अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

खोखा, कप्तान, कैमरा –
छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक दौर ऐसा भी आया था, जब एक नेता ने स्कूली बस्तों पर अपना फोटो छपवा दिया था। तब एक बड़े केंद्रीय नेता ने तंज कसा था कि नेताजी को हीरो बनने का इतना ही शौक है, तो बॉलीवुड क्यों नहीं चले जाते? इन दिनों वही सवाल पुलिस विभाग में भी गूंज रहा है। दरअसल, एक जिले के कप्तान साहेब को भी हीरो बनने का खासा शौक चढ़ा हुआ है। फर्क बस इतना है कि ये बस्ते पर फोटो नहीं छपवा रहे, बल्कि खुद की शॉर्ट मूवी बना रहे हैं। वर्दी में एंट्री…धीमी चाल…बैकग्राउंड म्यूजिक…और फिर साहेब खुद हीरो की भूमिका में। कहते हैं पुलिस की नौकरी 24 घंटे की ड्यूटी मानी जाती है। अफसर घर-परिवार तक के लिए समय नहीं निकाल पाते। मगर साहेब के पास घंटों शूटिंग का वक्त है। आए दिन इनकी नई मूवी रिलीज हो जाती है। पहले मुखिया जी के गृह जिले में कप्तानी संभाल रहे थे, अब युवा आईएएस मंत्री जी के जिले में तैनात हैं। लेकिन जिले में चर्चा कानून व्यवस्था से ज्यादा साहेब की अगली फिल्म की रहती है। इसी बीच एक हिंदूवादी नेता संदेशवाहक किसी काम से उनके पास पहुंचे। काम तो नहीं हुआ, मगर साहेब ने जो कारण बताया, उसने सबको चौंका दिया। बताते हैं साहेब बोले हर महीने एक खोखा ऊपर चढ़ाना पड़ता है। अब यह ऊपर कौन है, यही सबसे बड़ा रहस्य बन गया है। अगर सच में खोखा ऊपर जाता है, तो स्थिति भयावह है। और अगर नहीं जाता तो फिर साहेब यह कहानी किसको सुना रहे हैं? जिले में अब लोग पूछ रहे हैं अगर हर महीने खोखा जा रहा है, तो लॉ एंड ऑर्डर आखिर कहां है? और अगर साहेब हीरो बनने में व्यस्त हैं तो कप्तानी आखिर कौन कर रहा है?

डीजीपी साहेब तो सोए हुए हैं –
सिंघम फिल्म का यह डायलॉग इन दिनों छत्तीसगढ़ पुलिस मुख्यालय के गलियारों में सबसे फिट बैठता दिख रहा है। राज्य में चाकूबाजी, गोलीकांड और अपराध की खबरें रोज बढ़ रही हैं, लेकिन मुख्यालय में यही चर्चा है कि डीजीपी साहेब तो सोए हुए है। कहते हैं यहां पेपर पिन खरीदना हो तो नोटशीट लगती है। स्टेपलर पिन चाहिए तो मंजूरी चाहिए। एसी में गैस भरानी हो तो जवाब एक ही मिलता है, प्रभारी साहेब देखेंगे मुख्यालय की एसी खराब पड़ी हैं। कूलर की व्यवस्था नहीं है। कर्मचारी आवास को तरस रहे हैं। लेकिन गेट पर लगी मेटल डिटेक्टर मशीन आज भी ऐसे खड़ी है जैसे पूरा सिस्टम हाईटेक निगरानी में चल रहा हो, जबकि वह मशीन महीनों से बंद पड़ी है। हालात ऐसे हैं कि डीजी स्तर के अफसरों के केबिन तक में छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए फाइलें घूम रही हैं। बाकियों की स्थिति क्या होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। इधर ग्राउंड फ्लोर से लेकर सेकेंड फ्लोर तक एक ही प्रार्थना चल रही है बस प्रभारी साहेब रेगुलर मत हो जाएं। कहते हैं कुछ दिन पहले साहेब को आभास हुआ कि कुर्सी पक्की हो सकती है। फिर क्या था दौरे शुरू हो गए। फोटो सेशन शुरू हो गए। मीटिंग, निरीक्षण, समीक्षा सब दिखने लगा। लेकिन जैसे ही खबर पर मुहर नहीं लगी, मुख्यालय फिर उसी पुराने सन्नाटे में लौट आया। जैसे साहेब हैं भी और नहीं भी। अब पुलिस मुख्यालय में सबसे बड़ा सवाल अपराध नहीं, नोटशीट बन चुका है। और लोग तंज में बस कह रहे हैं साहेब जब तक रेगुलर नही होंगे वह सोए रहेंगे। लेकिन अगर पेपर पिन लेना हो तो पूरी फाइल जाग जाती है।

तीन नामो वाला जिला –
छत्तीसगढ़ के उत्तर-पूर्व में एक ऐसा जिला है, जिसका नाम लेते-लेते ही सांस लंबी हो जाती है। तीन नामों वाला यह जिला जंगल, पहाड़, खदान, नदियों और प्राकृतिक संपदा से भरा पड़ा है। जिले में संभावनाएं इतनी कि कोई भी अफसर यहां इतिहास लिख सकता है। लेकिन कहते हैं, जब अफसर विकास से ज्यादा अपनी संभावनाएं तलाशने लगे, तब जनता का भरोसा टूटने लगता है। फिर हुआ वही पहली बार जिला पाने वाली तीन नामों वाली मैडम के कार्यकाल में यही चर्चा सबसे ज्यादा रही।जंगलों और आदिवासी इलाकों से घिरे इस जिले में विकास की जितनी संभावना थी, उतना ही तेजी से अविश्वास बढ़ने लगा। इधर अफसर हलकान, कर्मचारी परेशान और जनता दफ्तरों के चक्कर काटती रही। जिले में चर्चा थी कि यहां फाइलों का रास्ता नियम से कम और रकम से ज्यादा तय होता था। 5 हजार 10 हजार फिर काम के हिसाब से बात। बताते है मेडम खुद ही सारी डील कर लिया करती थी। कहते हैं, इससे पहले भी कई कलेक्टर आए, लेकिन जितनी मलाई इस कार्यकाल में निकली, उतनी किसी के हिस्से नहीं आई। अब शिकायतें राजधानी से निकलकर उन दफ्तरों तक पहुंच गई हैं, जहां फाइलें धीरे खुलती हैं लेकिन असर बड़ा होता है। इसी बीच उसी बैच के कई अफसर जिलों की कमान पा गए, मगर तीन नामों वाली मैडम लूप लाइन में दिखाई देने लगीं। सिस्टम इसे सामान्य पोस्टिंग बता रहा है। लेकिन गलियारों में चर्चा कुछ और है। लोग कह रहे हैं अगर पूरे कार्यकाल की जांच हो गई, तो सिर्फ फाइलें नहीं खुलेंगी कई चेहरों से पर्दा भी हट जाएगा।

कटा सेव और सचिव मैडम –
महिला एवं बाल विकास विभाग इन दिनों किसी योजना से नहीं, बल्कि एप्पल प्रकरण से ज्यादा चर्चाओं में है। कहानी एक सहायक संचालक साहेब की है, जिन्हें एक साल पहले बड़ी कृपा और सजातीय समीकरणों के सहारे विभाग में लाया गया था। कहते हैं, यह पोस्टिंग योग्यता से कम और अपनापन ज्यादा देखकर हुई थी। लेकिन साल भर बीत गया और साहेब ने जकात-दक्षिणा की परंपरा नहीं निभाई। बस यहीं से कहानी बिगड़ गई। बताते हैं कि सचिव मैडम ने सीधे संकेत दिया कि अब कुछ सम्मान दिखाया जाए। साहेब ने भी हामी भर दी और बोले मैडम, लैपटॉप वो भी कटा हुआ सेव भेजवा देते हैं। गुस्ताखी यहीं हो गई। छोटे साहेब ने मासूमियत में पूछ लिया मैडम, एड्रेस बता दीजिए डिलीवरी कहां करनी है? बस इतना सुनते ही मैडम का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। कहते हैं मैडम झल्लाकर बोलीं एक तो पूरे प्रदेश में जांच एजेंसियां घूम रही हैं, ऊपर से तुम घर के पते पर एप्पल पहुंचाओगे? दरअसल, कुछ समय पहले मैडम के घर जांच एजेंसी दस्तक दे चुकी है। हालांकि मामला उनके शौहर से जुड़ा था, मगर डर यह था कि अगर परतें खुलतीं, तो कई राज एक साथ बाहर आ जाते। बस फिर क्या था तत्काल आदेश निकला। सहायक संचालक साहेब को एसआरसी भेज दिया गया। वो भी इतनी तेजी से कि विभाग के लोग नोटशीट ढूंढते रह गए।
कहते हैं आदेश मैडम की सबसे भरोसेमंद कनिष्ठ अधिकारी से जारी करवाया गया। और मजे की बात यह कि विभाग के भारसाधक मंत्री तक को इसकी भनक नहीं लगी। अब मंत्रालय में लोग फुसफुसा रहे हैं सरकारी विभागों में ट्रांसफर क्या एप्पल डिलीवरी सिस्टम से तय होने लगे हैं।

एक्सीलेरेशन का एक्स्ट्रा खेल –
छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाकों में सड़क, भवन और सुरक्षा ढांचे खड़े करने का जिम्मा जिन संस्थाओं पर है, अब उन्हीं के भीतर एक्सीलेरेशन का नया गणित चर्चाओं में है। कहते हैं निर्माण कार्यों में मूल्य वृद्धि यानी एक्सीलेरेशन का ऐसा फार्मूला निकाला गया कि सरकारी काम कम और कमाई ज्यादा दिखाई देने लगी। शुरुआत में खेल खूब चला।
फाइलें दौड़ीं। मंजूरियां मिलीं। और रकम का प्रवाह भी बढ़िया रहा। लेकिन दिक्कत वहां शुरू हुई, जहां हमेशा होती है बंटवारे में। बताते हैं संस्था प्रमुख ने पूरा हिसाब तय कर दिया था। 80-20 का रेशियो यानी कौन कितना पाएगा, किस हिस्से में क्या जाएगा सबका गणित लगभग फिक्स था। कुछ समय तक सब शांत चला। फिर निर्माण कंपनी वालों ने ही आपत्ति दर्ज कर दी। बस यहीं से मामला अंदरखाने में तैरने लगा। अब विभागीय गलियारों में लोग तंज कस रहे हैं कि नक्सल क्षेत्र में विकास कार्यों से ज्यादा वैल्यू एडिशन पर रिसर्च हो रही है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जिन इलाकों में जवान जान जोखिम में डालकर सड़क और कैंप बनवा रहे हैं, वहां फाइलों में चल रहा यह प्रतिशत विज्ञान आखिर किसके हित में है? क्योंकि अगर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े निर्माण कार्यों में भी कमीशन का कैलकुलेटर साथ चल रहा हो, तो फिर फर्क सिर्फ इतना बचता है कि वर्दी कौन पहन रहा है और ठेका कौन उठा रहा है। अब सिस्टम के जानकार फुसफुसा रहे हैं यहां विकास की रफ्तार से ज्यादा रेशियो पर निगाह रखी जा रही है। और शायद यही वजह है कि राष्ट्रीय हित का हर बड़ा प्रोजेक्ट आखिरकार किसी न किसी का स्वहित प्रोजेक्ट बन जाता है।

चढ़ावा, ट्रांसफर, तकरार –
बीते दिनों प्रदेश में बड़ा प्रशासनिक भूचाल आया। 43 आईएएस अफसरों की लंबी सूची निकली और उसके साथ ही आईपीएस गलियारों में कानाफूसी शुरू हो गई अब अगली बारी वर्दी वालों की है बताते हैं पांचवीं मंजिल में बैठक भी हो गई। लिस्ट लगभग तैयार थी। एक इंटेलिजेंस वाले साहेब भी साथ बैठे थे। जिले तय हो रहे थे, नाम आगे-पीछे हो रहे थे और कई कप्तान अपनी कुर्सी का नक्शा मन में बना चुके थे। लेकिन जैसे ही सूची बाहर आने वाली थी सब अचानक अटक गया। कारण बड़ा दिलचस्प बताया जा रहा है। कहते हैं ट्रांसफर-पोस्टिंग के इस मौसम में अलग-अलग जगह अलग-अलग चढ़ावे चढ़ चुके हैं। किसी ने सोने-चांदी वाले दरबार में हाजिरी लगाई। कोई बगुला भगत के दफ्तर पहुंचा। किसी ने मंदिर का रास्ता पकड़ा। तो कोई जिम तक में प्रणाम कर आया। हर जगह कुछ न कुछ समर्पण हुआ है। क्योंकि हर किसी को कहीं न कहीं जाना है। मगर दिक्कत यह हो गई कि एक ही जिले के लिए कई-कई दावेदारों ने अदायगी कर दी। अब ऊपर वाले भी असमंजस में हैं कि किसको भेजें और किसको समझाएं? यही वजह बताई जा रही है कि फिलहाल मामला रोक दिया गया है। कहा गया कि 19 तारीख के बाद केंद्रीय गृह मंत्री का दौरा निपट जाए, फिर बैठकर सोचेंगे इधर जिन लोगों ने चढ़ावा चढ़ाया है, वे बेचैन घूम रहे हैं। फोन पर फोन। संदेश पर संदेश। हर किसी का एक ही सवाल साहेब, हमारा जिला फाइनल हुआ कि नहीं? इन सब मे सोने-चांदी वाला दरबार सबसे ज्यादा निश्चिंत बताया जा रहा है। क्योंकि कोई कहीं जाए या न जाए उनका कमीशन प्रसाद तो पहले ही सुरक्षित हो चुका है।

वर्दी, रिश्ते और रहस्यों का महकमा –
छत्तीसगढ़ पुलिस महकमे में कुछ कहानियां कभी नही मरती। वे फाइलों में दब जाती हैं, फिर साल-दो साल बाद किसी नए नाम, नई शिकायत और नए खुलासे के साथ लौट आती हैं। एक दौर में “मून गुप्ता” नाम की फेसबुक आईडी चर्चा में आई। आरोप लगे कि मामला सिर्फ सोशल मीडिया प्रोफाइल का नहीं, बल्कि वर्दी, रिश्तों और प्रभावों के ऐसे जाल का था जिसने कई परिवारों और निजी जिंदगी को प्रभावित किया। इसी बीच विभाग के भीतर महिलाओं के उत्पीड़न से जुड़े आरोप भी उठते रहे। छोटे कर्मचारी नहीं, बड़े अफसरों के नाम फुसफुसाहटों में आते रहे। कुछ दस्तावेज़ सामने आए, विशाखा कमेटी तक जांच पहुंची और आदेशों में “substance” जैसे शब्द दर्ज हुए। फिर विभागीय कार्रवाई, CAT, हाईकोर्ट और वर्षों तक घूमती फाइलें… मगर पुलिस मुख्यालय में सबसे बड़ा सवाल वही रहा इतने बड़े अफसरों के खिलाफ आखिर बोले कौन?
महकमे में कई महिलाएं वर्षों तक दबाव, प्रताड़ना और मानसिक उत्पीड़न झेलती रहीं। कुछ ने शिकायत की, कुछ चुप रहीं और कुछ का ट्रांसफर ही समाधान बना दिया गया। इसी महकमे ने वह दरोग़ा कांड भी देखा, जहां एक अफसर मरने के बाद भी दो बार और “मरा” पहले हत्या हुई, फिर रिश्तों का सच सामने आया और अंत में बीमारी की कहानी। रतन लाल डाँगी प्रकरण में भी शिकायतें, तस्वीरें, निलंबन और विभागीय जांच लंबे समय तक चर्चा में रहे। उधर मिक्की मेहता कांड की सालों पुरानी फाइल दोबारा खुली तो कई पुराने सवाल फिर सतह पर आ गए। अब सवाल सिर्फ अपराध का नहीं रह गया। सवाल उस समानांतर दुनिया का है, जो वर्दी के भीतर पलती बताई जाती है जहां पद, प्रभाव, रिश्ते, दबाव और संरक्षण मिलकर अलग सिस्टम बना देते हैं। क्योंकि जब शिकायतें विशाखा कमेटी तक पहुंचने लगें जब जांच रिपोर्टों में “substance” लिखा जाने लगे, जब परिवार टूटने के आरोप फाइलों में दर्ज होने लगें तो मामला सिर्फ व्यक्तिगत नहीं रह जाता। वह पूरे सिस्टम के चरित्र पर सवाल बन जाता है। और शायद यही वजह है कि पुलिस महकमे की कुछ कहानियां कभी खत्म नहीं होतीं वे बस वर्दी बदलती हैं, किरदार बदलते हैं और फाइलों के रंग बदल जाते हैं।

खोखे से लेकर कैमरे तक…नोटशीट से लेकर नक्सल इलाके के “रेशियो” तक…ट्रांसफर के चढ़ावे, मंत्रालय में कटा सेव और वर्दी के भीतर छिपे रिश्तों के रहस्य…इस बार की चिट्ठी में सत्ता, सिस्टम, वर्दी और भीतरखाने की वो कहानियां…जो फाइलों में दब जाती हैं, मगर गलियारों में कभी नहीं मरतीं

यक्ष प्रश्न –
1 – एक महिला बच्चो वाला मंत्रालय “खुदा” के सेवक से मुक्त तो हो गया मगर रूह से छुटकारा आखिर कब मिलेगा?

2 – हिम के अंशु की ताकत के आगे अरुणोदय क्या अस्त हो जाएगा ? या कोई नई शक्ति का आगाज होगा?

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