मंत्री का सख्त निर्देश – साड़ी कांड में जांच तेज, खादी बोर्ड पर कार्रवाई की नजर , अक्टूबर में खरीदी, जनवरी में रोक… फिर भी अप्रैल में फटा मामला, क्या है पूरा सच –

मंत्री का सख्त निर्देश – साड़ी कांड में जांच तेज, खादी बोर्ड पर कार्रवाई की नजर , अक्टूबर में खरीदी, जनवरी में रोक… फिर भी अप्रैल में फटा मामला, क्या है पूरा सच –
रायपुर : – यह कहानी सिर्फ साड़ी की नहीं है।यह उस सिस्टम की है जहाँ कागज़ों में कार्रवाई समय पर होती है, लेकिन जमीन तक पहुंचते-पहुंचते उसका असर कमजोर पड़ जाता है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के लिए यूनिफॉर्म के रूप में साड़ियों की खरीदी की गई। दर ₹500 प्रति साड़ी तय हुई और सप्लाई की जिम्मेदारी छत्तीसगढ़ खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड को सौंपी गई। यह खरीदी भंडारण क्रय नियम 2002 के तहत की गई, जिसमें स्पष्ट प्रावधान है कि ऐसे मामलों में आपूर्ति का दायित्व खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के माध्यम से ही किया जाएगा। बोर्ड ने वेंडरों के जरिए साड़ियाँ तैयार कर जिलों तक पहुंचाईं। हर साड़ी पर खादी बोर्ड की मुहर थी यानी आपूर्ति पूरी तरह अधिकृत चैनल से हुई।
शुरुआत में वितरण सामान्य प्रक्रिया की तरह चला, लेकिन कुछ ही समय बाद कबीरधाम, दुर्ग, रायगढ़ और धमतरी जैसे जिलों से शिकायतें सामने आने लगीं। साड़ियों की लंबाई कम होने, कपड़े की गुणवत्ता कमजोर होने और धुलाई के बाद रंग उतरने जैसी गंभीर बातें सामने आईं।

मामला संचालक स्तर तक पहुंचा और जनवरी 2026 में पहला आधिकारिक आदेश जारी हुआ। इस आदेश के तहत जांच समिति गठित की गई, जिसमें संयुक्त संचालक (वित्त) को अध्यक्ष, उप संचालक स्तर के अधिकारियों को सदस्य और आईसीडीएस शाखा के सहायक संचालक को संयोजक बनाया गया। समिति को 15 दिनों में रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए। इसी के साथ विभाग ने एक महत्वपूर्ण और सख्त कदम उठाया सप्लायर का 25% भुगतान, लगभग ₹2.43 करोड़, रोक दिया गया।

इसके बाद 10 मार्च 2026 के पत्र में खादी ग्रामोद्योग बोर्ड को स्पष्ट निर्देश दिया गया कि जांच पूरी होने तक शेष भुगतान नहीं किया जाएगा और यदि साड़ियाँ मानकों के अनुरूप नहीं पाई जाती हैं, तो उन्हें बदलकर नई साड़ियाँ उपलब्ध कराई जाएं। यह स्पष्ट संकेत था कि विभागीय स्तर पर गड़बड़ी को गंभीरता से लिया गया है।

लेकिन इसके बावजूद शिकायतें थमी नहीं। 6 अप्रैल 2026 को जांच का दायरा बढ़ाते हुए नई समिति गठित की गई, जिसमें संयुक्त संचालक (आईसीडीएस) को अध्यक्ष बनाया गया और वित्त, भंडार, आईसीडीएस शाखा तथा लेखा से जुड़े अधिकारियों को शामिल किया गया। इसके तुरंत बाद 7 अप्रैल 2026 को जिलों से विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई। कहाँ लंबाई कम है, कहाँ गुणवत्ता में कमी है।

अंततः 13 अप्रैल 2026 को स्पष्ट निर्देश जारी किए गए कि जिन साड़ियों में मानक से विचलन पाया गया है, उन्हें बदलकर मानक के अनुरूप नई साड़ियाँ उपलब्ध कराई जाएं।
मंत्री के संज्ञान में आते ही सख्ती –
जैसे ही यह मामला मंत्री लक्ष्मी राजवाडे के संज्ञान में आया, उन्होंने तत्काल विभागीय अधिकारियों को जांच तेज करने और दोष तय करने के निर्देश दिए। साथ ही खादी ग्रामोद्योग बोर्ड को भी स्पष्ट रूप से आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है।
यानी नीति स्तर पर सख्त रुख अपनाया गया है और अब नजर इस बात पर है कि ज़मीनी स्तर पर कार्रवाई कितनी प्रभावी होती है।

फाइलों में कार्रवाई, जमीन पर सवाल –
अब जब सभी दस्तावेजों को एक साथ देखा जाता है, तो एक स्पष्ट टाइमलाइन सामने आती है। जनवरी जांच के आदेश और भुगतान पर रोक , मार्च सख्त निर्देश और शर्तें , अप्रैल विस्तृत जांच और साड़ी बदलने के आदेश यानी फाइलों में पूरी कार्रवाई क्रमवार चलती रही। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है। जब जनवरी में ही गड़बड़ी सामने आ चुकी थी, तो ज़मीन पर वितरण क्यों नहीं रुका? जिला स्तर पर जो मॉनिटरिंग होनी थी, वह प्रभावी नहीं रही। न साड़ियों को रोका गया, न तत्काल वापस लिया गया। यानी ऊपर आदेश था, बीच में सिस्टम था, और नीचे समस्या थी।
जिम्मेदारी की कड़ी सबसे कमजोर –
इस पूरे घटनाक्रम में यह साफ होता है कि खरीदी नियमों के तहत हुई , सप्लाई खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के माध्यम से हुई , कार्रवाई का अधिकार भी बोर्ड के पास है लेकिन मॉनिटरिंग और नियंत्रण की कड़ी सबसे कमजोर साबित हुई
अब नजर कार्रवाई पर-
अब जब मंत्री स्तर से सख्त निर्देश जारी हो चुके हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यही है क्या खादी ग्रामोद्योग बोर्ड दोष तय कर कार्रवाई करेगा? क्या सप्लायर पर जवाबदेही तय होगी? और क्या सिस्टम की वह कमजोर कड़ी सुधारी जाएगी, जहाँ से यह मामला फिसला?
फाइलों में हर तारीख दर्ज है… अब देखना यह है कि कार्रवाई किस स्तर तक पहुंचती है और जिम्मेदारी किस नाम के आगे दर्ज होती है।









