बिल पर साहू, QR पर शिशिर पांडेय विधानसभा की चाय-नाश्ता व्यवस्था का असली संचालक कौन? सप्लाई से QR Code तक की कड़ियां खोलेंगी विधानसभा के भीतर चल रहे रहस्य का पर्दा

 

रायपुर – छत्तीसगढ़ विधानसभा में चाय-नाश्ते की एक व्यवस्था अब सिर्फ खान-पान का मामला नहीं रह गई है। एक QR Code ने ऐसी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें हर कड़ी अलग-अलग दिखाई दे रही है। नाम साहू टी स्टॉल का है। बिल ‘साहू टी स्टॉल’ के नाम से है। खाना तैयार करने में सरकारी कर्मचारियों की भूमिका है। सरकारी परिसर और संसाधनों के उपयोग और भुगतान के लिए मंगवाए गए QR Code पर नाम शिशिर पांडेय का है।
यानी विधानसभा के भीतर चाय के एक कप तक पहुंचने से पहले और उसके भुगतान के बाद तक की कहानी में इतने नाम और चेहरे क्यों हैं, अब यही सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

विधानसभा की चाय बेच कौन रहा है –
मामले की शुरुआत एक बेहद साधारण सवाल से होती है। विधानसभा में चाय-नाश्ते की सप्लाई आखिर किसकी है। यदि जवाब साहू टी स्टॉल है तो भुगतान के लिए दिए गए QR Code पर शिशिर पांडेय का नाम क्यों सामने आ रहा है। यदि शिशिर पांडेय ही भुगतान प्राप्त करने के लिए अधिकृत व्यक्ति हैं तो फिर बिल और व्यवसाय का नाम अलग क्यों है। यहीं से मामला केवल हिसाब-किताब का नहीं, बल्कि वास्तविक संचालन और लाभार्थी की पहचान का हो जाता है। क्योंकि सरकारी पैसे की दुनिया में यह जानना जरूरी है कि जिसके नाम पर काम दिखाया गया, क्या पैसा भी उसी तक पहुंचा।

एक QR Code और कई सवाल –
QR Code डिजिटल भुगतान का सबसे आसान माध्यम है, लेकिन सरकारी भुगतान की कहानी में यही QR Code अब सबसे अहम कड़ी बन सकता है। जानकारी के अनुसार भुगतान के लिए QR Code उपलब्ध कराया गया और उसे स्कैन करने पर शिशिर पांडेय का नाम प्रदर्शित हुआ। अब विधानसभा प्रशासन के सामने सवाल यह है कि शिशिर पांडेय कौन हैं। उनका साहू टी स्टॉल से क्या संबंध है। क्या वे प्रतिष्ठान के कर्मचारी, साझेदार, संचालक अथवा अधिकृत भुगतान प्राप्तकर्ता हैं। यदि हैं तो इसका रिकॉर्ड कहां है। सरकारी भुगतान से पहले क्या यह जांचा गया कि QR Code उसी व्यक्ति अथवा प्रतिष्ठान से अधिकृत रूप से जुड़ा है, जिसके नाम से बिल प्रस्तुत किया जा रहा है।

यह चाय का बिल नहीं, कंट्रोल रूम तलाशने का मामला है –
इस पूरे मामले को उल्टा पढ़ने की जरूरत है। सवाल यह नहीं कि चाय किसने बनाई। सवाल यह है कि पूरी व्यवस्था को नियंत्रित कौन कर रहा है। किसके नाम से बिल बने। कौन ऑर्डर लेता है। खाना कहां तैयार होता है। कौन उसे समिति कक्ष तक पहुंचाता है। और भुगतान का अंतिम डिजिटल ठिकाना कौन है। यदि इन सभी कड़ियों के जवाब अलग-अलग नामों में बंटे हुए हैं तो विधानसभा को यह स्पष्ट करना होगा कि इस व्यवस्था का वास्तविक संचालक आखिर कौन है। यही वह बिंदु है जहां एक साधारण टी स्टॉल की कहानी ऐसी व्यवस्था की दिशा में जांच की मांग पैदा करती है, जिसमें सामने दिखाई देने वाला नाम और वास्तविक संचालन करने वाला व्यक्ति अलग-अलग तो नहीं है।

सरकारी कर्मचारी बनाएं, सरकारी संसाधन लगें और बिल निजी नाम से –
इस मामले की दूसरी परत इससे भी ज्यादा गंभीर है। जानकारी है कि समितियों के लिए भोजन और नाश्ता तैयार करने में PWD से जुड़े महिला कर्मचारी और वर्कर भूमिका निभाते रहे हैं। विधानसभा परिसर के स्थान, बिजली, पानी, बर्तन, इंडक्शन और अन्य संसाधनों के उपयोग को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। अब तस्वीर को एक साथ रखिए जगह सरकारी, बिजली-पानी सरकारी, संसाधनों सरकारी, कर्मचारियों की भूमिका सरकारी
मगर बिल एक निजी टी स्टॉल के नाम से और QR Code पर नाम किसी दूसरे व्यक्ति का यहीं से सवाल सीधा हो जाता है कि इस व्यवस्था में निजी खर्च आखिर है किसका है। यदि खाना तैयार करने और सप्लाई की व्यवस्था में सरकारी ढांचा इस्तेमाल हो रहा है तो निजी प्रतिष्ठान का वास्तविक खर्च कितना है और बिल किस आधार पर बनाया जा रहा है। इसका जवाब केवल मौखिक सफाई से नहीं, बल्कि कर्मचारियों की ड्यूटी, संसाधनों के उपयोग, बिलों और भुगतान रिकॉर्ड से सामने आ सकता है।

5 हजार की चाय में असली सवाल रकम का नहीं, रास्ते का है –
समिति की एक बैठक में चाय-नाश्ते पर लगभग 5 से 6 हजार रुपए खर्च होने की जानकारी है। बैठकों की संख्या बढ़ने के साथ सालाना खर्च लाखों तक पहुंच सकता है।
लेकिन यहां बहस यह नहीं कि 5 हजार ज्यादा हैं या कम असली सवाल यह है कि वह 5 हजार किस रास्ते से किसके पास पहुंचा। सरकारी व्यवस्था में रकम छोटी हो सकती है, लेकिन भुगतान का अस्पष्ट रास्ता छोटा मुद्दा नहीं होता। यदि बिल एक नाम से और भुगतान दूसरे व्यक्ति को हुआ है तो संबंधित दस्तावेजों में यह स्पष्ट होना चाहिए कि दोनों के बीच संबंध क्या है और भुगतान किस आधार पर किया गया।

विधानसभा की सुरक्षा में जेब से लेकर जूते तक नजर, लेकिन खाने की जिम्मेदारी किसकी –
मामले का एक बेहद संवेदनशील पहलू सुरक्षा का भी है। विधानसभा परिसर में प्रवेश करने वाले व्यक्ति, उनके सामान और वाहनों की जांच होती है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि यहां राज्य के सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर बैठे लोग आते हैं। लेकिन इसी परिसर में पहुंचने वाले भोजन की सप्लाई के मामले में असली सप्लायर कौन है, खाना कहां तैयार हो रहा है, कौन लेकर आ रहा है और उसकी जवाबदेही किसके पास दर्ज है, यह पूरी श्रृंखला स्पष्ट होना जरूरी है। यदि बिल पर एक नाम, संचालन में दूसरे लोगों की भूमिका और भुगतान की डिजिटल पहचान तीसरे नाम से जुड़ी हो तो किसी अप्रिय स्थिति में जिम्मेदारी तय करने की पहली कड़ी ही उलझ सकती है। अब जांच QR Code से शुरू होनी चाहिए। इस मामले में सबसे आसान और सबसे महत्वपूर्ण जांच QR Code से शुरू हो सकती है। QR Code किस बैंक खाते अथवा UPI ID से जुड़ा है। उसका वास्तविक खाताधारक कौन है। विधानसभा से उसमें कितने भुगतान हुए। किस-किस बिल के एवज में हुए और उन बिलों पर सप्लायर का नाम क्या था। इसके बाद साहू टी स्टॉल की पूरी व्यावसायिक पहचान की जांच होनी चाहिए। प्रतिष्ठान का वास्तविक पंजीयन क्या है। प्रोपराइटर कौन है। व्यवसाय का पता क्या है। GST अथवा अन्य व्यावसायिक दस्तावेज क्या हैं। और शिशिर पांडेय का इस प्रतिष्ठान से दस्तावेजी संबंध क्या है।

सिर्फ नीचे की व्यवस्था या ऊपर तक था वरदहस्त –
विधानसभा जैसे संवेदनशील परिसर में लंबे समय से ऐसी व्यवस्था पर सचिव दिनेश शर्मा का वरदहस्त बताया जाता है। दिनेश शर्मा की प्रशासनिक निगरानी, स्पीकर स्तर तक इसकी जानकारी और नेता प्रतिपक्ष के स्तर पर संरक्षण के गंभीर आरोप भी लग रहे है। सवाल सीधा है नीचे चाय बनती रही, बिल साहू टी स्टॉल के नाम से बनते रहे और भुगतान दूसरे नाम के QR Code में पहुंचता रहा, तो ऊपर बैठे जिम्मेदारों को इसकी जानकारी नहीं थी या फिर इस पूरी व्यवस्था को किसी स्तर पर वरदहस्त मिला हुआ था। अब QR Code के साथ-साथ इस सवाल का जवाब भी सामने आना जरूरी है।

कहानी अब चाय की नहीं, ‘कौन कमांड कर रहा है’ की है –
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा रहस्य यही है कि सामने दिखाई देने वाला नाम और पीछे काम कर रही व्यवस्था एक ही है या नहीं साहू टी स्टॉल सिर्फ नाम है। शिशिर पांडेय केवल QR Code धारक हैं। या फिर दोनों के बीच कोई ऐसा संबंध है, जिसे सरकारी भुगतान रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाना चाहिए था। शिशिर पांडेय का विधानसभा प्रशासन अथवा वहां पदस्थ किसी अधिकारी से कोई पारिवारिक अथवा अन्य संबंध तो नही है।

विधानसभा के भीतर चाय का कप भले छोटा हो, लेकिन उसके पीछे चल रही व्यवस्था का हिसाब अब बड़ा सवाल बन चुका है। क्योंकि यहां बिल पर लिखा नाम कुछ और है और QR Code स्कैन करने पर सामने आ रहा नाम कुछ और अब सवाल सिर्फ इतना है विधानसभा की चाय-नाश्ता व्यवस्था का असली मालिक और असली संचालक आखिर कौन है।

 

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