पहले प्रशांत, फिर पारुल… डांगी केस की फाइल में ऐसा क्या हुआ कि अधिकारी बदल गया? राहुल भगत वाली चैट के बाद निलंबन से अब जांच की कुर्सी तक पहुंची कहानी –

राजधानी – फाइलें भी कभी-कभी बड़ी अजीब कहानी लिखती हैं… एक नाम प्रस्ताव में आता है, जिम्मेदारी तय होती है, फाइल आगे बढ़ती है और अंतिम आदेश आते-आते वही नाम गायब हो जाता है। रतन लाल डांगी प्रकरण की फाइल में इन दिनों कुछ ऐसा ही हुआ है। लेकिन इस कहानी को समझने के लिए फाइल के आखिरी पन्ने से नहीं, उस शिकायत से शुरुआत करनी होगी, जिसने धीरे-धीरे पूरे पुलिस सिस्टम को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया।
एक महिला ने आईपीएस रतन लाल डांगी पर गंभीर आरोप लगाए। शिकायत हुई, लेकिन करीब पांच महीने तक मामला उसी रफ्तार से चलता रहा, जिस रफ्तार से अक्सर सरकारी शिकायतों की फाइलें चलती हैं। फिर शिकायतकर्ता के बयान के आधार पर जब हमने खबर प्रकाशित की तो पूरे पुलिस महकमे में हलचल मच गई। मामला पुलिस की साख तक पहुंच गया, लेकिन कार्रवाई के नाम पर कहानी अभी भी आगे बढ़ने के बजाय फाइलों में ही घूमती नजर आई।
फिर आया एक नाम… और हिल गया सिस्टम
शिकायत के बाद सामने आई व्हाट्सऐप चैट ने पूरे मामले को एक अलग मोड़ दे दिया। यह चैट जांच में दस्तावेज के तौर पर पेश की गई और न्यायालय के समक्ष भी इसका उल्लेख हुआ। चैट में डांगी ने कई अफसरों को लेकर गंभीर बातें कही हैं और इसी चैट में 2005 बैच के आईपीएस राहुल भगत का नाम भी आया। चैट में डांगी साफ तौर पर कहते हैं कि प्रदेश में ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर बड़े फैसलों तक में राहुल भगत की अहम भूमिका है। बात यहां तक पहुंचती है कि फाइलें ऊपर जाने से पहले ही “भगत साहेब के दफ्तर” से तय हो जाती हैं और ऊपर बैठे लोग सिर्फ हामी भरने तक सीमित रह जाते हैं। चैट में डांगी का यह भी कहना है कि “सीएम नहीं… राहुल भगत ही सब कर रहे हैं” और मुख्यमंत्री का नाम लेकर अपना काम निकाला जा रहा है।
यानी चैट में राहुल भगत को लेकर सिर्फ नाम भर नहीं आया, बल्कि फैसलों और प्रशासनिक प्रभाव को लेकर सीधे दावे किए गए।
इसी बातचीत में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का नाम लेकर भी फैसलों को रोकने या टालने की बात सामने आती है। यानी मामला अब सिर्फ डांगी और शिकायतकर्ता के बीच का नहीं रह गया था। चैट ने पुलिस और प्रशासन के भीतर फैसले कैसे होते हैं, किसके प्रभाव में होते हैं और किसके नाम का इस्तेमाल किया जाता है इन सवालों को भी सामने ला दिया।
राहुल भगत का नाम सामने आया और इसके बाद डांगी पर कार्रवाई हुई, निलंबन हुआ और मामला औपचारिक जांच के दायरे में आ गया। पहली जांच की जिम्मेदारी आनंद छाबड़ा और मिलना कुर्रे को दी गई। लेकिन शिकायतकर्ता ने जांच की निष्पक्षता और प्रक्रिया पर सवाल उठाए। जांच आगे बढ़ी, शिकायतकर्ता न्यायालय पहुंची और मामला हाईकोर्ट तक जा पहुंचा। अदालत की दखल के बाद सरकार को आगे की विभागीय जांच के लिए नई व्यवस्था करनी पड़ी।
यहीं से कहानी में प्रशांत कुमार अग्रवाल दाखिल होते हैं।
17 सितंबर 2026 को पुलिस मुख्यालय से गृह विभाग को भेजे गए प्रस्ताव में दीपांशु काबरा को जांच अधिकारी और प्रशांत अग्रवाल को प्रस्तुतकर्ता अधिकारी बनाए जाने की बात कही गई। यानी डांगी के खिलाफ विभागीय जांच में सरकार का पक्ष रखने की जिम्मेदारी प्रशांत अग्रवाल को देने का प्रस्ताव था।
फाइल आगे बढ़ी… लेकिन अंतिम आदेश तक पहुंचते-पहुंचते फिर कुछ बदल गया
29 सितंबर को गृह विभाग का आदेश आया। दीपांशु काबरा जांच अधिकारी बने रहे, लेकिन प्रस्तुतकर्ता अधिकारी की कुर्सी पर प्रशांत अग्रवाल नहीं, महिला आईपीएस पारुल माथुर आ गईं।
17 सितंबर को प्रशांत… 29 सितंबर को पारुल
आखिर इन बारह दिनों में ऐसा क्या हुआ कि प्रस्ताव में शामिल नाम अंतिम आदेश से बाहर हो गया? प्रशांत अग्रवाल के रायपुर SSP रहते उनके कार्यकाल में महिलाओं की शिकायतों से जुड़े पुराने मामले भी पुलिस कार्रवाई को लेकर सवालों में रहे हैं। एक मामले में महिला जेल अधिकारी ने तत्कालीन DIG के खिलाफ शिकायत की थी और उस समय प्रशांत अग्रवाल रायपुर SSP थे। बताया जाता है कि इस मामले में प्रशांत अग्रवाल पर कथित लेनदेन का आरोप भी लगा था वही दूसरे प्रकरण में एक महिला ने गंभीर शिकायत पर कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाया था और शिकायत तत्कालीन SSP स्तर तक पहुंचने की बात कही थी। इन मामलों में प्रशांत अग्रवाल को दोषी ठहराने वाला कोई न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं है, लेकिन जब नई फाइल भी एक महिला की शिकायत और गंभीर आरोपों से जुड़ी हो, तो पुराने प्रशासनिक संदर्भों का फिर चर्चा में आना स्वाभाविक है।
अब पूरी तस्वीर को एक साथ रखिए एक महिला की शिकायत, पांच महीने की खामोशी, खबर के बाद मचा हड़कंप, जांच में पेश हुई चैट में राहुल भगत का नाम, डांगी का निलंबन, पहली जांच पर सवाल, हाईकोर्ट की दखल और फिर नई जांच की जिम्मेदारी तय करते समय पहले प्रशांत अग्रवाल का नाम और बाद में पारुल माथुर की नियुक्ति।
कहानी में किरदार बदलते गए, लेकिन सवाल वहीं खड़ा है।
क्या प्रशांत अग्रवाल का नाम हटना महज प्रशासनिक फेरबदल था? क्या संवेदनशील मामले को देखते हुए किसी स्तर पर दोबारा विचार किया गया? या फिर इसके पीछे कोई और प्रशासनिक वजह थी? सरकारी आदेश इस बदलाव की वजह नहीं बताता। इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। लेकिन दस्तावेजों की टाइमलाइन अपनी कहानी खुद कहती है।
17 सितंबर प्रशांत अग्रवाल
29 सितंबर—पारुल माथुर
अब डांगी केस की फाइल में सबसे ज्यादा चर्चा शायद आरोपों की नहीं, बल्कि उस नाम की है जो प्रस्ताव में था और अंतिम आदेश तक पहुंचते-पहुंचते गायब हो गया।
क्योंकि सवाल अब सिर्फ यह नहीं कि डांगी की जांच कौन करेगा…सवाल यह भी है कि जिस मामले की शुरुआत एक महिला की शिकायत से हुई, जिस जांच में राहुल भगत के फैसलों और प्रभाव को लेकर डांगी की चैट सामने आई, जिसके बाद डांगी निलंबित हुए, उसी मामले की नई जांच में पहले ‘प्रशांत’ नाम आया ही क्यों और फिर ‘पारुल’ तक पहुंचते-पहुंचते फाइल ने रास्ता क्यों बदल लिया?
फाइल का जवाब अभी सामने नहीं आया है… लेकिन नाम बदलने की कहानी जरूर सामने आ गई है।










