रिश्वत से भर्ती घोटाले तक, वसूली से सरकारी संपत्ति के दुरुपयोग तक… सरकार बदली, स्पीकर बदले, विधानसभा भवन बदला, लेकिन सचिव की कुर्सी पर दिनेश शर्मा बरकरार! नवंबर में फिर सेवावृद्धि की तैयारी –

रायपुर – छत्तीसगढ़ में सरकार बदली, विधानसभा अध्यक्ष बदले, नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी बदली और विधानसभा का भवन तक बदल गया, लेकिन एक चीज नहीं बदली विधानसभा सचिव दिनेश शर्मा की कुर्सी। कांग्रेस शासनकाल में डॉ. चरणदास महंत के विधानसभा अध्यक्ष रहते सचिव बने शर्मा, सत्ता परिवर्तन के बाद भी उसी पद पर कायम रहे। महंत अध्यक्ष से नेता प्रतिपक्ष हो गए, भाजपा सरकार में डॉ. रमन सिंह विधानसभा अध्यक्ष बन गए, लेकिन सचिवालय के प्रशासनिक मुखिया की कुर्सी पर शर्मा का दबदबा बरकरार रहा। नवंबर 2025 में सेवानिवृत्ति के बाद मिला एक साल का सेवा विस्तार नवंबर 2026 में पूरा होने जा रहा है। अब एक बार फिर सेवावृद्धि की तैयारी का सवाल खड़ा है। आखिर विधानसभा सचिवालय में ऐसा कौन-सा प्रशासनिक संकट है कि विवादों और शिकायतों के बीच भी एक ही अधिकारी पर बार-बार भरोसा जताया जा रहा है।
चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से विधानसभा सचिव तक का सफर –
दिनेश शर्मा की नियुक्ति और पदोन्नति का सफर भी अपने आप में लंबा है। वर्ष 1985-86 में विश्वविद्यालय में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में शुरुआत हुई। 23 मार्च 1987 को मध्यप्रदेश विधानसभा में द्वितीय श्रेणी राजपत्रित पद पर नियुक्ति का आदेश जारी हुआ और 2 अप्रैल 1987 को कार्यभार ग्रहण किया। वर्ष 1993 से 1995 तक चरणदास महंत के वाणिज्यिक कर राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के निजी स्टाफ में रहे। 1995 से 1998 तक गृह एवं जनसंपर्क मंत्री के निजी स्टाफ में कार्य किया। वर्ष 2011 से 2013 तक केंद्रीय कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण राज्यमंत्री के निजी स्टाफ में रहे। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार बनने के बाद डॉ. चरणदास महंत के विधानसभा अध्यक्ष रहते उनके निजी स्थापना में पहुंचे। 1 नवंबर 2020 को वर्तमान संवर्ग में नियुक्ति/पदोन्नति का आदेश हुआ और अप्रैल 2022 में विधानसभा सचिव की जिम्मेदारी संभाली। महंत के कार्यकाल में सचिव बने शर्मा ने सत्ता परिवर्तन के बाद भी पद नहीं छोड़ा। नवंबर 2025 में सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें एक वर्ष का सेवा विस्तार मिला। अब उसी अवधि के समाप्त होने से पहले एक और विस्तार की कवायद पर सवाल उठ रहे हैं।
रिश्वत का वायरल वीडियो, EOW तक पहुंचा मामला –
दिनेश शर्मा का नाम विधानसभा सचिवालय में भर्ती प्रक्रिया की अनियमितताओं और नियुक्तियों में आर्थिक लेन-देन के आरोपों को लेकर विवादों में रहा है। भर्ती के नाम पर पैसे लेने से जुड़ा एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें शर्मा को पैसे लेते हुए दिखाया गया। इस वीडियो को भाजपा के सोशल मीडिया तंत्र ने भी प्रचारित किया था। मामले में शिकायतें हुईं और आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) तक शिकायत पहुंची।शिकायतकर्ताओं ने विधानसभा अध्यक्ष कार्यालय तक रिपोर्ट भेजे जाने का भी उल्लेख किया। इसके बावजूद इस प्रकरण में जांच की स्थिति और कार्रवाई का स्पष्ट ब्यौरा सार्वजनिक नहीं हुआ है। नियुक्तियों में आर्थिक लेन-देन के आरोपों की जांच का निष्कर्ष सामने आना जरूरी है, ताकि आरोपों की सच्चाई और जिम्मेदारी दोनों तय हो सकें।
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47 पदों की भर्ती लंबित, दूसरी नियुक्तियों पर सवाल –
विधानसभा सचिवालय की भर्ती व्यवस्था का बड़ा उदाहरण सहायक ग्रेड-3 के 47 पदों की भर्ती है। वर्ष 2019 में विज्ञापन जारी हुआ, आवेदन लिए गए और दिसंबर 2021 में लिखित परीक्षा भी हुई। इसके बाद अभ्यर्थियों की नियुक्ति लंबे समय तक लंबित रही। दूसरी ओर सहायक ग्रेड-3 सह अनुवादक, वाहन चालक और बुक लिफ्टर सहित अन्य पदों पर नियुक्तियों को लेकर सवाल उठे।
शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया कि खुली भर्ती प्रक्रिया लंबित रखते हुए विधानसभा से जुड़े कर्मचारियों के रिश्तेदारों और परिचितों को नियुक्तियां दी गईं। आरक्षण के नियमों के पालन पर भी सवाल उठे। अविनाश साहू की ओर से इस संबंध में न्यायालय में परिवाद पेश किया गया। सूचना के अधिकार के तहत नियुक्तियों का पूरा ब्यौरा मांगने पर जानकारी नहीं मिलने की शिकायत भी हुई।
सवाल उन अभ्यर्थियों का है जिन्होंने विज्ञापन देखकर आवेदन किया, परीक्षा दी और वर्षों तक नियुक्ति का इंतजार किया। जब 47 पदों की भर्ती अधूरी रही और दूसरी नियुक्तियों पर विवाद उठा, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि उन नियुक्तियों का आधार क्या था, चयन किस नियम के तहत हुआ और आरक्षण के प्रावधानों का पालन कैसे किया गया।
सहायक मार्शल भर्ती सात की सेवा समाप्त, सुशांत राय पर सवाल –
विधानसभा सचिवालय की सहायक मार्शल भर्ती का विवाद भी गंभीर सवाल खड़े करता है। भर्ती सूची में आठ नाम दर्ज थे और सभी के सामने सीधी भर्ती का उल्लेख था। इनमें सुशांत राय का नाम भी शामिल था। भर्ती प्रक्रिया की वैधता को लेकर मामला हाईकोर्ट पहुंचा और न्यायिक कार्यवाही के बाद सात लोगों की सेवाएं समाप्त कर दी गईं।
लेकिन सुशांत राय की सेवा जारी रही। वे पहले तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष नारायण चंदेल के कार्यालय में विशेष सहायक रहे और अब मंत्री गुरु खुशवंत साहेब के ओएसडी के रूप में कार्यरत हैं। जब एक ही भर्ती सूची में शामिल सात लोगों की सेवाएं समाप्त हुईं, तो सुशांत राय किस आदेश और कानूनी आधार पर सेवा में बने रहे? क्या उन्हें न्यायालय से अलग राहत मिली थी या उनकी नियुक्ति के दस्तावेज दूसरे अभ्यर्थियों से अलग थे? इसका जवाब नियुक्ति आदेश और न्यायिक रिकॉर्ड से सामने आना चाहिए।
सरकारी गाड़ी से निजी यात्रा और संपत्ति के हिसाब तक विवाद –
दिनेश शर्मा की कार्यशैली पर सवाल भर्ती तक सीमित नहीं रहे। फरवरी 2025 में प्रयागराज कुंभ यात्रा के दौरान शासकीय वाहन के इस्तेमाल और सिलतरा के पास दुर्घटना से जुड़ा विवाद भी उठा। आरोप लगाया गया कि निजी यात्रा के लिए सरकारी वाहन का उपयोग किया गया और दुर्घटना के बाद पुलिस कार्रवाई को प्रभावित करने की कोशिश हुई। वाहन के उपयोग, यात्रा की स्वीकृति और दुर्घटना संबंधी पुलिस रिकॉर्ड की जांच से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
नए विधानसभा भवन में सरकारी संपत्तियों के स्थानांतरण को लेकर भी सवाल उठे। लगभग 127 टीवी सेट, पुराने भवन के 46 से 48 टीवी और करीब 400 एसी के हिसाब-किताब पर सवाल किए गए। इन परिसंपत्तियों का स्टॉक रजिस्टर, गेट पास, हस्तांतरण और भंडारण के रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाने चाहिए। सरकारी संपत्ति का हिसाब अभिलेखों और स्वतंत्र ऑडिट से ही स्पष्ट हो सकता है।
नवंबर में फिर सेवावृद्धि या जवाबदेही का हिसाब –
विधानसभा सचिवालय कोई सामान्य सरकारी कार्यालय नहीं है। यह वह संस्था है जहां सरकार से सवाल पूछे जाते हैं, प्रशासनिक फैसलों की जवाबदेही तय होती है और लोकतांत्रिक व्यवस्था की गरिमा बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाई जाती है। ऐसे में सचिवालय के प्रशासनिक मुखिया पर लगे आरोपों और शिकायतों की स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है।
दिनेश शर्मा के विरुद्ध लगे आरोपों की सत्यता का निर्धारण निष्पक्ष जांच और सक्षम प्रक्रिया से होना चाहिए। यदि आरोप गलत हैं तो दस्तावेजों के साथ स्थिति स्पष्ट की जाए और यदि अनियमितताएं हुई हैं तो जिम्मेदारी तय हो। नवंबर 2026 में एक और सेवावृद्धि देने से पहले भर्ती, लेन-देन, सहायक मार्शल प्रकरण और सरकारी संपत्ति से जुड़े मामलों की समीक्षा होगी या नहीं, यह विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह और सचिवालय के प्रशासनिक तंत्र से जुड़ा अहम सवाल है।
सुशासन के ढाई साल पूरे हो चुके हैं और अब स्मृति ईरानी की एंट्री के बाद जवाबदेही को लेकर निगाहें और तेज हो गई हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि रिश्वत के वायरल वीडियो से लेकर भर्ती विवाद, वसूली और सरकारी संपत्ति के इस्तेमाल तक उठे सवालों पर अब कार्रवाई होगी या फिर नवंबर में एक बार फिर सेवावृद्धि की फाइल आगे बढ़ा दी जाएगी? क्या सुशासन का तकाजा यही है कि आरोपों की फाइलें लंबित रहें और अधिकारी की कुर्सी सुरक्षित? अब सरकार और विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह को तय करना है कि नवंबर में दिनेश शर्मा को एक और सेवा विस्तार मिलेगा या वर्षों से उठ रहे सवालों पर जवाबदेही तय होगी। क्योंकि जिस विधानसभा में सरकार से जवाब मांगा जाता है, उसी के सचिवालय में सवालों का यूं अनुत्तरित रहना सुशासन के दावों की असली परीक्षा है।










