अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)
दीदी गैंग और सत्ता का कॉकटेल –
छत्तीसगढ़ की अफसरशाही में इन दिनों फाइलों के साथ एक नया सोशल प्रोटोकॉल भी खूब चर्चा में है। कुछ महिला अधिकारी किटी पार्टी की नई संस्कृति में ऐसी रमी हैं कि चाय-पकौड़े वाले पुराने दौर को अब शायद सरकारी इतिहास में भेज दिया गया है। महफिलें सजती हैं, ग्रुप बनते हैं और शराब भी सामाजिक मेल-मिलाप का हिस्सा बन गई है। कुछ घरों में तो पति भी बड़े अधिकारी हैं कोई आईएएस, कोई आईपीएस। बेचारे दिनभर कानून-व्यवस्था, प्रशासन और फाइलों से जूझें, शाम को घर पहुंचें तो एक अलग ही किटी प्रशासन चल रहा होता है। एक साहब तो इतने परेशान बताए जाते हैं कि उनके कनिष्ठ भी इस घरेलू प्रशासनिक संकट पर व्यंग्य करने लगे हैं और फिर आती हैं ग्रुप वाली दीदियां। इनका ग्रुप कोई साधारण व्हाट्सऐप ग्रुप नहीं है। यहां दोस्ती का सदस्यता अभियान इतना मजबूत है कि पति छोड़ो, ग्रुप जॉइन करो वाली विचारधारा तक पहुंच गया है। एक पुराने ताकतवर आईपीएस साहब की मैडम भी इन दिनों अपने इसी सामाजिक शौक में डूबी रहती है। आखिर सत्ता के गलियारों में ताकत सिर्फ फाइल से नहीं मापी जाती कभी-कभी यह भी देखा जाता है कि किसकी किटी में कौन आता है और किसकी पार्टी में किसका गिलास उठता है। कुछ दीदियां जंगल और चिड़ियों की प्रेमी भी हैं। प्रकृति संरक्षण से लेकर प्रकृति दर्शन तक सब चलता है। बस फर्क इतना है कि जंगल की चिड़ियां शाम को अपने घोंसले लौट जाती हैं और राजधानी की कुछ प्रशासनिक चिड़ियां शाम होते ही हवाओ में उड़ने लगती है। सरकार फाइलों में महिला सशक्तिकरण खोज रही है और गलियारों में कुछ लोग उसका नया संस्करण बता रहे हैं पहले विभाग में नेटवर्क बनाओ, फिर किटी में नेटवर्क मजबूत करो, और गिलास के साथ रिश्तों का समन्वय बढ़ाओ। वैसे इसमें बुराई भी क्या है। पुरुष अफसर वर्षों से क्लबों और बैठकों में नेटवर्किंग करते आए हैं। अब प्रशासनिक दीदियों ने भी शायद सोच लिया है कि बराबरी केवल कुर्सी तक क्यों रहे, किटी तक भी पहुंचनी चाहिए! बस एक सावधानी जरूरी है फाइल में नशा-मुक्त प्रशासन और पार्टी में फुल स्पिरिट प्रशासन दोनों का संतुलन बना रहना चाहिए। वरना कल को कोई कनिष्ठ अधिकारी यह न पूछ बैठे मैडम, यह प्रशासनिक बैठक थी या किटी की समीक्षा बैठक और फिर जवाब आए तुम फाइल देखो बेटा… यह उच्चस्तरीय समन्वय है!
शेख चिल्ली की सोलर स्टडी लिव –
पुलिस महकमे में इन दिनों एक नए किस्सागो की चर्चा है। नाम भले शेख हो, लेकिन कहानी पूरी शेख चिल्ली वाली लगती है। साहब कभी इतने ताकतवर थे कि सत्ता के गलियारों में उनकी गिनती अलग ढंग से होती थी। वक्त बदला, सरकार बदली और साहब के ऊपर जांच मंडराने लगी। महादेव सट्टा प्रकरण में नाम और CBI की दस्तक की बातें भी सामने आईं। लेकिन महादेव की कृपा ऐसी रही कि साहब के भविष्य की पढ़ाई का रास्ता निकल आया। यहां महादेव की कृपा को धार्मिक अर्थ में मत लीजिए, व्यंग्य उसी चर्चित महादेव सट्टा प्रकरण पर है। साहब ने पुलिसिंग से थोड़ा विराम लिया और निकल पड़े सोलर एनर्जी का ज्ञान अर्जित करने। सवाल यह है कि पुलिस महकमे का सूरज आखिर सोलर पैनल पर क्यों उगा? कहने को तो पढ़ाई विदेश की है, लेकिन साहब की असली क्लास राजधानी के सियासी मैदान में खेली जा रही है। किताबें सोलर एनर्जी की हैं, लेकिन नोट्स सत्ता की संभावनाओं पर तैयार होने की कानाफूसी है। आनंदम की बैठकों और पुरानी सत्ता की वापसी के ब्लूप्रिंट की चर्चा भी कम नहीं है।
मौजूदा दौर में जिस डाल पर बैठने की जगह नहीं मिली, उसकी छांव में भविष्य का आशियाना तलाशने की तैयारी बताई जा रही है और विषय भी खूब चुना गया सोलर एनर्जी। कहीं ऐसा तो नहीं कि कल सत्ता का सूरज बदले और यही पढ़ाई किसी महत्वपूर्ण विभाग या मुख्यमंत्री के सलाहकार की भूमिका का विजिटिंग कार्ड बन जाए? व्यंग्य यही है कि पुलिसिंग की फाइल से निकले साहब अब सूरज की फाइल पढ़ रहे हैं। विदेश में पढ़ाई की मंजूरी लेकर राजधानी में सियासी समीकरणों की पढ़ाई भी साथ-साथ चल रही है। कहीं सोलर एनर्जी की पढ़ाई भविष्य में राज्य की सोलर राजनीति की बैटरी चार्ज करने के लिए तो नहीं हो रही? फिलहाल शेख चिल्ली का पाठ्यक्रम बड़ा दिलचस्प है आज Study Leave, राजधानी में सियासी प्रयोग, कल सत्ता का सूरज बदला तो नई भूमिका की उम्मीद आखिर साहब सोलर एनर्जी पढ़ रहे हैं… और राजनीति में सबसे कीमती चीज़ वही तो है कि सूरज किस तरफ उगेगा!
चवन्नी भाइयों का रेट कार्ड
छत्तीसगढ़ के सुशासन में इन दिनों रिश्तों, प्रतिशतों और कुर्सियों का बड़ा दिलचस्प बाजार चल रहा है। कहीं 3 परसेंट की शिकायत मुख्यमंत्री सचिवालय तक पहुंचती है, पत्र वायरल होता है और उसके पीछे-पीछे खंडन भी आ जाता है। अब वही प्रतिशत 3 से बढ़कर 5 प्रतिशत तक पहुंच गया है इधर कहानी का दूसरा अध्याय भी कम दिलचस्प नहीं है, कहीं प्रतिशत बढ़ रहा है, तो कहीं रिटायरमेंट के बाद भी कुर्सी साहब को छोड़ने से इनकार कर रही है। पहले बड़े चवन्नी भाई जिनका मंडी सचिव से शुरू हुआ सफर प्रमोशन दर प्रमोशन आगे बढ़ा और साहब मंडी बोर्ड की एमडी वाली कुर्सी तक पहुंच गए। फिर आया रिटायरमेंट आम आदमी के लिए इसका मतलब फेयरवेल और घर वापसी होता है, लेकिन चवन्नी साहब की सर्विस बुक बंद हुई और उसी कुर्सी पर संविदा का नया अध्याय खुल गया। अब कर्मचारी नियुक्ति, पदोन्नति और कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं एमडी की कुर्सी की असली योग्यता अनुभव है या सही चवन्नी का भाई होना? उधर छोटे चवन्नी भाई CREDA की कुर्सी संभाल रहे हैं। भारी आवाज़, लंबी दाढ़ी और योजनाओं के प्रेजेंटेशन वाले साहब के पास चुनाव जीतने का रिकॉर्ड भले न हो, मगर संगठन में सही प्लग लग जाए तो ऊर्जा की कुर्सी तक करंट पहुंच ही जाता है। याद कीजिए वह 3 प्रतिशत वाला कमीशन शिकायत हुई, मुख्यमंत्री सचिवालय सक्रिय हुआ, पत्र वायरल हुआ और फिर खंडन भी आ गया। एक भाई के पास सोलर एनर्जी की कुर्सी है, तो दूसरे के पास रिटायरमेंट के बाद भी संविदा की रिन्यूएबल एनर्जी, एक तरफ प्रतिशत का करंट लग रहा तो दूसरी तरफ कुर्सी में फेविकोल कोल लग गया। वैसे वह पुराना 3 प्रतिशत वाला सवाल आज भी बाकी है अगर इतनी छोटी शिकायत पर मुख्यमंत्री सचिवालय की स्याही इतनी तेजी से चल सकती है कि पत्र और खंडन दोनों वायरल हो जाएं, तो बाकी बड़े प्रतिशतों पर वही स्याही सूख क्यों जाती है? सुशासन का गणित भी बड़ा दिलचस्प है एक चवन्नी को ऊर्जा की कुर्सी, दूसरी चवन्नी को रिटायरमेंट के बाद भी एमडी की कुर्सी अब जनता यही समझने की कोशिश कर रही है कि यह योग्यता का कम्पाउंड इंटरेस्ट है, पारिवारिक प्रतिभा का बोनस है या सत्ता की मंडी में चवन्नी का भाव क्योंकि यहां 3 प्रतिशत की फाइल वायरल हो सकती है, 40 प्रतिशत की चुप्पी कायम रह सकती है और सही चवन्नी हो तो रिटायरमेंट के बाद भी कुर्सी का मीटर चलता रहता है।
कुर्सी का सुशासन –
छत्तीसगढ़ के सुशासन में इन दिनों कुर्सियों का गणित बड़ा दिलचस्प है। इधर अधिकारी पदोन्नति का इंतजार कर रहे हैं, उधर रिटायर साहब संविदा पर महत्वपूर्ण कुर्सियों में वापसी कर रहे हैं और जिनके पास पहले से एक कुर्सी है, उनके पास अतिरिक्त प्रभारों की ऐसी कतार है कि लगता है अफसर कम नहीं, कुर्सियों का बंटवारा सुविधानुसार हो रहा है। मंडी बोर्ड वाला मामला हम पहले लिख चुके हैं। उसे छोड़ भी दें तो संविदा की गाड़ी NRDA में हरिओम शर्मा से लेकर विधानसभा तक दौड़ती दिखाई देती है। कहीं रिटायरमेंट के बाद संविदा पर महत्वपूर्ण तकनीकी कुर्सी है, तो कहीं विधानसभा तक संविदा व्यवस्था अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है। इधर नियमित अधिकारी प्रमोशन की सूची देखते रहें और उधर रिटायर साहब संविदा की सूची सुशासन में दोनों के लिए अलग-अलग लाइनें चल रही हैं और जिन्हें संविदा की कुर्सी नहीं मिली, उनके लिए अतिरिक्त प्रभार का मॉडल है। CGRRDA के CEO का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे साहब का मूल विभाग बदलकर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग का सचिव बना दिया गया, लेकिन CEO की कुर्सी का अतिरिक्त प्रभार जस का तस रहा। यानी नई कुर्सी मिल गई, पुरानी भी नहीं गई। मजेदार यह कि खुद अतिरिक्त प्रभार वाले CEO साहब दूसरे अधिकारियों को भी अतिरिक्त प्रभार बांट रहे हैं उधर के.के. कटारे के पास प्रमुख अभियंता के साथ PMGSY, निर्माण, संधारण, MMGSY, RCTRC, RRNMU, सेतु, स्थापना और टेंडर सेल जैसी जिम्मेदारियों का पूरा गुलदस्ता है। एक साहब और इतने प्रभार कि बाकी अधिकारी शायद प्रमोशन की सूची आने तक जिम्मेदारियों की गिनती ही करते रह जाएं। यानी सुशासन के तीन मॉडल साफ हैं नौकरी में हैं तो प्रमोशन का इंतजार कीजिए। रिटायर हो गए हैं तो संविदा का इंतजार कीजिए और कुर्सी मिल गई है तो अतिरिक्त प्रभार संभालिए। ढाई साल में DGP से लेकर मुख्य सचिव तक महत्वपूर्ण पदों पर अतिरिक्त प्रभार का दौर भी चल चुका है। अब सवाल अगले ढाई साल का है क्या संविदा और अतिरिक्त प्रभार का यह पहिया ऐसे ही घूमता रहेगा या कभी नीचे बैठे अधिकारियों की पदोन्नति की फाइल भी चलेगी? सबसे दिलचस्प बात यह है कि सुशासन का दावा करने वाले बाबू साहब के घोषणा पत्र में संविदा व्यवस्था समाप्त करने का वादा भी था। ढाई साल बीत गए। शायद बाबू साहब घोषणा पत्र भूल गए हों। लेकिन अभी ढाई साल बाकी हैं। सरकार घोषणा पत्र भूल सकती है, फाइलें प्रमोशन भूल सकती हैं, कुर्सियां रिटायरमेंट भूल सकती हैं लेकिन चुनाव के समय जनता पुराने वादे याद दिलाना नहीं भूलती। अब देखना यह है कि अगले ढाई साल में संविदा का पहिया रुकेगा, अतिरिक्त प्रभारों का बोझ बंटेगा और प्रमोशन की लाइन आगे बढ़ेगी… या फिर जनता ही सुशासन वाले बाबू साहब को उनका घोषणा पत्र खोलकर पढ़ाएगी।
अफ़सरों को दिखने लगा अगला मौसम –
ढाई साल बीतते-बीतते छत्तीसगढ़ की अफसरशाही को शायद चुनाव आयोग से पहले ही अगला राजनीतिक मौसम दिखाई देने लगा है। कोई बोरिया-बिस्तर समेट रहा है, कोई विपक्षी नेताओं से रिश्तों की पुरानी डायरी खोल रहा है और कोई भविष्य की कुर्सी के लिए अभी से जमीन तलाश रहा है। जिन विपक्षी नेताओं के काम पहले फाइलों में दम तोड़ देते थे, उनके कामों में अब अचानक असाधारण रुचि दिखाई देने लगी है। पिछली सरकार के दौर में खास कॉकस का हिस्सा माने जाने वाले चेहरे भी धीरे-धीरे नए समीकरणों में अपनी जगह तलाशते दिख रहे हैं। उधर पुराने गंभीर मामलों की फाइलों की धार कमजोर पड़ने, जांच की गति बदलने और चार्जशीट के वजन हल्के हो रहे है। अदालत में जमानत मिलना न्यायिक प्रक्रिया है, लेकिन अफसरशाही की गलियों में लोग यह जरूर पूछ रहे हैं कि कुछ फाइलों का मौसम अचानक क्यों बदल गया? दुर्ग से लेकर राजधानी तक पोस्टिंग के नए समीकरणों की कानाफूसी है। किसी को भविष्य की कुर्सी दिखाई दे रही है, किसी को पुराने राजनीतिक संबंधों का नवीनीकरण, आईपीएस सूची में भी कई लोग अपने-अपने हिसाब से भविष्य के संकेत पढ़ रहे हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह आहट अफसरों को तो सुनाई देने लगी है, लेकिन सत्ता को शायद अभी तक सुनाई नहीं दे रही। अफसर भविष्य का मौसम पढ़ने लगे हैं और सरकार शायद अभी भी मानकर चल रही है कि आसमान बिल्कुल साफ है। अफसरशाही का नया सिद्धांत शायद यही है सरकार आज की है, लेकिन संपर्क अगली सरकार के लिए भी जरूरी है। ढाई साल अभी बाकी हैं, मगर कुछ अफसरों ने शायद चुनाव का इंतजार करना जरूरी नहीं समझा। वे वर्तमान सरकार की फाइल संभालते-संभालते भविष्य की सरकार का दरवाजा भी खटखटाने लगे हैं। जनता सिर्फ इतना समझना चाहती है यह प्रशासनिक दूरदर्शिता है या कुर्सी बचाने की वह पुरानी कला, जिसमें सरकार बदलने से पहले ही कुछ अफसर अपना रिमोट नए चैनल पर लगा देते हैं… और सत्ता को चैनल बदलने की खबर भी बाद में मिलती है।
अब एआई उस सड़क की निगरानी करेगा, जो चोरी हो गई –
बस्तर नक्सल मुक्त होने की तरफ बढ़ रहा है, लेकिन जाते-जाते नक्सलवाद ने नहीं, सरकारी फाइलों ने एक नया महाघोटाला खोल दिया। बीजापुर में जिन सड़कों को कागजों में पूरा बताया गया, करोड़ों का भुगतान हुआ, उनमें से कुछ सड़कें जमीन पर चोरी हो गईं और 45 करोड़ भुगतान भी हो गया। जनता अभी सड़क ढूंढ ही रही थी कि व्यवस्था ने इसका सटीक समाधान खोज लिया अब एआई सड़कों की निगरानी करेगा! वाह साहब! गड्ढे वाली सड़क की निगरानी एआई कर लेगा, टूटी सड़क की दरार भी पहचान लेगा, लेकिन बीजापुर में तो सवाल सड़कों के अस्तित्व तक पहुंच गया। अब जिस सड़क का पता ही नहीं, एआई उसकी निगरानी करेगा या पहले लोकेशन खोजेगा यह यक्ष प्रश्न है। इस पूरी व्यवस्था की मौजूदा कुर्सी भी कम दिलचस्प नहीं है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के सचिव भीम सिंह हैं और CGRRDA के CEO का अतिरिक्त प्रभार भी उनके पास है। यानी एआई निगरानी का नया सपना और ग्रामीण सड़क एजेंसी की मौजूदा कमान, दोनों का कनेक्शन एक ही प्रशासनिक छत के नीचे है। उधर इंजीनियरिंग व्यवस्था में के.के. कटारे साहब की जिम्मेदारियों की सूची पढ़िए तो लगता है एक अधिकारी नहीं, पूरा विभाग अतिरिक्त प्रभार में चल रहा है। प्रमुख अभियंता के साथ PMGSY, निर्माण, संधारण, सेतु और दूसरी अहम शाखाओं की जिम्मेदारियां। इतने विभागों के बीच साहब सड़क देखें या फाइलों में सड़क खोजें? यहीं से असली व्यंग्य शुरू होता है। पहले सड़क इंजीनियर ने देखी, फिर अधिकारी ने देखी, फिर फाइल ने सड़क को पूरा देखा, फिर भुगतान हो गया, और बाद में जमीन ने पूछा “साहब, सड़क कहां है?” जवाब आया “एआई देखेगा!” सवाल यह नहीं कि एआई कितना बुद्धिमान है। सवाल यह है कि इतने वर्षों से बुद्धिमान अधिकारियों की निगरानी में जो सड़कें कागज से जमीन तक पहुंचने पर सवालों के घेरे में आ गईं, अब उनकी निगरानी मशीन करेगी। बस एआई को इतना जरूर सिखा दीजिए कि वह वीडियो में केवल गड्ढे और दरार न देखे। कभी सरकारी रिकॉर्ड भी पढ़ ले और पूछे “कार्य पूर्ण किसने लिखा था?” बस्तर की कहानी अब बदल रही है। पहले खबर आती थी कि जंगलों में रास्ते नहीं हैं। अब विकास के रास्तों पर सवाल यह है कि रास्ता बना था, कागज पर बना था या भुगतान के बाद कहीं और निकल गया? और व्यवस्था का जवाब देखिए पहले सड़क खोजो, फिर एआई से उसकी निगरानी कराओ! सड़क में गड्ढा होना प्रशासन की समस्या है, लेकिन सड़क ही चोरी हो जाए और जवाब में एआई निगरानी का मॉडल पेश कर दिया जाए, तो इसे तकनीकी क्रांति नहीं सरकारी व्यंग्य का सबसे आधुनिक संस्करण कहते हैं। अब देखना बस इतना है कि एआई सड़क खोजता है या सड़क बनाने और देखने वालों की जिम्मेदारी भी।
चालान की राजधानी, जाम की सरकार –
रायपुर में इन दिनों ट्रैफिक व्यवस्था का नया मॉडल चल रहा है जनता फंसे तो जाम, नियम तोड़े तो चालान और व्यवस्था बिगड़े तो फाइल, राजधानी में अब कहीं जाना हो तो सिर्फ समय देखकर नहीं, जाम का मुहूर्त देखकर निकलना पड़ता है। अस्पताल जाना हो, स्टेशन पहुंचना हो या कोई जरूरी काम हो, दो-चार घंटे पहले निकल जाइए। जाम में फंस गए तो समय का नहीं, किस्मत का भरोसा है कि कब निकलेंगे और जाम का असली मजा तब शुरू होता है, जब दूर से सायरन की आवाज आने लगे। फिर सड़क जनता की नहीं रहती। ट्रैफिक रुकता है, लोग लाइन में खड़े रहते हैं और सायरन बजाता काफिला निकल जाता है। कभी मुख्यमंत्री, कभी मंत्री, कभी विधायक और अगर सड़क बच गई तो कोई साहब भी सायरन के सहारे निकल जाते हैं। जनता रेड सिग्नल पर खड़ी रहे, साहब ग्रीन कॉरिडोर में निकल जाएं। शायद रायपुर में ट्रैफिक नियमों का पालन भी पद देखकर तय होता है। इधर राजधानी का ITMS करीब 8 करोड़ रुपए के भुगतान के इंतजार में बीमार पड़ा है। 25 चौराहों के 83 कैमरे, 20 नंबर प्लेट पहचानने वाले कैमरे और जरूरी उपकरण बंद हैं। जिन डिजिटल आंखों से राजधानी को देखना था, वे भुगतान की फाइल में आंखें बंद किए बैठी हैं। लेकिन जनता की जेब देखने वाली आंखें बिल्कुल स्वस्थ हैं। सिर्फ जनवरी से मार्च 2026 के बीच रायपुर की जनता से ट्रैफिक नियमों के नाम पर करीब 5 करोड़ 64 लाख रुपए वसूले गए। तीन महीने में साढ़े पांच करोड़! यानी चालान मशीन को न फंड की कमी है, न फाइल का बुखार। जनता जाम में फंसी रहे, सड़कें हांफती रहें, लेकिन हेलमेट का स्ट्रैप ढीला हुआ तो सिस्टम तुरंत स्मार्ट हो जाता है। रायपुर में सड़क संभालने की जिम्मेदारी भगवान भरोसे है और चालान काटने की जिम्मेदारी सिस्टम भरोसे, मामला सिर्फ जाम तक सीमित नहीं है। पुलिस आयुक्त कार्यालय के आंकड़े बताते हैं कि 23 जनवरी से 23 अगस्त 2026 तक रायपुर कमिश्नरेट क्षेत्र में 26 हत्याएं दर्ज हुईं। चालान काटने में सिस्टम को एक सेकंड की देरी नहीं होती नंबर प्लेट दिखी, नियम टूटा और कार्रवाई शुरू। लेकिन अपराध के बाद जिन कैमरों को राजधानी की आंखें होना था, वे भुगतान की फाइल में बंद पड़े हैं। कैमरा हर अपराध नहीं रोक सकता, लेकिन अपराधी का चेहरा, वाहन और भागने का रास्ता जरूर बता सकता है। विडंबना देखिए चालान के लिए सिस्टम की आंखें तुरंत खुल जाती हैं, लेकिन राजधानी की सुरक्षा की बारी आते ही कैमरे फाइल में सो जाते हैं। इधर 26 हत्याओं का आंकड़ा, उधर बंद निगरानी कैमरे और डिजिटल आंखों का बिल भरने के लिए 8 करोड़ की फाइल अटकी है, जबकि जनता से करोड़ों का चालान वसूला जा रहा है। वाह रे स्मार्ट सिस्टम! जनता का नंबर प्लेट पढ़ने में सेकंड, चालान भेजने में मिनट, पैसा वसूलने में कोई देरी नहीं लेकिन राजधानी की आंखें चलाने में करोड़ों की गरीबी! कमिश्नर सिस्टम में राजधानी को सुरक्षित होना था, सड़कें स्मार्ट होनी थीं और जाम कम होना था। लेकिन यहां सबसे ज्यादा स्मार्ट केवल चालान निकला। बाकी जनता जाम में खड़ी है, कैमरे फाइल में बंद हैं, और व्यवस्था अब भी रेड सिग्नल पर।
यक्ष प्रश्न –
1 – छत्तीसगढ़ के कौन-कौन से सीनियर IAS और IPS अफसर हैं, जो पुराने मुखिया से संबंध बनाने की जुगत में हैं या पहले ही संबंध बना चुके हैं?
2 – क्या पंजाब से असम ट्रांसफर भूपेश बघेल की राजनीति की अंतिम यात्रा की शुरुआत है?
3 – क्या भूपेश बघेल का राजनीतिक अवसान, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के नए आगमन की आहट है?










