धर्म की रक्षा के लिए जिन शासन के साथ कनेक्शन होना चाहिए : मुनिश्री प्रियदर्शी विजयजी

रायपुर। विवेकानंद नगर स्थित श्री संभवनाथ जैन मंदिर में आत्मोल्लास चातुर्मास 2024 की प्रवचन माला जारी है। शनिवार को तपस्वी रत्न मुनिश्री प्रियदर्शी विजयजी म.सा. ने साधु के पांच कनेक्शनों की श्रृंखला में आगे बताया कि साधु का जिन शासन और आत्मा के साथ कनेक्शन होता है,श्रावक वर्ग में भी विशेषज्ञता तभी आएगी जब संसार को दूसरे नंबर पर और धर्म को प्रथम सोपान में रखेंगे। मुनिश्री ने कहा कि साधु का प्रभु के शासन के साथ कनेक्शन होता है,धर्म की रक्षा के लिएसाधु सदैव तत्पर रहते हैं।
मुनिश्री ने कहा कि जब धर्म की बात आती है तो साधु अपने बारे में नहीं सोचता। जिन शासन का इतिहास रहा है सदैव तीर्थ,मंदिरों,जीवों की रक्षा के लिए साधु आगे रहे हैं। आपका जिन शासन के साथ कनेक्शन अच्छा होगा तभी धर्म की रक्षा हो पाएगी। मुनिश्री ने कहा कि तीर्थ से आपका जुड़ाव होना चाहिए। विरान हो चुके मंदिरों,गायब हो रही प्रतिमाओं का संरक्षण करना साधु का धर्म है। विशेषज्ञ वह होता है जो संकट आने पर अपने लिए नहीं सोचता वह शासन की तरफ देखता है। ऐसे ही साधु का आत्मा के साथ कनेक्शन भी होता है, इसलिए आत्मा में जरा भी दोष न लगे कर्म बंधन ना हो उसके बारे में हमेशा चिंतनशील रहता है।


सफलता प्राप्ति के लिए लक्ष्य तय करें : मुनिश्री तीर्थप्रेम विजयजी
ओजस्वी प्रवचनकार मुनिश्री तीर्थप्रेम विजयजी म.सा. ने आज विशेष प्रवचन में कहा कि लक्ष्य निर्धारित होने से ही सफलता मिलती है। लक्ष्य यदि आपके सामने होगा तो ही आपकी आध्यात्मिक यात्रा सफल होगी। आंख से लक्ष्य ओझल हो जाएगा तो साधना व्यर्थ चली जाएगी।आपको साधना क्यों करनी है इस बात का ज्ञान होना चाहिए।
मुनिश्री ने कहा कि सिद्धि तप हमारे लक्ष्य स्वरूप को पहचानने का अवसर है। अपने आत्म स्वरूप को पहचानने का लक्ष्य सिद्धि तप है। सिद्धि तप अपने आप को लक्ष्यबद्ध बनाने का अवसर है। अपने अंतिम लक्ष्य सिद्धशीला की प्राप्ति होने का मार्ग सिद्धि तप है। सिद्धि तप से सद्गति की प्राप्ति होती है। अंत में जाकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
मुनिश्री ने बताया कि सिद्धि तप आत्मा से अवगुणों को अलग करने का प्रोसेस है। इसकी पहली बारी से ज्ञानावरणीय कर्म, दूसरी बारी के दर्शनावरणीय कर्म,तीसरी बारी से वेदानीय कर्म,चौथी बारी से मोहनीय कर्म, पांचवी बारी से आयुषाय कर्म,छठवीं बारी से नाम कर्म, सातवीं बारी से गोत्र कर्म और आठवीं बारी से अंतराय कर्म का नाश होता है।

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