जीपीएम स्वास्थ्य घोटाला पार्ट – 2 लेब टेक्नीशियन-मंत्री गठजोड़ से हिलता स्वास्थ्य महकमा! कलेक्टर-सचिव तक की भूमिका पर सवाल

जीपीएम स्वास्थ्य घोटाला पार्ट – 2 लेब टेक्नीशियन-मंत्री गठजोड़ से हिलता स्वास्थ्य महकमा! कलेक्टर-सचिव तक की भूमिका पर सवाल
रायपुर/जीपीएम : – गौरेला–पेण्ड्रा–मरवाही (जीपीएम) जिला स्वास्थ्य विभाग में करोड़ों का घोटाला उजागर होने के बाद भी कार्रवाई की फाइलें ठंडी पड़ी हैं। निचले कर्मचारियों पर औपचारिक नोटिस चस्पा कर खानापूर्ति की जा रही है, मगर इस पूरे खेल के मास्टरमाइंड लेब टेक्नीशियन और तीन–तीन सीएमएचओ पर गाज गिराने की हिम्मत किसी ने नहीं दिखाई। उल्टा यह रसूखदार टेक्नीशियन आज भी वही जमे हुए हैं और मंत्री जी तक सीधा पहुँच बना कर बैठे हैं।

कबाड़ से भरा अस्पताल, करोड़ों का बिल!
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के नाम पर जीपीएम में करोड़ों की खरीदी हुई। लेकिन BP और शुगर मशीन कागज़ी कंपनियों से खरीदी गईं। CMHO दफ्तर में लगी AC पुरानी कोविड अस्पताल से निकाल कर लगाई गई, लेकिन बिल नए ब्रांडेड AC का बना। घटिया आलमारी-कूलर तक बाज़ार भाव से कई गुना महंगे दाम पर खरीदे गए। जनता इलाज के लिए लाइन में, लेकिन अस्पताल खुद बीमार हो चुका है और ये खेल करने वाले मालामाल हो रहे हैं।

तबादला घोटाला आदेश मंत्रालय से, फैसला जिले में : –
ट्रांसफर आदेश मंत्रालय से जारी होते हैं, मगर जमीन पर सेटिंग और चढ़ावे ही फैसला करते हैं। ग्रामीण चिकित्सा अधिकारी इम्तियाज मंसूरी का ट्रांसफर जशपुर हुआ, लेकिन कलेक्टर सीएमएचओ की सेटिंग से वे आज भी जीपीएम में हैं। वही दर्जनों अफसर और कर्मचारी ट्रांसफर आदेश के बावजूद पैसा देकर कुर्सी पकड़े बैठे हैं।

सीएमएचओ कार्रवाई की जगह पुरस्कृत!
तत्कालीन सीएमएचओ नागेश्वर राव को महासमुंद जैसे बड़े जिले की जिम्मेदारी सौंप दी गई। प्रभात चंद्र प्रभाकर, जिन पर पुराने विवादों के दाग हैं, उन्हें मुंगेली भेज दिया गया।
देवेंद्र पैकरा आज भी जीपीएम में सिविल सर्जन बने बैठे हैं। यानी जिसने घोटाला किया, उसे और बड़ी कुर्सी का इनाम मिला।

मंत्री-टेक्नीशियन गठजोड़ : –
विभागीय अफसर बताते हैं मंत्री जी सीधे न कलेक्टर से बात करते हैं, न सीएमएचओ से। सीधा फोन लेब टेक्नीशियन को जाता है और कई बार उसे घर भी बुला लिया जाता है। यही कारण है कि जांच रिपोर्ट में नाम दर्ज होने के बाद भी टेक्नीशियन पर निलंबन की हिम्मत कोई अफसर नहीं जुटा पाया। सवाल उठता है क्या यह मंत्री का वरदहस्त नहीं तो और क्या है?
कलेक्टर सचिव संचालक सब खामोश : –
कलेक्टर कहते हैं, हमने तो फाइल ऊपर भेज दी। यानी गेंद ऊपर है। स्वास्थ्य संचालक रायपुर को कई बार पत्राचार किया गया, लेकिन जवाब फाइल दबाने वाला आया। स्वास्थ्य सचिव को पूरे मामले की जानकारी दी गई, फिर भी खामोशी की चादर ओढ़ी गई। जब जिलों में लूट हो और सचिवालय में चुप्पी, तो साफ है कि ऊपर तक संरक्षण है।
सिस्टम बीमार, अफसर मालामाल
जिस अस्पताल में गरीब इलाज के लिए जाता है, वह खुद बीमार कर दिया गया है। डॉक्टर की कमी, दवा की किल्लत और उपकरण फर्जी, लेकिन फाइलों में सब ऑल वेल दिखाया जाता है। स्थानीय लोग पूछ रहे हैं जब मंत्री -टेक्नीशियन गठजोड़ से लेकर सचिव तक फाइल दबा रहे हैं, तो आखिर जनता किससे न्याय मांगे?
अब जरूरी क्या है?
1. लेब टेक्नीशियन का तत्काल निलंबन और आपराधिक जांच।
2. तीनों सीएमएचओ पर विभागीय व आपराधिक कार्रवाई।
3. स्वास्थ्य सचिव और संचालक से पूछताछ कि क्यों फाइलें दबाईं गईं।
4. मंत्री की भूमिका और उनके टेक्नीशियन से सीधे रिश्ते की जांच।
5. मामले को ACB/EOW की मॉनिटरिंग में सौंपना।
जीपीएम का यह मामला अब सिर्फ एक जिला घोटाला नहीं रहा। यह मंत्री-अफसर-टेक्नीशियन गठजोड़ की कहानी है, जिसने अस्पतालों को बीमार और अफसरों को मालामाल कर दिया है। अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह घोटाला पूरे स्वास्थ्य महकमे की सबसे काली गाथा साबित होगा।
जारी रहेगा –










