अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

पांचवीं मंज़िल के साहेब और चाय पर सेट होने से इनकार!
राजधानी के पांचवीं मंज़िल वाले छोटे कद के साहेब इन दिनों खासे परेशान बताए जा रहे हैं। परेशानी काम के बोझ की नहीं है, असली बेचैनी इस बात की है कि आखिर इतनी ऊंची कुर्सी पर बैठने के बाद भी लोग सवाल पूछ कैसे रहे हैं। कहते हैं साहेब एक परीक्षा वाले गड़बड़झाले मामले को लेकर चुपचाप बैठे थे। सोचा था वक्त गुजर जाएगा, फाइलों पर धूल जम जाएगी और मामला हमेशा की तरह ठंडा पड़ जाएगा। लेकिन दो साल बाद अचानक विपक्ष ने वही फाइल उठा ली और साहेब की साइलेंट मैनेजमेंट वाली रणनीति खुलती दिखाई देने लगी। इसके बाद साहेब ने हालात संभालने के लिए फिर पुराना सरकारी फार्मूला निकाला कि चाय पर चर्चा कर लेते है। लेकिन इस बार कहानी उल्टी पड़ गई। जिसे बुलाया गया उसने साफ कह दिया कि हर कोई एक कप चाय में अपनी कलम और ईमान नहीं बेचता। बस फिर क्या था साहेब आग-बबूला हो गए। कहते हैं गुस्से में इतना तक बोल दिया अब देख लूंगा…मंत्रालय के पुराने बाबू यह पूरा घटनाक्रम देखकर मुस्कुरा रहे हैं। उनका कहना है कि पहले के दौर में बड़े-बड़े अफसर व्यंग्य सुनकर ठहाका लगाते थे, फिर भीतर जाकर आत्ममंथन भी करते थे। अब हालत यह है कि व्यंग्य पढ़ते ही लोग उसे चार्जशीट समझ बैठते हैं। उधर सत्ता के गलियारों में एक लाइन खूब घूम रही है कि यहाँ कुर्सियाँ खबर छपने से कम खबर पढ़कर भीतर उठने वाली घबराहट से ज्यादा हिलती है। फाइलों में दबे सवाल जब बाहर आते हैं, तो नोटशीट नहीं चेहरों के रंग बदलते हैं। और जिस दिन चाय से ज्यादा डर कलम से लगने लगे, समझ लीजिए असली परेशानी वहीं से शुरू हुई है…

विधानसभा की भर्ती –
अविभाजित मध्यप्रदेश से अलग होकर जब छत्तीसगढ़ राज्य बना, तब उम्मीद थी कि नया राज्य नई व्यवस्था और नई पारदर्शिता लेकर आएगा। लेकिन राज्य बना, कानून पुराने चले और नियुक्तियों का खेल भी पुराने ढर्रे पर ही चलता रहा। शुरुआती दौर से ही विधानसभा सचिवालय की भर्तियों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। बताया जाता है कि उस दौर में हुई कई नियुक्तियों की गूंज आज 26 साल बाद भी सत्ता के गलियारों में सुनाई देती है। पुराने लोग बताते हैं कि शुरुआती दौर में एक साहेब पुस्तकालय और शोध विंग से सफर शुरू कर विधानसभा सचिव और फिर प्रमुख सचिव तक पहुँच गए। अब वर्तमान विधानसभा सचिव की कहानी भी कुछ ऐसी ही चर्चाओं में है। कहा जाता है कि कभी विश्वविद्यालय में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी रहे साहेब बाद में सीधी भर्ती से विधानसभा पहुंचे और आज सचिव की कुर्सी तक जा बैठे। लेकिन असली चर्चा एक चर्चित भर्ती को लेकर है, जिसमें वर्षों से सहायक मार्शल बने कई लोगों की सेवा सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद समाप्त हो गई। मगर उसी भर्ती का एक नाम आज भी सिस्टम में मजबूती से टिका हुआ बताया जाता है। चर्चा यह है कि एक साहब के लिए अलग से विज्ञापन निकाला गया था वह भी ऐसे अखबार में जिसे न जनता ने देखा, न बाजार ने। कहते हैं अखबार की गिनती की प्रतियां ही छपी थीं और उसी में भर्ती की सूचना प्रकाशित कर पूरी प्रक्रिया पूरी मान ली गई। बाकी लोगों की नौकरी चली गई, लेकिन साहेब आज भी सत्ता के गलियारों में प्रभावशाली माने जाते हैं। अब तो यह साहेब मंत्री के बेहद करीबी ओएसडी के रूप में पूरा मैनेजमेंट संभाल रहे हैं। सियासी गलियारों में यह चर्चा भी तैर रही है कि इनके दस्तावेजों और जाति प्रमाण पत्र तक पर सवाल उठ चुके हैं। लेकिन यह साहेब ऐसा दम्भ भरते है कि मंत्री इनके इशारो में नाचते है और मंत्री जी हर पोल पट्टी इनके पास है लिहाजा इनका कोई कुछ नही बिगाड़ सकता है। अब मंत्री जी इनके मुरीद हैं या साहब मंत्री जी के, यह तो वही जानें। लेकिन विधानसभा की भर्तियों की अगर कभी निष्पक्ष जांच हो गई, तो ऐसा भूचाल आ सकता है कि लोकतंत्र का यह सबसे मजबूत स्तंभ खुद अपनी नींव तलाशता रह जायेगा। इन मार्शल साहब की कहानी बेहद दिलचस्प है इसकी कहानियों के लिए कॉलम छोटा पड़ जायेगा जल्दी ही इसकी पूरी सीरीज निकालेंगे।

सेलेक्टिव इन्वेस्टिगेशन –
छत्तीसगढ़ के चर्चित शराब घोटाले और ओवरटाइम स्कैम की जांच अब खुद सवालों के घेरे में है। एसीबी के अपराध क्रमांक 04/2024 और 44/2024 में मुख्य आरोपी रहे सिद्धार्थ सिंघानिया को बचाने के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। चर्चा है कि धारा 161 के बयानों में हेरफेर कर कई गवाहों के मूल कथनों को कमजोर किया गया, जबकि झारखंड में इसी मामले में सिंघानिया की गिरफ्तारी हो चुकी है। जांच में यह भी सामने आया कि वर्ष 2019 में प्लेसमेंट एजेंसियों को एपी त्रिपाठी के जरिए सिद्धार्थ सिंघानिया के निर्देशों का पालन करने कहा गया था। सरकारी शराब दुकानों में ओवररेटिंग, कर्मचारियों के वेतन से कटौती और फर्जी ओवरटाइम बिलिंग के जरिए करोड़ों रुपये जुटाए गए। बताया जा रहा है कि यह रकम अलग-अलग एजेंसियों से सिंघानिया की कंपनी टॉप सिक्योरिटीज एंड फैसिलिटीज मैनेजमेंट तक पहुंचती थी। ईडी के रिकॉर्डेड बयानों में भी इस कथित मनी ट्रेल और दबाव तंत्र का जिक्र होने की बात कही जा रही है। दावा यह भी है कि हर महीने करीब 40 करोड़ रुपये की उगाही होती थी, जिसमें हिस्सा ऊपर तक पहुंचने की चर्चा रही। इसके बावजूद जांच एजेंसी पर आरोप है कि मनी ट्रेल और कई अहम साक्ष्यों को जानबूझकर दबाया जा रहा है। सवाल यह है कि आखिर किसके इशारे पर मुख्य आरोपियों को बचाया जा रहा है? हाईकोर्ट भी पहले सेलेक्टिव इन्वेस्टिगेशन पर सख्त टिप्पणी कर चुका है, जिससे जांच एजेंसी की भूमिका पर और सवाल खड़े हो गए हैं।

ACB में लेनदेन, धमकी और वसूली –
आगे सुनिए जांच एजेंसी अब सिद्धार्थ सिंघानिया को अप्रूवर दिखाने की तैयारी में है, जबकि कानूनन इसके लिए कोर्ट की अनुमति और निर्धारित प्रक्रिया जरूरी होती है। आरोप यह भी है कि सिंघानिया तक पहुंचने वाले दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की गई। 4 मई 2026 को अलग-अलग प्लेसमेंट एजेंसियों के संचालकों को एसीबी कार्यालय बुलाए जाने के बाद पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया। एसीबी अधिकारियों की मौजूदगी में एजेंसियों पर भारी लेनदेन और सेटिंग का दबाव बनाया गया। यहां तक आरोप हैं कि गिरफ्तार न करने के बदले करोड़ों रुपये मांगे गए। सियासी गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि एसीबी अब जांच एजेंसी कम और मैनेजमेंट सेंटर ज्यादा दिखाई देने लगी है। उधर शराब घोटाले के कथित मास्टरमाइंड एपी त्रिपाठी और उनकी पत्नी की कंपनी की भूमिका पर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं। कंपनी पर सॉफ्टवेयर डेटा में कथित हेरफेर और फर्जी रिकॉर्डिंग के जरिए घोटाले को छिपाने के आरोप लगे हैं। कोर्ट पहले ही जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर उंगली उठा चुका है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या शराब घोटाले की पूरी सच्चाई सामने आएगी, या बड़े चेहरों तक पहुंचने से पहले ही जांच की फाइलें फिर ठंडी कर दी जाएंगी?

शराब माफियाओं स्वर्ग बस्तर –
बस्तर को नक्सल मुक्त बनाने के दावे लगातार किए जा रहे हैं, लेकिन अब वही इलाका शराब माफियाओं के लिए सबसे सुरक्षित ज़ोन बनता दिखाई दे रहा है। इलाके में खुलेआम ओवररेटिंग, मिलावटी शराब और अवैध वसूली की चर्चाएं तेज हैं। और सबसे ज्यादा सवाल उस BIS कंपनी पर उठ रहे हैं, जिसे बस्तर में शराब दुकानों और मेनपावर से जुड़े कामकाज की जिम्मेदारी दी गई है। यही कंपनी पहले रायपुर में भी प्लेसमेंट एजेंसी और शराब दुकानों के संचालन से जुड़ी रही है। उस दौरान मिलावटी शराब मामले में करीब 300 पेटी शराब पकड़े जाने और लगभग डेढ़ करोड़ रुपये के जुर्माने भी लगा था। अब वही कंपनी बस्तर संभाग में फिर विवादों के केंद्र में दिखाई दे रही है। अब यह कंपनी खुलेआम ओवररेटिंग कर रही है। इधर आबकारी विभाग में गिन्नी में लेने वाली साउथ इंडियन मेडम को भले हटा दिया गया लेकिन नीचे के अमला जस का तस बना हुआ है। बताया जाता है कि फ्लाइंग स्क्वॉड में एक वर्मा साहब है जिन्होंने कथित रूप से हर संभाग से मासिक सेटिंग कर ली है वही बस्तर से हर महीने 3 लाख का चढ़ावा आता है। हालात ऐसे बताए जा रहे हैं कि जांच दल पहुंचने से पहले दुकानों का मैनेजमेंट हो जाता है। यानी रेड कम और रूटीन विजिट ज्यादा दिखाई देती है। सबसे बड़ा सवाल यही है क्या बस्तर सच में नक्सल मुक्त हुआ है, या सिर्फ जंगल का राज बदलकर अब शराब सिंडिकेट का राज कायम हो गया है?

ईमानदारी के पोस्टर बॉय –
राजधानी से लगे उस बड़े औद्योगिक जिले में इन दिनों ईमानदारी बड़े-बड़े पोस्टरों में टंगी दिखाई दे रही है। साहब की छवि ऐसी गढ़ी गई है मानो जिले में कानून नहीं, नैतिकता खुद ड्यूटी कर रही हो। ऊपर तक सादगी, सख्ती और निष्पक्षता के किस्से भेजे जा रहे हैं… लेकिन नीचे जमीन पर कहानी कुछ और ही फुसफुसा रही है। जिले के गलियारों में इन दिनों चर्चा अपराध की कम, मैनेजमेंट मॉडल की ज्यादा है। कहीं रातभर सट्टा कारोबारियों के साथ मंद वाली बैठकों के बाद सेटिंग की बातें उड़ रही हैं, तो कहीं कथित वसूली लिस्ट मोबाइल से लेकर पुलिस लाइन तक घूम रही है। हिस्ट्रीशीटर खुलेआम सीना ठोककर कहते फिर रहे हैं हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता और अवैध कारोबारियों के बीच अलग-अलग रेट कार्ड की चर्चा ऐसे होती है जैसे कोई सरकारी टेंडर खुला हो। मजेदार बात यह है कि यह सब उसी जिले में हो रहा है जहां साहब खुद को ईमानदारी का पोस्टर बॉय कहलवाने में व्यस्त हैं। अब सवाल यह उठता है कि अगर एक ईमानदार कप्तान के जिले में हालात ऐसे हैं, तो बाकी जिलों की कल्पना जनता खुद कर ले।अंदरखाने से एक और दिलचस्प फुसफुसाहट बाहर आ रही है। बताया जाता है कि कुछ एक महिला अधिकारी, जो एडिशनल और डीएसपी रैंक की हैं, वे भी साहब की कार्यशैली से खासा परेशान हैं। चर्चा है कि चैंबर में बुलाकर अभद्र भाषा और गालियों का इस्तेमाल करना यहां अनुशासन का हिस्सा बना दिया गया है। इतना ही नहीं, किसी के खिलाफ विभागीय जांच का प्रस्ताव भेजना भी मानो कंट्रोल सिस्टम का हिस्सा हो गया है। यानी पुलिसिंग कम, मानसिक दबाव ज्यादा चल रहा है। यह देखकर पुराने पुलिस वाले धीरे से मुस्कुरा रहे हैं। वे कहते हैं यहां अपराधियों से ज्यादा अहमियत उन लोगों की है जिन्हें बचाया जाना है। कार्रवाई वहीं होती है जहां जरूरत हो और समझौता वहीं जहां सेटिंग बैठ जाए। अब सबसे रोचक चर्चा अंत में चल रही है। साहब खुद बड़े विश्वास से कहते फिर रहे हैं कि जल्द ही उनका तबादला न्याय की धानी में होने वाला है। जिले में लोग यह सुनकर हैरान हैं कि अगर यह मॉडल प्रमोशन का पैमाना है, तो फिर ईमानदारी का असली मतलब शायद शब्दकोश से हट चुका है। क्योंकि यहां पोस्टर पर सख्ती दिखती है और जमीन पर समझौते।

खाल खींच लुंगी वाला निरीक्षण!
बस्तर संभाग में पदस्थ एक चर्चित महिला आईपीएस राज मड़ी अधिकारी इन दिनों अपने काम से ज्यादा अपने तुर्रे को लेकर चर्चा में हैं। डीआईजी रैंक की यह अधिकारी पहले भी अपने तेवरों को लेकर सुर्खियों में रही हैं,लेकिन इस बार मामला सीधे अधिकार क्षेत्र और विभागीय मर्यादा तक पहुंच गया है। चर्चा यह भी है कि इनके निजी जीवन से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां विभागीय रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हैं, जबकि नियमों के मुताबिक इसकी सूचना विभाग को देना अनिवार्य माना जाता है। इसी वजह से पुलिस महकमे के भीतर भी फाइलों से ज्यादा फुसफुसाहट चल रही है। ताजा मामला राजधानी रायपुर के पास अमलेश्वर का बताया जा रहा है। बताते है कि मेडम एक अलग मामले की जांच के सिलसिले में वहां पहुंची थीं, लेकिन वहां पहुंचते ही पूरा घटनाक्रम बदल गया। मेडम जिस मामले की जांच के लिए पहुंची थीं, उसे छोड़कर अचानक ऑफिस के रजिस्टर, स्टॉक पंजी और गाड़ियों का हिसाब-किताब मांगना शुरू कर दिया।कितनी गाड़ियां हैं, कितनी चलीं, कितनी खराब हैं पूरा लेखा-जोखा मौके पर ही तलब होने लगा। अमलेश्वर का अमला यह देखकर हैरान रह गया कि आखिर यह सब उनके अधिकार क्षेत्र में आता भी है या नहीं। लेकिन तब तक मेडम का मूड पूरी तरह एक्शन मोड में आ चुका था। चर्चा है कि गुस्से में उन्होंने यहां तक कह दिया सबकी खाल खींच लूंगी… सारे दस्तावेज अभी लेकर आओ। ऑफिस स्टाफ एक-दूसरे का चेहरा देखता रह गया और माहौल जांच से ज्यादा दबाव वाला दिखाई देने लगा। अब पुलिस गलियारों में यही सवाल घूम रहा है यह अचानक वाला निरीक्षण अधिकार का प्रदर्शन था, फ्रस्ट्रेशन था या फिर सिस्टम को डराने की पुरानी आदत? क्योंकि जिस काम के लिए मेडम पहुंची थीं, चर्चा उससे ज्यादा उनके धमाचौकड़ी निरीक्षण की हो रही है।

यक्ष प्रश्न –

1 – लाख टके का सवाल वन प्रमुख की डीपीसी को किसने रूकवाया,?

2 – वर्तमान डीजीपी से क्या सरकार ना-खुश है? इसलिए आनन-फानन में ऐसा गणितीय आदेश निकाला गया?

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