IPS डांगी बोले- मेरी शिकायत नस्तीबद्ध करो… फिर उन्हीं पर क्यों लगी 5 आरोपों की चार्जशीट? हाईकोर्ट की सख्ती के बाद आरोप-पत्र जारी, पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल –

रायपुर – आईपीएस रतन लाल डांगी के खिलाफ चल रही विभागीय कार्रवाई में अब एक महत्वपूर्ण दस्तावेज सामने आया है। छत्तीसगढ़ शासन के गृह (पुलिस) विभाग ने डांगी के खिलाफ पांच आरोपों वाला विभागीय आरोप-पत्र जारी कर दिया है। लेकिन इस पूरे मामले में आरोप-पत्र से ज्यादा बड़ा सवाल पुलिस और विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया को लेकर खड़ा हो रहा है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि मामला विभागीय स्तर पर आगे बढ़ने के बजाय हाईकोर्ट तक पहुंचा और अदालत की सख्ती के बाद आरोप-पत्र जारी करने की कार्रवाई सामने आई।
मामले से जुड़े दस्तावेज बताते हैं कि डांगी ने 16 अक्टूबर 2025 को पुलिस महानिदेशक, छत्तीसगढ़ को अपनी शिकायत दी थी। इसके बाद 12 जनवरी 2026 को डांगी की ओर से आवेदन प्रस्तुत कर अपनी शिकायत पर आगे कोई कार्रवाई नहीं चाहने और उसे नस्तीबद्ध करने का अनुरोध किया गया। इसके बाद असली सवाल विभाग की कार्यप्रणाली पर खड़ा होता है। अगर शिकायतकर्ता अधिकारी ने अपनी शिकायत आगे नहीं बढ़ाई, तो विभाग के पास पूरे मामले की जांच और कार्रवाई को लेकर क्या स्थिति थी और यदि दूसरी शिकायत के आधार पर विभागीय कार्रवाई जरूरी थी, तो उसे समय पर पूरा क्यों नहीं किया गया? मामला हाईकोर्ट तक पहुंचने की नौबत क्यों आई।
डांगी के खिलाफ 5 आरोपों वाली चार्जशीट
छत्तीसगढ़ शासन के गृह (पुलिस) विभाग की ओर से जारी आरोप-पत्र में रतन लाल डांगी के खिलाफ कुल पांच आरोप दर्ज हैं।
1. पहला आरोप – वर्ष 2017 से 2025 के बीच शिकायतकर्ता महिला के साथ कथित अनैतिक एवं अशोभनीय कृत्य करने, उनके पति को नुकसान पहुंचाने का भय दिखाने, मानसिक दबाव बनाने, पद के प्रभाव का इस्तेमाल करने तथा अपेक्षित नैतिक आचरण का पालन नहीं करने की बात कही गई है।
2. दूसरा आरोप – शिकायतकर्ता महिला के पति, उप निरीक्षक ओमप्रकाश कुर्रे के खिलाफ एप्पल आईफोन की मांग करने तथा पदस्थापना के लिए शिकायतकर्ता पर दबाव बनाने संबंधी आरोप लगाए गए हैं।
3. तीसरा आरोप – शिकायतकर्ता महिला को कथित तौर पर बार-बार मानसिक एवं शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने तथा स्वयं को चोट पहुंचाने के लिए दबाव बनाने का उल्लेख है। आरोप-पत्र में कहा गया है कि इसके परिणामस्वरूप शिकायतकर्ता द्वारा स्वयं को चोट पहुंचाई गई।
4. चौथा आरोप – शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए भयादोहन के आरोप का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि लंबे समय तक भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी के पद पर रहते हुए डांगी ने अपने पद के अनुरूप कर्तव्यों का निर्वहन पूरी सत्यनिष्ठा एवं कर्तव्यपरायणता से नहीं किया और कथित रूप से अशोभनीय आचरण प्रदर्शित किया।
5. पांचवां आरोप – कहा गया है कि डांगी के कथित अशोभनीय आचरण के कारण शिकायतकर्ता को इलेक्ट्रॉनिक सोशल मीडिया पर डांगी के विरुद्ध समाचार प्रकाशित एवं प्रचारित करने का अवसर मिला, जिसके परिणामस्वरूप सामान्य जनमानस एवं समाज में पुलिस विभाग की छवि धूमिल हुई। आरोप-पत्र में इन आरोपों को अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियम, 1968 के विभिन्न प्रावधानों के उल्लंघन से जोड़ा गया है।
स्क्रीनशॉट, वीडियो कॉल और चैट भी जांच का हिस्सा –
विभागीय जांच से जुड़े दस्तावेजों में स्क्रीनशॉट, वीडियो कॉल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामग्री का भी उल्लेख है। अलग-अलग पृष्ठों पर वीडियो कॉल, स्क्रीनशॉट और बातचीत से जुड़े फोटो को घटनाक्रम के समर्थन में प्रस्तुत सामग्री के रूप में दर्ज किया गया है। एक दस्तावेज में कपड़े, सूट, ज्वेलरी और पैसों के लेन-देन से संबंधित चैटिंग का भी उल्लेख है। हालांकि दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि बातचीत का विषय पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो रहा है।
मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा, फिर आई कार्रवाई में तेजी –
इस पूरे प्रकरण का सबसे अहम पहलू यही है कि विभागीय कार्रवाई की स्थिति को लेकर मामला हाईकोर्ट पहुंचा। अदालत ने सरकार और पुलिस मुख्यालय से जवाब मांगा। बाद की सुनवाई में जवाब और कार्रवाई को लेकर अदालत ने सख्ती भी दिखाई। अब इसी बीच गृह विभाग का विभागीय आरोप-पत्र सामने आ गया है। यानी जिस मामले में विभागीय कार्रवाई की प्रगति को लेकर अदालत में सवाल उठ रहे थे, उसमें अब औपचारिक आरोप-पत्र जारी हो चुका है। सवाल यह नहीं है कि डांगी ने अपनी शिकायत वापस क्यों ली। सवाल यह है कि विभाग के स्तर पर कार्रवाई की स्थिति क्या थी और मामला हाईकोर्ट तक पहुंचने के बाद ही विभागीय प्रक्रिया में निर्णायक तेजी क्यों दिखाई दी?
17 सितंबर को जांच अधिकारी की प्रक्रिया भी आगे बढ़ी –
मामले से जुड़े दस्तावेज के मुताबिक 17 सितंबर 2026 को पुलिस मुख्यालय की ओर से गृह विभाग को पत्र भेजा गया। इसमें रतन लाल डांगी के खिलाफ विभागीय जांच के लिए डीआईजी दीपांशु काबरा को जांच अधिकारी तथा प्रशांत कुमार अग्रवाल को प्रस्तुतकर्ता अधिकारी बनाए जाने का प्रस्ताव भेजा गया था। इससे संकेत मिलता है कि विभागीय कार्रवाई अब प्रारंभिक स्तर से आगे बढ़कर औपचारिक अनुशासनात्मक जांच की दिशा में पहुंच चुकी है।
अब सवाल डांगी से ज्यादा पुलिस की प्रक्रिया पर –
डांगी ने अपनी शिकायत नस्तीबद्ध करने का अनुरोध किया था यह उनका अपना निर्णय था। लेकिन सवाल यह है कि विभाग ने पूरे प्रकरण में क्या किया? यदि मामला कार्रवाई योग्य था तो समय पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यदि विभागीय जांच जरूरी थी तो उसकी प्रक्रिया पहले क्यों पूरी नहीं हुई? और यदि कार्रवाई चल रही थी तो संबंधित अधिकारी को हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की जरूरत क्यों पड़ी?
सबसे अहम सवाल यही है कि क्या विभागीय कार्रवाई अदालत की सख्ती के बाद तेज हुई? अब आरोप-पत्र जारी हो चुका है और औपचारिक विभागीय जांच का रास्ता खुल गया है। ऐसे में इस पूरे मामले में शिकायत, जांच, हाईकोर्ट की कार्यवाही और आरोप-पत्र जारी होने तक की पूरी टाइमलाइन भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।
फिलहाल आरोप-पत्र में लगाए गए सभी आरोप विभागीय आरोप हैं, अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य नहीं। इन पर विभागीय जांच पूरी होने के बाद ही अंतिम निष्कर्ष सामने आएगा।










