कानून व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल! 14 माह प्रभारी डीजीपी फिर पूर्णकालिक कमान, लेकिन क्या छत्तीसगढ़ में अपराधियों, गैंग और भीड़तंत्र के हौसले बेलगाम हो चुके हैं?

कानून व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल! 14 माह प्रभारी डीजीपी फिर पूर्णकालिक कमान, लेकिन क्या छत्तीसगढ़ में अपराधियों, गैंग और भीड़तंत्र के हौसले बेलगाम हो चुके हैं?
रायपुर : – छत्तीसगढ़ की कानून व्यवस्था को लेकर अब सवाल विपक्ष या सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रह गए हैं। पुलिस विभाग, प्रशासनिक गलियारों, व्यापारिक संगठनों, फील्ड अधिकारियों और आम लोगों के बीच अब यह चर्चा खुलकर होने लगी है कि आखिर प्रदेश किस दिशा में जा रहा है?
एक तरफ सरकार सुशासन कानून का राज और कड़े प्रशासन की बात करती है दूसरी तरफ बाजारों में गोलीकांड, राजधानी में बमबाजी, गैंगवार, भीड़ हिंसा, सामूहिक आगजनी, अपहरण, नक्सली हमले, महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराध और सरकारी परिसरों तक में आगजनी जैसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं।
IPS अरुण देव गौतम लगभग 14 माह तक प्रभारी डीजीपी रहे। बाद में उन्हें पूर्णकालिक डीजीपी की जिम्मेदारी मिली। लेकिन इसी अवधि में ऐसी घटनाओं की लंबी श्रृंखला सामने आई जिसने पुलिसिंग, इंटेलिजेंस नेटवर्क, पेट्रोलिंग व्यवस्था, भीड़ नियंत्रण क्षमता और जमीनी निगरानी तंत्र की वास्तविक स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए।
पुलिस मुख्यालय से जुड़े हलकों में अब एक और चर्चा तेजी से तैर रही है कि प्रदेश की पूरी कानून व्यवस्था एक ऐसे हाउस के बगुले के भरोसे चल रही है, जो पद और सिस्टम दोनों से ऊपर प्रभाव रखता है। फील्ड स्तर पर कई अधिकारी निजी बातचीत में तंज कसते दिख रहे हैं कि कुछ SP बिना नाखून के हैं और कुछ IG बिना दांत के मतलब… न कार्रवाई की धार दिख रही है, न सिस्टम का भय।
लेकिन इसी बीच एक और सवाल पुलिस और प्रशासनिक गलियारों में लगातार गूंज रहा है आखिर राज्य के गृह मंत्री Vijay Sharma को इतना किनारे क्यों किया जा रहा है? युवा, तेज-तर्रार और नक्सल मामलों की जमीनी समझ रखने वाले मंत्री की छवि एक ऐसे नेता की रही है जो फील्ड इनपुट पर काम करते हैं, कानून व्यवस्था की बारीकियों को समझते हैं और लगातार नक्सल मोर्चे पर सक्रिय रहे हैं। प्रदेश आज जिस तेजी से नक्सल मुक्त होने की दिशा में बढ़ा, उसमें उनकी सक्रिय भूमिका को प्रशासनिक हलकों में भी स्वीकार किया जाता रहा है।
लेकिन सवाल यह है कि अगर गृह मंत्री लगातार सक्रिय हैं तो फिर जिलों में उनकी बात सुनी क्यों नहीं जा रही? कई जिलों के पुलिस अधिकारी निजी बातचीत में यहां तक कहते सुने जा रहे हैं। भैया… हम तो बस एक जगह की जिम्मेदारी देखते हैं बाकी हमें किसी से कोई मतलब नहीं… हम क्यों सुनें? ऐसे तंज अब सिर्फ अफवाह नहीं बल्कि सिस्टम के भीतर चल रही खींचतान की तरफ इशारा माने जा रहे हैं।
पुलिस मुख्यालय के भीतर यह चर्चा भी लगातार तैर रही है कि गृह मंत्री एक TI तक का ट्रांसफर नहीं करवा पा रहे। कई नोटशीट्स में अनुमोदन की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कोंडागांव से लेकर सक्ती तक कई मामलों में यह चर्चा सामने आई कि फैसलों में हाउस के एक बगुले की भूमिका ज्यादा दिखाई देती है जबकि राजनीतिक जवाबदेही किसी और के हिस्से आती है।
यही वजह है कि अब सवाल सिर्फ अपराध बढ़ने का नहीं रह गया सवाल यह भी है कि आखिर सिस्टम चला कौन रहा है? जिम्मेदारी किसकी है? आदेश कौन दे रहा है? और जवाबदेह कौन है?
सबसे बड़ा विरोधाभास यही बताया जा रहा है कि एक तरफ प्रदेश नक्सल मोर्चे पर बड़ी सफलता की ओर बढ़ता दिख रहा है, दूसरी तरफ शहरी कानून व्यवस्था, गैंगवार, भीड़तंत्र, सांप्रदायिक तनाव और संगठित अपराध लगातार नियंत्रण से बाहर नजर आ रहे हैं। पुलिस विभाग के भीतर ही अब यह चर्चा दबे स्वर में होने लगी है कि अगर राजनीतिक नेतृत्व और फील्ड पुलिसिंग के बीच यही दूरी बनी रही तो आने वाले समय में कानून व्यवस्था का संकट और गहरा सकता है।
कोटमी मंगल बाजार गोलीकांड जब बाजार में गोलियां चलीं और सिस्टम 300 मीटर दूर खड़ा रह गया –
बीती शाम गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के कोटमी साप्ताहिक बाजार में शाम करीब 7 बजे अचानक गोलियों की आवाज गूंजी। लोग कुछ समझ पाते उससे पहले तीन नकाबपोश बदमाश सराफा कारोबारी प्रदीप सोनी पर बेहद नजदीक से फायरिंग कर चुके थे। बताया गया कि आरोपी लूट की नीयत से पहुंचे थे। विरोध हुआ और फिर गोलियां चल गईं। घायल व्यापारी की अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई। बड़ा सवाल यह है कि यह घटना स्थल और कोटमी चौकी की दूरी महज 300 मीटर दूर थी। इस भीड़भाड़ वाले बाजार में तीन नकाबपोश पहुंचे, गोली चलाई, लूट की, करीब 20 लाख का माल लेकर फरार हो गए, और पूरा सिस्टम सिर्फ तमाशा देखता रह गया। बतादे कि यह कोई सुनसान जंगल नहीं था। यह पूरे इलाके का सबसे बड़ा बाजार केंद्र है जहाँ छोटे व्यापारी, ग्रामीण ग्राहक और दूर-दराज के कारोबारी रोजी-रोटी के लिए आते हैं। घटना के बाद सिर्फ एक व्यापारी की जान नहीं गई बल्कि पूरे बाजार का भरोसा भी टूट गया।
कमिश्नरेट आया, लेकिन राजधानी सुरक्षित हुई क्या?
राजधानी रायपुर में कमिश्नर प्रणाली लागू होने के बाद बड़े दावे किए गए थे। आधुनिक पुलिसिंग… तेज निगरानी… बेहतर नियंत्रण… हाईटेक सुरक्षा। लेकिन उसी राजधानी में भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक मॉर्निंग वॉक पर निकले और लूट का शिकार हो गए। VIP मूवमेंट वाले शहर में अगर पूर्व विधानसभा अध्यक्ष तक सुरक्षित नहीं हैं तो आम आदमी खुद को कैसे सुरक्षित माने? यह बड़ा सवाल अब उठने लगा है। यहीं नहीं… राजधानी में: देसी बम फेंके गए, गैंगवार हुई, गोलीकांड हुए, चाकूबाजी बढ़ी, लाइसेंसी हथियारों से डबल मर्डर हुआ। और धीरे-धीरे यह सवाल उठने लगा कि क्या कमिश्नरेट सिर्फ बोर्ड और मीटिंग तक सीमित है?
रायपुर डबल गोलीकांड जब लाइसेंसी पिस्टल ने दो जिंदगियां खत्म कर दीं –
मोवा थाना क्षेत्र में आरोपी जितेंद्र वर्मा ने पारिवारिक विवाद के दौरान अपनी लाइसेंसी पिस्टल से दो सालियों पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। दो युवतियों की मौत हो गई। फायरिंग के बाद आरोपी इलाके में घूमता रहा। मेडिकल स्टोर तक में पिस्टल लेकर घुस गया। पूरा मामला CCTV में कैद हुआ। इस घटना ने राजधानी में दो बड़े सवाल खड़े किए कि लाइसेंसी हथियारों की निगरानी कितनी प्रभावी है? अपराधी मानसिकता वाले लोगों तक आखिर हथियार पहुंच कैसे रहे हैं?
कबीर नगर बम हमला राजधानी में गैंगवार का खुला प्रदर्शन –
रायपुर के कबीर नगर स्थित वीर सावरकर भवन के पास देर रात देसी बम फेंके गए। धमाके के बाद इलाके में धुआं भर गया। लोग घरों से बाहर निकल आए। बच्चों और महिलाओं में दहशत फैल गई। सोशल मीडिया रिपोर्ट्स में इसे पुरानी रंजिश और गैंगवार से जोड़ा गया। राजधानी में खुलेआम देसी बम चलना सिर्फ अपराध नहीं… सिस्टम को खुली चुनौती थी।
डोंगरगढ़ सुशासन तिहार के मंच पर चाकू –
सरकार सुशासन तिहार के जरिए बेहतर प्रशासन का संदेश दे रही थी। लेकिन उसी कार्यक्रम में चाकूबाजी हो गई। राजनांदगांव जिले के पलांदूर गांव में मंच के पास विवाद हुआ, सरपंच पर हमला हुआ, और फिर भगदड़ मच गई। स्थानीय लोगों ने तंज कसा अगर सुशासन के मंच पर ही चाकू निकल रहा है… तो सामान्य दिन में क्या होगा?
धमतरी जब DFO भी सुरक्षित नहीं रहा –
सिहावा क्षेत्र के जैतपुरी गांव में वन विभाग की कार्रवाई के दौरान DFO वरुण जैन और उनकी टीम पर हमला कर दिया गया। स्थिति इतनी बिगड़ी कि फील्ड अधिकारियों को जान बचाने की नौबत आ गई। अब सवाल सिर्फ अपराधियों का नहीं था सवाल यह था कि क्या प्रशासनिक अधिकारी भी अब भीड़ और हिंसा के सामने असहाय हो चुके हैं?
कबीरधाम राज्यपाल इलाके में, और कुछ दूरी पर गैंगरेप –
चिल्फी क्षेत्र में बैगा समाज की नाबालिग युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ। इसी दौरान राज्यपाल रामेन डेका का उसी क्षेत्र में कार्यक्रम और प्रवास था। घटना ने एक बेहद असहज सवाल खड़ा किया कि क्या VIP सुरक्षा और जमीनी सुरक्षा के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों?स्थानीय समाज में भारी आक्रोश फैल गया। बैठकें हुईं… विरोध हुआ… लेकिन सवाल वही रहा अगर इतने हाई सिक्योरिटी मूवमेंट के दौरान भी ऐसी घटना हो सकती है तो सामान्य हालात में महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं?
जांजगीर गोलीकांड अब छोटे जिलों तक पहुंच गए प्रोफेशनल शूटर?
करही गांव में नकाबपोश बदमाश कांग्रेस नेता और रेत कारोबारी सम्मेलाल कश्यप के घर घुस गए। ताबड़तोड़ फायरिंग हुई। एक बेटे की मौत। दूसरा गंभीर घायल। पुलिस जांच कई राज्यों तक फैली। गुजरात, तमिलनाडु और मध्यप्रदेश तक नेटवर्क खंगाले गए। यह घटना बताती है कि अब पेशेवर अपराध और बाहरी नेटवर्क छोटे जिलों तक पहुंच चुके हैं।
विराट सराफ अपहरण कांड कारोबारी परिवार निशाने पर?
6 साल के विराट सराफ का अपहरण कर 6 करोड़ की फिरौती मांगी गई। बच्चे को कई दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया। मामले में परिवार से जुड़ी महिला तक का नाम सामने आया। यह सिर्फ एक अपहरण नहीं था…यह संगठित अपराध और कारोबारी वर्ग के खिलाफ बढ़ते खतरे का संकेत था।
बलौदाबाजार जब कलेक्टर कार्यालय जल गया –
सुशासन की बात करने वाली सरकार के दौर में पहली बार ऐसा हुआ कि उग्र भीड़ ने कलेक्टर कार्यालय तक जला दिया। बलौदाबाजार में आंदोलन हिंसक हुआ। सरकारी गाड़ियां जलाई गईं। दफ्तरों में आग लगी। पूरा प्रशासनिक परिसर धुएं में डूब गया। यह सिर्फ आगजनी नहीं थी…यह राज्य की प्रशासनिक शक्ति को खुली चुनौती थी। सबसे बड़ा सवाल इंटेलिजेंस कहाँ था? भीड़ नियंत्रण क्यों फेल हुआ? हालात बिगड़ने से पहले कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
कवर्धा घर जलते रहे और तनाव फैलता रहा –
कवर्धा में सांप्रदायिक तनाव के दौरान कई घर और दुकानें जला दी गईं। घंटों तक उग्र भीड़ सड़कों पर रही। लोगों में डर और असुरक्षा फैल गई। घटना ने साबित किया कि स्थानीय तनाव को समय रहते संभालने में प्रशासन नाकाम रहा।
गरियाबंद भीड़तंत्र का खौफनाक चेहरा –
गरियाबंद जिले के दुतकैया गांव में सैकड़ों लोगों की भीड़ कथित तौर पर लाठी, पत्थर और केरोसिन लेकर मुस्लिम परिवारों के घरों तक पहुंच गई। तोड़फोड़ हुई। आगजनी हुई। वाहन जलाए गए। 6 पुलिसकर्मी घायल हुए। यह सिर्फ सांप्रदायिक तनाव नहीं था…यह भीड़तंत्र के सामने सिस्टम की कमजोरी का खुला प्रदर्शन था।
तमनार जब शासन ने सुनना बंद किया और हिंसा शुरू हो गई –
तमनार की घटना किसी एक दिन की नहीं थी। यह दो हफ्तों से चल रहे शांतिपूर्ण आंदोलन का विस्फोट था। 14 ग्राम पंचायतों के ग्रामीण कोयला परियोजना के खिलाफ धरने पर बैठे थे। उनकी मांग सिर्फ संवाद की थी। फिर अचानक हालात बिगड़ गए। चश्मदीद कहते हैं पहला लाठीचार्ज महिलाओं पर हुआ। वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं आदेश नहीं दिया गया था।
तो सवाल उठा अगर आदेश नहीं था… तो जमीन पर कमान किसके हाथ में थी? इसी अफरा-तफरी में एक महिला आरक्षक भीड़ में फंस गई। उसकी वर्दी फाड़ दी गई। वह दृश्य सिर्फ एक महिला पुलिसकर्मी का अपमान नहीं था…वह पूरे सिस्टम की विफलता का प्रतीक बन गया। बताया गया कि उसी समय जिले के शीर्ष प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी इलाके में मौजूद थे। अगर इंटेलिजेंस ने पहले चेतावनी दी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और अगर नहीं दी थी… तो फिर खुफिया व्यवस्था कर क्या रही थी?
अब सवाल सीधे सिस्टम से है क्या प्रदेश की कानून व्यवस्था फाइलों में चल रही है? क्या अपराधियों और भीड़ में अब पुलिस का भय खत्म हो चुका है? क्या फील्ड पुलिस नेतृत्व कमजोर पड़ चुका है? क्या सिस्टम में आदेश देने वाले ज्यादा हैं और जिम्मेदारी लेने वाले कम?
क्या छत्तीसगढ़ धीरे-धीरे अराजकता की ओर बढ़ रहा है? प्रदेश में लगातार बढ़ती हिंसा, गैंगवार, सांप्रदायिक तनाव, नक्सली हमले, प्रशासनिक विफलताएं और भीड़तंत्र अब सिर्फ घटनाएं नहीं रह गईं…वे उस भरोसे को तोड़ रही हैं जिस पर लोकतंत्र और कानून व्यवस्था खड़ी होती है।










