अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)
विशाल-विजय का संगीत, कैप्टन का कोयला और ग्रीन भूमि, देवों के नंद का दुख…मुनीम का राज, नोटों का काफिला, विचारों का दफ्तर, शराब का खेल और कातिल कई, मगर सबूत नहीं! सत्ता और सिस्टम के सात किस्से

विजय, विशाल और बीच का संगीत
राजधानी से सटे पश्चिम का एक जिला इन दिनों विकास से ज्यादा विजय, विशाल और उनके बीच बज रहे संगीत को लेकर चर्चा में है। कभी इस संगीत की धुन विशाल के इशारे पर बजती थी, लेकिन वक्त बदला तो सुर विजय के साथ मिलने लगे। बस, यही बात विशाल हृदय को नागवार गुजर गई और दोनों के बीच सुरों का संघर्ष शुरू हो गया। चर्चा है कि संगीत की धुन इतनी तेज हुई कि एक दिन विजय और संगीत को मैडम हाईकमान की नजरों ने भी पकड़ लिया। इसके बाद संगीत की फनकारी कुछ मंद जरूर पड़ गई, लेकिन विशाल का मन नहीं माना। जिस धुन पर कभी उनका एकाधिकार था, वह अब किसी और की महफिल में बजने लगी थी। लिहाजा विजय को पराजय का स्वाद चखाने की तैयारी शुरू हो गई। कहते हैं, इस सुर-ताल का शोर चारदीवारी से निकलकर राजधानी तक पहुंचा। सुरों का शोर घर की चौखट तक पहुंचा तो भीतर भी ऐसी हलचल मची कि संगीत की लय ही बिगड़ गई। जूतमपैजार तक की चर्चाएं गलियारों में तैरने लगीं। उधर विशाल का दंडकारण्य तबादला हुआ, मगर वहां जाने के बजाय पश्चिम के जिले का मोह छूटता ही नहीं। संगीत की धुन बार-बार उन्हें वापस खींच लाती है। अब सवाल यह है कि इस संगीत समारोह में आखिर किसका सुर सधेगा और किसकी धुन बंद होगी? फिलहाल जिले में विकास की फाइलें अपनी जगह हैं, लेकिन विजय की विजय, विशाल की विशालता और बीच के संगीत की जुगलबंदी पूरे जिले में सबसे ज्यादा सुनी जा रही है। लगता है, जिले में प्रशासनिक कामकाज से ज्यादा इन दिनों सुरों की साधना चल रही है। अब देखना है कि इस महफिल का आखिरी राग कौन छेड़ता है और किसके हिस्से खामोशी आती है!
कोयले का चक्रव्यूह –
90 के दशक की बात है। जब बॉलीवुड में किस्मत आजमाने के लिए लोग मुंबई और दिल्ली की राह पकड़ रहे थे, तब दिल्ली से सटे एक राज्य के कैप्टन साहब की नजर तब के मध्यप्रदेश की औद्योगिक नगरी के ब्लैक डायमंड पर पड़ गई। उस वक्त पटवा सरकार थी। शुरुआत चार-पांच ट्रकों से हुई, फिर SECL में दखल बढ़ा और कोल वाशरी का कारोबार शुरू हो गया। देखते ही देखते चार-पांच ट्रकों का काफिला हजारों गाड़ियों तक पहुंच गया। छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना तो कारोबार ने भी नई उड़ान भरी। कोयले के काले कारोबार पर विरोध के स्वर उठे तो ग्रीन भूमि की हरियाली का ऐसा आवरण तैयार हुआ कि कारोबार का दायरा मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ और दिल्ली तक फैलता चला गया। धीरे-धीरे आर्यन और गरुण का साम्राज्य भी बढ़ता गया। SECL के कामकाज से लेकर निजी सुरक्षा गार्डों की तैनाती और सुरक्षा मानकों में दखल बढ़ने लगी। वाशरी में रिजेक्ट कोल के नाम पर करोड़ों-अरबों के खेल होने लगे। आवक-जावक के हिसाब में गड़बड़ी होने लगी। आखिर यह रिजेक्ट कोल जाता कहां है? महाभारत में अभिमन्यु चक्रव्यूह में प्रवेश करना तो जानता था, लेकिन उससे बाहर निकलने का रास्ता नहीं जानता था। यहां भी कैप्टन का कोयला कारोबार किसी चक्रव्यूह से कम नहीं। फर्क बस इतना है कि इस चक्रव्यूह में प्रवेश के रास्ते कई हैं, मगर इसके भीतर तक पहुंचना हर किसी के बस की बात नहीं। आखिर इस साम्राज्य को किसका संरक्षण हासिल है? SECL के चक्रव्यूह में कौन-कौन से अफ़सर-ए-आ’ला शामिल हैं? अगली कड़ी में खुलासा होगा कि कोयले के इस चक्रव्यूह में कौन किसकी भूमिका निभा रहा है और रिजेक्ट कोल में कौन-कौन अफसर शामिल हैं। इस काले कारोबार के ग्रीन भूमि के खेल को HD ग्राफिक्स में दिखाएंगे।
रौब से रुसवाई तक, DMF की मलाई
देवों के नंद का भी क्या दौर था! साहब फूल-फ्लेश पावर में थे। पूरा तंत्र उनकी उंगलियों पर नाचता था। पद, पावर और पैसे का ऐसा कॉकटेल कि अच्छे-अच्छे IAS साथी भी सामने बोलने से पहले सोचते थे। साथी अफसर बताते हैं कि रुतबा ऐसा था कि आदमी को आदमी समझना भी जरूरी नहीं समझते थे। कई अफसर लूप लाइन में पहुंचा दिए गए। लेकिन वक्त बदला तो कल तक दूसरों की औकात तय करने वाले साहब आज अपनी पीड़ा सुनाने के लिए दफ्तर-दफ्तर भटक रहे हैं। कुर्सी गई, ताकत गई, मगर तुर्रा आज भी वैसा ही है। साहब की एक बड़ी टीम है, जो प्रचार से लेकर दुष्प्रचार तक का मोर्चा संभालती है। सिस्टम में आज भी अपनी पुरानी छवि तलाशने और हर जगह अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश जारी है। जिस विभाग के सचिव हैं, वहां की व्यवस्थाओं पर भी सवाल हैं, लेकिन साहब का मन विभाग तक सीमित कहां! हर जगह पैर पसारने की जुगत लगी रहती है। अब DMF का हिसाब भी देख लीजिए। कोरबा में कलेक्टर रहते DMF के इस्तेमाल और पारदर्शिता पर सवाल उठे। GPM में बिना समिति की मंजूरी के 160 कामों पर 17.47 करोड़ स्वीकृत हुए, तबादले के बाद 8.32 करोड़ के चेक जारी हुए और 10-3-2 का कमीशन गणित सामने आया। कांकेर में तत्कालीन कलेक्टर नीलेश कुमार क्षीरसागर के तबादले के दो दिन बाद 92 कामों के लिए 23 करोड़ की मंजूरी दी गई। नए कलेक्टर ने ब्रेक लगाया। टीनशेड से लेकर मूल्यांकन तक सवाल उठे और मामला 150 करोड़ के खेल तक पहुंच गया। कोरबा से GPM और कांकेर तक DMF की मलाई का हिसाब कौन देगा? साहब, वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि कल तक जिनके इशारे पर गलियारे चलते थे, आज उन्हीं के दौर के किस्से सुनाए जा रहे हैं। लोग उनके जाने पर तरस नहीं, उस रुतबे का हश्र देखते हैं। फूल-फ्लेश पावर का दौर चला गया, लेकिन DMF की मलाई का हिसाब बाकी है। साहब, रौब से तंत्र को झुकाया जा सकता है, हिसाब से बचा नहीं जा सकता!
मुनीम का राजतिलक, आईफोन का स्वैग!
मुनीम जी का भी क्या जलवा है! पिछली सरकार में राजधानी के गलियारों में ऐसी धाक थी कि बड़े-बड़े साहब भी रास्ता नापते थे। सत्ता बदली तो बस्तर का वनवास मिला, लेकिन राजधानी से मोह कम नहीं हुआ। कहते हैं, शेख चिल्ली और आनंद में रहने वाले साहब जैसे किरदारों की मेहरबानी भी खूब रही। संगठन से लेकर सत्ता के दरवाजों तक पैरवी चली, दिल्ली का रास्ता भी तलाशा गया, लेकिन बीच में सीबीआई की एंट्री ने सारे अरमान ठंडे कर दिए। मुनीम जी का मैनेजमेंट सिर्फ फाइलों तक सीमित नहीं था। आईफोन का स्वैग भी इसी कहानी का चर्चित हिस्सा रहा। किसे नया फोन देकर खुश करना है, किसका काम बनाना है और किसे अपने घेरे में रखना है, राजधानी में इसकी खूब चर्चा रही। कहते हैं, कटा हुआ सेब कई बार बड़े-बड़े दरवाजे खोल देता है। अब नारायणपुर से बालोद की 21वीं वाहिनी में नई तैनाती किस स्वैग और किस आईफोन के दम पर मिली, यह तो वही जानें! महादेव मामले में ED की अभियोजन शिकायत में दर्ज बयान में इस मुनीम को हर महीने 35 लाख रुपये दिए जाने का जिक्र है। साहब न IAS हैं, न IPS, लेकिन औरा किसी से कम नहीं। CBI भी पहले उनके ठिकाने तक पहुंच चुकी है। ऐसे में पुराना मुनीम सिस्टम फिर चर्चा में है। शेख चिल्ली हों या आनंद वाले साहब, सबके अपने-अपने किस्से हैं। लेकिन मुनीम जी का बहीखाता अभी खुलना बाकी है। साहब, आईफोन का स्वैग अपनी जगह, अब पुराने हिसाब का पासवर्ड भी बताइए!
नोटों का काफिला, साहब का साया –
सूबे में नोटों की गड्डियां खूब सफर कर रही हैं। कभी कार के गुप्त चेंबर से, कभी स्कॉर्पियो से तो कभी ट्रैवल्स के दफ्तर से। मार्च 2025 में आमानाका, सितंबर में कुम्हारी से 6.60 करोड़, मई 2026 में हंस ट्रेवल्स से 16 लाख और अब दुर्ग के खुर्सीपार में पिकअप से 4 करोड़ बरामद हुए। कुल हिसाब कम से कम 13.56 करोड़ का है। आमानाका की रकम के आंकड़े में ही 2.80 से 4.50 करोड़ तक का फर्क है। ताजा चार करोड़ की बरामदगी स्मृति ईरानी के रायपुर दौरे के दौरान हुई। पहले चर्चा चली कि रकम उत्तर प्रदेश जा रही थी, फिर मंजिल नागपुर बताई जाने लगी। नागपुर का नाम आते ही लोगों ने अपने-अपने अर्थ निकाल लिए। विचारों के बड़े दफ्तर तक इशारे पहुंच गए, मगर असली सवाल वहीं रह गया नोट किसके थे और किस काम के लिए जा रहे थे? एक कारोबारी ने रकम पर दावा किया, लेकिन स्रोत और लेन-देन की तस्वीर अब भी साफ नहीं है। गलियारों में तो किसी IAS साहब की रकम बाहर जाने की कानाफूसी भी है। साहब कौन, रकम कितनी और असली चालक कौन इसका जवाब अनुत्तरित है। गाड़ी पकड़ में आ गई, नोट गिन लिए गए, मंजिल भी बता दी गई, बस मालिक का नाम बताने में सिस्टम की सुई अटक गई! साहब, नोटों का काफिला तो दिख रहा है, अब उसके पीछे चल रहे साये को भी पकड़िए।
नशा वही, खेल नया –
पिछली सरकार में आबकारी की शराब से उठा घोटाले का धुआं अभी पूरी तरह छंटा नहीं है। अनिल टुटेजा, निरंजन दास और अरुणपति त्रिपाठी जैसे किरदार जांच के घेरे में हैं। उस शराब ने सत्ता का नशा ऐसा उतारा कि सरकार ही बदल गई। अब कुर्सियां बदलीं, चेहरे बदले और आ गए सुशासन बाबू। लगा था, पुराने खेल बंद होंगे, मगर हुजूर, बोतल का ब्रांड बदला है, नशा वही है! इस बार विभाग में दो नए खिलाड़ी चर्चा में हैं एक तिवारी जी, वही बस वाले, जो चुनावी हार के बाद भी मंत्री जी के साये बने रहे। अब बिना किसी आधिकारिक आदेश के PA की भूमिका में हैं। दूसरे नरेंदर बाबू, जिनके बारे में चर्चा है कि मेनपावर कंपनियों और दुकान संचालकों से दो से पांच हजार तक की वसूली का खेल चल रहा है। DEO, ADO और दरोगा की ट्रांसफर-पोस्टिंग में भी इनकी दखल की बातें हैं। यानी विभाग में आदेश किसका चलता है, यह जानने के लिए सरकारी आदेश नहीं, चंगू-मंगू की तरफ देख लीजिए! ऊपर एलमा साहब की छतरी और नीचे दोनों खिलाड़ियों की पारी। चढ़ावे की रकम ऊपर तक पहुंचने और पद्म तक प्रसाद जाने के किस्से भी गलियारों में तैर रहे हैं। सवाल बस इतना है कि सुशासन बाबू को इस दुकान की खबर नहीं या दुकानदार पर्दे के पीछे से ही कारोबार चलाना चाहते हैं? पिछली सरकार में शराब का सिंडिकेट था, अब ट्रांसफर-पोस्टिंग और वसूली की दुकान की चर्चा है। जनता ने सरकार बदली थी, खिलाड़ियों की जर्सी बदलने के लिए नहीं!
कातिल तो कई, मगर सबूतों में कोई नहीं!
पुलिसिया सिस्टम का भी गजब गणित है। बिलासपुर में संजू त्रिपाठी की हत्या हुई। पुलिस ने 22 आरोपी पकड़े, करीब 1500 पन्नों की चार्जशीट बनाई, लेकिन करीब चार साल बाद अदालत ने सभी को दोषमुक्त कर दिया। गोली चली, आदमी मारा गया, आरोपी भी पकड़े गए, मगर अदालत में पुलिस अपनी कहानी साबित नहीं कर पाई। यानी चार्जशीट में कातिलों की फेहरिस्त थी, पर सबूतों की बारी आई तो कहानी लड़खड़ा गई। अब दुर्ग के समोदा में मक्के की आड़ में अफीम की खेती मिली। 939 पन्नों की चार्जशीट, 79 गवाह और आठ आरोपी नामजद, लेकिन दो अब भी फरार। इस मामले का फैसला अभी बाकी है, मगर सवाल वही है क्या पुलिस नेटवर्क की जड़ तक पहुंची या खेत में पौधे गिनकर फाइल पूरी कर दी? साहब, गिरफ्तारी और हजार पन्नों का चालान पुलिसिंग नहीं, अपराध को अदालत में साबित करना असली काम है। वरना गोली का हिसाब गायब, अफीम के नेटवर्क का जवाब गायब और फाइलों में पुलिस का काम सौ फीसदी पूरा! गजबे सिस्टम है अपराधी पकड़ने में पूरी ताकत, अदालत में सबूत जुटाने में आधी भी नहीं!
यक्ष प्रश्न –
1 – डबरा (M.P.) में रिश्तेदारों के नाम पर करोड़ों की संपत्ति जुटाने वाले IPS साहब कौन हैं वर्दी अपनी, नाम पराये और निवेश करोड़ों का!
2 – हालिया स्थानांतरण आदेश में मनीराम का आंकड़ा कितने का है और किसका अभिषेक किया गया और क्यों?










