रिकेट संघ की है। क्रिकेट संघ कह रहा है IPL और BCCI सब देख रहे थे। BCCI चुप है। विभाग चुप हैं। और जनता पूछ रही है जवाबदेह कौन है?

लेकिन अब यह मामला सिर्फ क्रिकेट का नहीं रहा। यह युवाओं के भविष्य, सिस्टम की जवाबदेही और सत्ता के उस मॉडल का सवाल बन चुका है जहाँ हर विवाद के बाद ताकतवर चेहरे और ताकतवर होते जाते हैं। सत्ता के भीतर अब एक और चर्चा तेज है कि क्या 2028 के चुनाव की पूरी रणनीति भी अब अफसरशाही मॉडल पर खड़ी की जा रही है? क्या राजनीतिक नेतृत्व के बजाय नौकरशाही चुनावी नैया पार लगाने की तैयारी में जुटी है? और अगर जनता का असंतोष इसी तरह बढ़ता रहा, तो क्या यह मॉडल सत्ता को बचा पाएगा?

कई राजनीतिक जानकार मानते हैं कि प्रदेश के वर्तमान आदिवासी मुखिया की सबसे बड़ी ताकत उनकी सरलता और सहजता है। लेकिन सत्ता के भीतर अब यह आरोप भी फुसफुसाहटों में सुनाई देता है कि इसी सरलता का फायदा उठाकर असली नियंत्रण कहीं और से ऑपरेट किया जा रहा है। फैसले ऊपर से आते हैं, फाइलें ऊपर से चलती हैं और राजनीतिक जवाबदेही नीचे खड़ी रहती है।

यही वजह है कि सरकार को लेकर जो असंतोष जमीन पर दिखाई देने लगा है, उसका ठीकरा अब धीरे-धीरे उसी अफसरशाही मॉडल पर फूटता दिख रहा है। और अब राहुल गांधी के ट्वीट ने उस बेचैनी को पाँचवीं मंज़िल तक पहुँचा दिया है। क्योंकि सवाल सिर्फ NEET का नहीं है। सवाल यह भी है कि जिस सिस्टम पर युवाओं का भविष्य सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी थी क्या वही सिस्टम अब छत्तीसगढ़ में भी युवाओं के सपनों को नेटवर्क, लॉबी और कारोबार के हवाले कर रहा है?

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