26 साल की कुर्सी, तिवारी का तिलिस्म और बीच में गायब तालाब! एटमोसफिरिया से 15% के खेल तक, शुक्ला कनेक्शन, फैलता साम्राज्य और बेनामी संपत्ति आखिर किसके संरक्षण में पल रहा है कारोबार –
नकटी में गरीब के आशियाने में बुलडोजर और तिवारी के तालाब में सुशासन का हाथ पांव ठंडे -

रायपुर – छत्तीसगढ़ में सत्ता का मौसम कई बार बदला कभी हाथ मजबूत हुए, कभी कमल खिला, मुख्यमंत्री बदले, मंत्रियों के चेहरे बदले, विभागों के मुखिया बदले यहाँ तक कि मंत्रालय की चौथी मंजिल से लेकर महानदी भवन तक कुर्सियां घूमती रहीं। अफसर आए, अपनी अपनी पारी खेली और रिटायर होकर घर चले गए। लेकिन जनसंपर्क विभाग में एक कहानी ऐसी है, जिस पर न सत्ता परिवर्तन का असर पड़ा, न सरकार बदलने का।
साल 1994 में सरकारी सेवा में आए संजीव तिवारी आज भी उसी विभाग की सत्ता व्यवस्था में मौजूद हैं। पद बदलते रहे, जिम्मेदारियां बढ़ती रहीं, लेकिन जनसंपर्क के गलियारों से उनकी विदाई नहीं हुई। करीब 26 साल का यह सफर इसलिए दिलचस्प है कि इसके बीच सिर्फ पदोन्नतियां नहीं हैं एक हाईकोर्ट की फाइल है, तालाब में अवैध कारोबार है, खुलेआम 15% कमीशन है, बेनामी संपत्ति है, यह सब मिलकर अब एक साम्राज्य बन चुका है।
पहले कुर्सी की कहानी फिर खुला एटमोसफिरिया का दरवाजा –
तिवारी की सर्विस फाइल में एक ऐसा अध्याय है, जिसमे आरोप और इन्ही गतिविधियों की वजह से साल 2010 की DPC में वरिष्ठता के बावजूद वे अपने जूनियर से पीछे रह गए। ACR को लेकर विवाद हुआ। मामला बढ़ा तो अदालत तक पहुंचा। बाद में संबंधित ACR अपग्रेड हुईं और 2023 में हाईकोर्ट ने समीक्षा DPC कराने का आदेश दिया। यानी तिवारी की कुर्सी का एक रास्ता मंत्रालय से होकर अदालत तक भी गया।
लेकिन यह कहानी का सबसे बड़ा अध्याय इससे भी बड़ा है
इस तिवारी ने जनसंपर्क में रहते हुए राजधानी वीआईपी रॉड अमलीडीह में तालाब की भूमि को पाटकर उसमें आलीशान एटमोसफिरिया बनाया हुआ है जहाँ रात होते ही शराब शबाब परोसी जाती है। अब सोचिए जो सरकार की छवि सुधारने वाले तंत्र में है वह खुलेआम 15% कमीशन लेकर एटमोसफिरिया चलाये शराब से लेकर हर वो व्यवस्था कराए जो एक सभ्य समाज मे स्वीकारोक्ति नही है तो सुशासन बाबू की छवि क्या रह जाती है।
तालाब में अवैध कारोबार की शिकायत हुई कलेक्टर से लेकर निगम कमिश्नर तक लेकिन लगता है सुशासन बाबू का बुलडोजर गांव और गरीबो पर ही चलता है। जो बुलडोजर आधी रात को गरीबो का आशियाना छीन सकता है वह बुलडोजर आखिर ऐसे अवैध कारोबार पर क्यो नही चलता है।
बताते है कि उच्चाधिकारियों को शिकायत के बाद तिवारी साहब ने उनके उच्च स्तर से घंटी घुमवा दी और कार्रवाही फिलहाल ठंडे बस्ते में चली गई। तिवारी खुद बोलते फिरते है 26 सालों से मुझे कुर्सी से मुझे कोई हिला नही पाया। न तो सुशासन और कोई सरकार किसी मे हिम्मत ही नही की इस कारोबार को रूकवा सके। मतलब एक अधिकारी की कुर्सी इतनी ताकतवर हो गई कि वह अब शाशन और प्रशासन दोनों को ठेंगा दिखा रहा है।
बस यहीं से कहानी में असली व्यंग्य पैदा होता है
कागजो में भूमि आज भी तालाब है लेकिन इस भूमि के आलीशान कारोबार फल फूल रहा है। और तो और तिवारी ने इस कारोबार को लाखो के किराए में दे दिया है और किराएनामे में नाम है बेटी का नोटिस में नाम पत्नी का और तिवारी जी इसके संरक्षक है जो हर महीने लाखो रुपये लेने पहुँचते है।
एटमोसफिरिया के बाद कहानी में आता है 15 प्रतिशत
अब उस हिस्से पर आइए 15 प्रतिशत यह कमीशन है या हिस्सेदारी जनसंपर्क विभाग की कार्यप्रणाली हमेशा से विवादों और सवालो में रही है। आखिर सरकारी प्रचार और विज्ञापन की व्यवस्था में ऐसा कौन सा खेल है, जो सीधे प्रतिशत के आंकड़े तक पहुंचती हैं। यहां कहानी को सनसनी से नहीं, हिसाब से देखना चाहिए। किस मद में कितना पैसा, किस एजेंसी को कितना, किस आधार पर, किसके माध्यम से, दिया गया। अगर इसकी विस्तृत जांच, जांच एजेंसी करे तो 26 सालों की कुर्सी ही नही सुशासन बाबू की सरकार भी हिल जाएगी जहाँ पॉवर है, पद का दुरूपयोग है, और सरकार की छवि पर एक बदनुमा दाग है वह खुलकर सामने आ जायेगा। और यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि सरकार की छवि चमकाने की आड़ में खुद की छवि और कारोबार कैसे चमकाई गई है।
फिर आता है वह शुक्ला कनेक्शन, जिसका नाम लेने की जरूरत नहीं
हर लंबे साम्राज्य की कहानी में एक दरबार होता है और दरबार में कुछ पुराने रिश्ते तिवारी की लंबी पारी के पीछे शुक्ला कनेक्शन की बात आती है बताया जाता है कि यह शुक्ला कनेक्शन घर की दहलीज लांघ कर इतना अंदर तक पहुँच गया है कि हर बार वह दहलीज और शुक्ला जी का आशीर्वाद कुर्सी संभाल लेता है। तिवारी जी कुर्सी के लिए इतना मोहा गए कि इन्हें यह तक नजर नही आया कि आबरू और दहलीज ही कोई लांघ गया। तिवारी जी शुरुआत में कुर्सी बचाते बचाते वहाँ पहुँच गए कि अब वह खुद दहलीज से बाहर हो गए है। राजनीति के पुराने अध्याय पढ़ चुके लोग इशारा जानते भी है और समझते भी है।
जनसंपर्क में खबर पहुंचाने वाला विभाग खुद खबर क्यों बनता रहा
कहानी का एक और सिरा मीडिया से जुड़ता है। अक्टूबर 2025 में नवा रायपुर के संवाद कार्यालय वह हुआ जो किसी भी सत्ता सुशासन को असहज कर देने वाला था। कथित पत्रकार ने तिवारी के कमीशन और उसके अवैध कारोबार पर सवाल क्या पूछा तिवारी इतने तैश में आये की सरकार की छवि बनाने वाले कार्यालय में ही जूतमपैजार शुरू हो गया। बात इतनी बढ़ी सुशासन बाबू की छवि ही नही जनसंपर्क का वह चेहरा भी सामने आ गया जो 26 सालों से कमीशन हिस्सेदारी और सरकारी राशि का बंदरबांट से जुड़ा रहा है। आखिर जनसंपर्क की कुर्सी में ऐसी कौन सी गर्मी है कि आसपास संवाद से ज्यादा टकराव दिखाई देने लगा।
अब पूरी तस्वीर को एक बार पीछे हटकर देखिए 1994 से चलती कुर्सी, 2010 की पदोन्नति की फाइल, 2023 का हाईकोर्ट आदेश, तालाब की भूमि में एटमोसफिरिया
15 प्रतिशत कमिशन, करोड़ो की बेनामी संपत्ति, पुराने सत्ता-संपर्क और फिर पत्रकारों से टकराव एक-एक करके देखें तो हर मामला अलग लग सकता है। लेकिन जब ये सारे धागे एक ही कुर्सी के आसपास आकर जुड़ते हैं, तो कहानी सिर्फ एक अधिकारी की नहीं रहती।
कहानी फिर उस सिस्टम की हो जाती है, जिसने इतने वर्षों में इस कुर्सी को देखा भी और सहा भी।
अब उस सिस्टम का हिसाब होना चाहिए, जिसने 26 साल में एक कुर्सी को इतना मजबूत होने दिया। क्योंकि सवाल यह नहीं कि तिवारी की कुर्सी कब हिलेगी… सवाल यह है कि उसे हिलाने की ताकत सिस्टम में बची भी है या नहीं।










