जशपुर में ‘जनसंपर्क’ का नया कानून खबर लिखी तो ‘अपराधी’, सवाल पूछा तो 1 करोड़ का नोटिस!
पत्रकार ऋषिकेश मिश्रा ने घरघोड़ा न्यायालय में परिवाद दायर किया, आरोप सरकारी व्हाट्सएप ग्रुप में ‘अपराधी’ बताकर बदनाम किया गया मानहानि नोटिस, प्रशासनिक चुप्पी और अदालत की शरण मामला अब न्यायिक जांच की देहरी पर

जशपुर में ‘जनसंपर्क’ का नया कानून खबर लिखी तो ‘अपराधी’, सवाल पूछा तो 1 करोड़ का नोटिस!
पत्रकार ऋषिकेश मिश्रा ने घरघोड़ा न्यायालय में परिवाद दायर किया, आरोप सरकारी व्हाट्सएप ग्रुप में ‘अपराधी’ बताकर बदनाम किया गया मानहानि नोटिस, प्रशासनिक चुप्पी और अदालत की शरण मामला अब न्यायिक जांच की देहरी पर
रायपुर/जशपुर/घरघोड़ा : – छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में जनसंपर्क विभाग से जुड़ा एक मामला अब “प्रेस की स्वतंत्रता बनाम सरकारी पद के दुरुपयोग” की बहस का केंद्र बन गया है। पत्रकार ऋषिकेश मिश्रा ने जिला जनसंपर्क कार्यालय में पदस्थ सहायक संचालक (जनसंपर्क) के खिलाफ घरघोड़ा न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत किया है। परिवाद में आरोप लगाया गया है कि एक खबर प्रकाशित होने के बाद संबंधित अधिकारी ने कानूनी प्रक्रिया का इंतजार किए बिना सरकारी व्हाट्सएप ग्रुप में पत्रकार को ‘अपराधी’ के रूप में प्रस्तुत किया, जिससे उनकी सामाजिक व पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा। इसके बाद कथित तौर पर पत्रकार को 1 करोड़ रुपये का मानहानि नोटिस भी भेजा गया।

क्या है पूरा विवाद?
जानकारी के अनुसार, मामला जनसंपर्क कार्यालय के एक कर्मचारी रविंद्रनाथ राम से जुड़ा है। आरोप/विवरण यह है कि कर्मचारी ने कथित प्रताड़ना के चलते आत्महत्या की कोशिश की और इस संबंध में शिकायत/प्रकरण सामने आया। इसी घटनाक्रम को लेकर जब खबर प्रकाशित हुई, तो कथित तौर पर विभागीय अधिकारी ने इसे “विभाग की छवि” से जोड़ते हुए पत्रकार पर दबाव बनाने का प्रयास किया।
‘व्हाट्सएप ट्रायल’ का आरोप
परिवाद में कहा गया है कि खबर के बाद जो प्रतिक्रिया सामने आई, वह किसी विभागीय स्पष्टीकरण या तथ्यात्मक खंडन तक सीमित नहीं रही, बल्कि पत्रकार की सार्वजनिक छवि को क्षति पहुंचाने की दिशा में गई। अदालत में दिए गए कथन के मुताबिक, अधिकारी ने एक सरकारी व्हाट्सएप ग्रुप में पत्रकार को “अपराधी” कहकर संबोधित किया। पत्रकार पक्ष का तर्क है कि किसी व्यक्ति को अपराधी ठहराने का अधिकार न्यायालय को है न कि किसी सरकारी पदधारी को।
1 करोड़ का नोटिस ‘छवि’ बचाने का तरीका या दबाव की रणनीति?
इस प्रकरण में विवाद का दूसरा बड़ा बिंदु मानहानि नोटिस है। परिवाद के अनुसार, पत्रकार को 1 करोड़ रुपये का मानहानि नोटिस भेजा गया। पत्रकार पक्ष का कहना है कि यह नोटिस कानून के सामान्य प्रयोग से ज्यादा, डराने और दबाने के उद्देश्य से भेजा गया प्रतीत होता है। स्थानीय पत्रकार संगठनों के बीच यह चर्चा तेज है कि यदि किसी खबर पर जवाब देना हो तो विभाग के पास प्रेस नोट/स्पष्टीकरण/कानूनी नोटिस का रास्ता है, लेकिन सरकारी कुर्सी का प्रभाव जोड़कर निजी बदनामी अभियान चलाना लोकतांत्रिक मर्यादा पर प्रश्न खड़ा करता है।

प्रशासनिक स्तर पर क्या हुआ?
पत्रकार पक्ष का दावा है कि उन्होंने पुलिस अधीक्षक से लेकर उच्च स्तर तक पत्राचार किया, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई। इसके बाद मामला न्यायालय पहुंचा। अब यह विवाद प्रशासनिक गलियारों में भी “संवेदनशील” माना जा रहा है क्योंकि इसमें सरकारी पद, आधिकारिक प्लेटफॉर्म और पत्रकारिता तीनों टकराते दिख रहे हैं। (वरिष्ठ पत्रकार का बयान) वरिष्ठ पत्रकार कुमार जितेन्द्र ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “ऐसे मामलों को टालना खतरनाक है। आज नोटिस है, कल षड्यंत्र भी हो सकता है। यह सिर्फ एक पत्रकार का मुद्दा नहीं, पूरे पत्रकार समाज के सम्मान और अधिकार का सवाल है।”
सवाल उठता है कि सरकारी व्हाट्सएप ग्रुप में किसी नागरिक/पत्रकार को “अपराधी” कहने का अधिकार किसे है? अगर खबर गलत थी, तो विभागीय स्तर पर आधिकारिक खंडन क्यों नहीं आया? मानहानि नोटिस का आधार क्या था और क्या ये धमकी/दबाव की श्रेणी में आता है? कर्मचारी प्रकरण की जांच/कार्रवाई कहाँ तक पहुंची? क्या राज्य सरकार जनसंपर्क विभाग के लिए मीडिया व्यवहार SOP जारी करेगी? लोकतंत्र में जनसंपर्क का काम “छवि बचाना” नहीं सच और संवाद बचाना होता है। यदि अफसरशाही WhatsApp को अदालत बना देगी, तो फिर अदालत सिर्फ तारीख देने के लिए रह जाएगी। और याद रहे कलम पर नोटिस नहीं, जवाब होना चाहिए।










