आईना तोड़ने की राजनीति… और सत्ता के लिए सबसे बड़ा खतरा बनते अफसर!

आईना तोड़ने की राजनीति… और सत्ता के लिए सबसे बड़ा खतरा बनते अफसर!
रायपुर : – छत्तीसगढ़ की राजनीति ने वह दौर भी देखा है जब सत्ता के खिलाफ लिखना आसान नहीं था। हालात ऐसे बन गए थे कि वरिष्ठ पत्रकार तक खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करते थे। जो पत्रकार सरकार और प्रशासन को आईना दिखाने का साहस कर रहे थे, उन्हें गिरफ्तार किया गया, उन पर मुकदमे दर्ज किए गए, वर्षों तक मानसिक, सामाजिक और आर्थिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। बाद में कई मामलों में वे दोषमुक्त हुए, लेकिन तब तक बहुत कुछ टूट चुका था।
जनता ने यह सब देखा… और शायद उसी का परिणाम था कि सत्ता बदल गई। पूर्ववर्ती सरकार को जनता ने बाहर का रास्ता दिखाया और भाजपा सत्ता में आई। उस समय पत्रकार सुरक्षा कानून की खूब चर्चा हुई, बड़े-बड़े आश्वासन दिए गए, लेकिन आज भी वह विषय फाइलों और भाषणों तक सीमित दिखाई देता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिन अधिकारियों की कार्यशैली, निर्णयों और कथित कारनामों पर तब सवाल उठते थे, उन्हीं में से कई आज भी सत्ता के सबसे प्रभावशाली पदों पर बैठे हैं। कुछ तो इतने ताकतवर हो चुके हैं कि राजनीतिक सत्ता से भी ऊपर दिखाई देने लगे हैं। उन पर लगे आरोप कोई बंद कमरों की फुसफुसाहट नहीं हैं। राष्ट्रीय स्तर का विपक्ष, बड़े नेता और कई मीडिया संस्थान सार्वजनिक रूप से उन मुद्दों को उठा चुके हैं। लेकिन विडंबना देखिए…पत्रकार जो लोकतंत्र का आईना होता है, उसमें अपना प्रतिबिंब देखने के बजाय अब आईना तोड़ने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है।
सूत्र बताते हैं कि प्रशासनिक फैसलों और अफसरशाही पर सवाल उठाने वाले कुछ पत्रकारों के खिलाफ झूठे मुकदमों, झूठे केस और दबाव की रणनीति तैयार की जा रही है। यदि ऐसा होता है तो इससे कुछ अफसर अपना स्वार्थ भले साध लें, लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान सरकार की छवि को होगा। क्योंकि सरकार लगातार पत्रकारों को लोकतंत्र का साझेदार और हितैषी बताती रही है। ऐसे में अगर पत्रकारों पर दबाव, डर और मुकदमों की राजनीति का माहौल बनता है तो यह सीधे सरकार की साख पर प्रश्नचिन्ह लगाएगा।
और इसका उदाहरण भी सामने हैं…नीति निर्धारकों द्वारा लिए गए कई फैसलों ने सरकार को जनता के बीच असहज स्थिति में खड़ा किया। बिजली बिल में मिल रही राहत को समाप्त करने का फैसला ऐसा ही एक मामला बना, जिस पर जनता में नाराजगी बढ़ी और सरकार की जमकर किरकिरी हुई। विरोध बढ़ा तो आखिरकार सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा।
इसी तरह जमीन रजिस्ट्री की बढ़ी हुई दरों को लेकर भी व्यापक विरोध हुआ। विपक्ष के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री तक खुलकर मैदान में आए। सरकार की छवि पर असर पड़ा, विपक्ष को मुद्दा मिला और अंततः सरकार को सफाई देनी पड़ी। राजनीतिक लाभ विपक्ष ले गया और सरकार बचाव की मुद्रा में दिखी।
सवाल यह है कि क्या नीति निर्धारण करने वाले कुछ अधिकारी सरकार की छवि को मजबूत कर रहे हैं… या भीतर ही भीतर उसे कमजोर कर रहे हैं?
एक और गंभीर आरोप यह भी है कि जनसंपर्क विभाग, जिसका मूल काम सरकार की योजनाओं का प्रचार-प्रसार और सकारात्मक संवाद स्थापित करना है, वह फर्जी और झूठे पत्रकारों की सूची वाले पर्चे छपवाने जैसे विवादों में उलझ गया। इस पर भी विपक्ष ने खुलकर सवाल उठाए।
अब अगर इन फैसलों, इन नीतियों और इन अधिकारियों पर सवाल पूछे जाएँ… और उसके जवाब में पत्रकारों पर दबाव, झूठे मुकदमे और डर का माहौल बनाया जाए… तो फिर सरकार की छवि सुधरेगी कैसे?
सत्ता को समझना होगा कि कुछ अधिकारी केवल कुर्सियों पर नहीं बैठे हैं। वे उस मंज़िल पर बैठे हैं जहाँ से पूरे राज्य की नीतियाँ तय होती हैं।
विडंबना यह भी है कि आज का एक बड़ा नीति निर्धारक कभी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा व्यवस्था का भी नीति निर्धारक रहा। उस दौर की अव्यवस्थाओं और विवादों ने लाखों युवाओं के भविष्य को सवालों के घेरे में खड़ा किया। आज वही सोच अगर पत्रकारों के सवालों से असहज होकर जवाब देने के बजाय दबाव की राजनीति करेगी, तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जाएगा।
कुर्सी भले ऊँची हो सकती है साहब…लेकिन जनता के सवाल उससे भी ऊँचे होते हैं।
युवाओं का भविष्य… पत्रकारों के सवाल… और जनता की नाराजगी…जब एक साथ खड़ी हो जाए…तो सबसे मजबूत दिखाई देने वाली कुर्सियाँ भी डगमगा जाती हैं।
इतिहास गवाह है…सरकारें विपक्ष से कम…अपने ही बनाए हुए सत्ता के अहंकार से ज्यादा हारती हैं।










