राजनांदगांव एक्सक्लूसिव – संस्कारधानी में खाकी का कैसा संस्कार! जब्त मोबाइल से ₹2 लाख का खेल, आरक्षक पर कार्रवाई, थाना प्रभारी को नई थानेदारी –

रायपुर/राजनांदगांव – संस्कारधानी में इन दिनों खाकी का अलग ही संस्कार देखने को मिल रहा है। सट्टे के मामले में एक मोबाइल जब्त हुआ, मालिक जेल पहुंचा और उसी मोबाइल से करीब दो लाख रुपये के ट्रांजेक्शन
हो गया। बात अदालत तक पहुंची, CCTV फुटेज सुरक्षित रखने के आदेश हुए, लेकिन सुरक्षा होती इससे पहले ही फुटेज असुरक्षित कर दिए गए। मामले में 9–10 अप्रैल 2026 के घटनाक्रम पर 11 मई को FIR दर्ज हुई। आरक्षक भवानी थलापति के बयान में थाना प्रभारी ऐमन साहू का नाम आया। फिर कार्रवाई की आंच आरक्षक तक पहुंची और थाना प्रभारी को नई थानेदारी मिल गई।
संस्कारधानी में कार्रवाई का हिसाब भी निराला है। मातहत के हिस्से में कार्रवाई, साहबों के हिस्से में कुर्सी।
दरअसल बसंतपुर पुलिस ने सट्टे के प्रकरण में दीपक क्षत्रिय का मोबाइल जब्त कर सील किया था। दीपक जेल में था, मोबाइल पुलिस की अभिरक्षा में। इसी दौरान मोबाइल से करीब दो लाख रुपये के UPI ट्रांजेक्शन हुए। जेल से बाहर आने के बाद मोबाइल लेने पहुंचे दीपक को लेन-देन का पता चला और मामला अदालत पहुंच गया। अदालत ने CCTV फुटेज सुरक्षित रखने के निर्देश दिए। अब कहानी में असली पेंच यही है कि पुलिस की अभिरक्षा में रखे मोबाइल से लेन-देन हुआ कैसे। रकम किन खातों में गई और मोबाइल की सील किसने खोली, इसका जवाब जांच और डिजिटल फॉरेंसिक से ही मिलेगा।
मगर कहानी मोबाइल पर खत्म नहीं हुई। अदालत के आदेश के बाद CCTV फुटेज से छेड़छाड़ का मामला सामने आया। आरक्षक क्रमांक 535 भवानी थलापति के बयान के मुताबिक, थाना प्रभारी ऐमन साहू ने फुटेज डिलीट कराने के निर्देश दिए थे। पुलिस मुख्यालय द्वारा फुटेज मांगे जाने के दौरान भी छेड़छाड़ का मामला सामने आया। यानी अदालत ने सबूत बचाने को कहा और सबूतों की रखवाली करने वाले महकमे में ही फुटेज मिटाने के आरोप लग गए। संस्कारधानी में CCTV की आंखें बंद हो गईं, लेकिन सवालों की आंखें अब भी खुली हैं।
आरक्षक के बयान में थाना प्रभारी का नाम आने के बाद मामला और गंभीर हो जाता है। बयान के मुताबिक, आरक्षक को आरोपी और थाना प्रभारी को शिकायतकर्ता बनाने की कवायद हुई। मेडिकल परीक्षण के बाद घर पर आराम करने और बाकी कार्रवाई संभालने का भरोसा दिए जाने की बात भी सामने आई। आरक्षक ने खर्चों का इंतजाम किए जाने का आरोप भी लगाया है। ये आरोप जांच के विषय हैं, लेकिन इतना साफ है कि जब्त मोबाइल से लेन-देन और CCTV फुटेज से छेड़छाड़ की पूरी कड़ी का जवाब सिर्फ एक कर्मचारी की कार्रवाई से नहीं मिल सकता।
इसी बीच आईजी राजनांदगांव ने मामले का संज्ञान लेकर एसपी अंकिता शर्मा को जांच के निर्देश दिए। आरक्षक भवानी थलापति के खिलाफ कार्रवाई हुई, जबकि ऐमन साहू को बसंतपुर से डोंगरगांव और फिर सोमनी थाने
में पदस्थ कर दिया गया। थाना प्रभारी की भूमिका पर सवाल हों और जांच चल रही हो, तो नई थानेदारी का फैसला अपने आप में सवाल बन जाता है। जांच की गाड़ी किस रफ्तार से चल रही है, पता नहीं, लेकिन पोस्टिंग की गाड़ी समय पर पहुंच गई।
आरक्षक के बयान में लगाए गए आरोपों और वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की जांच का सवाल कायम है। आरक्षक दोषी है तो कार्रवाई हो, मगर बयान में जिन अधिकारियों के नाम आए हैं, उनकी भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए। एसपी की जवाबदेही केवल मातहत के खिलाफ कार्रवाई तक सीमित नहीं हो सकती। थाना प्रभारी को नई पोस्टिंग किस आदेश से मिली, विभागीय जांच कहां तक पहुंची और आईजी के निर्देशों पर क्या कार्रवाई हुई, इसका जवाब पुलिस विभाग को देना चाहिए।
अब जांच का दायरा दो लाख रुपये तक सीमित रखना भी पूरे मामले को छोटा करके देखने जैसा होगा। मोबाइल से ट्रांजेक्शन किसने किए, रकम कहां गई, मालखाने के रिकॉर्ड में क्या दर्ज है और CCTV सिस्टम तक किसकी पहुंच थी, इसकी डिजिटल फॉरेंसिक जांच जरूरी है। यदि साक्ष्य महादेव सट्टा ऐप या उससे जुड़े नेटवर्क की ओर संकेत करते हैं, तो उस दिशा में भी पड़ताल होनी चाहिए। मोबाइल की जांच, बैंकिंग रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों के बयान ही इस कहानी की पूरी कड़ी जोड़ सकते हैं।
संस्कारधानी की पहचान उसके संस्कारों से है, लेकिन पुलिसिया व्यवस्था में संस्कार का अर्थ मातहत के लिए कार्रवाई और साहबों के लिए नई कुर्सी नहीं हो सकता। आरक्षक दोषी है या किसी बड़े खेल में मोहरा बनाया गया, यह जांच तय करेगी। मगर अदालत के आदेश के बाद CCTV फुटेज से छेड़छाड़, जब्त मोबाइल से लेन-देन और वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच भी उतनी ही जरूरी है।
आखिर एसपी अंकिता शर्मा किसे बचा रहीं, मातहत को या खुद को। इसका जवाब बयानबाजी से नहीं, डिजिटल साक्ष्यों, निष्पक्ष जांच और विभागीय कार्रवाई से सामने आना चाहिए।










