विधानसभा सचिवालय में दिनेश शर्मा का विवादित कार्यकाल, भड़कने लगी असंतोष की चिंगारी –

चतुर्थ श्रेणी भर्ती से लेकर पदोन्नति के रोस्टर तक सवालों की कतार, नियुक्तियों में पक्षपात के आरोप, महिला अधिकारी की शिकायत, मेडिकल बिल और 125 टीवी का हिसाब! विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह के दरबार तक पहुंचेगा जवाबदेही का सवाल?

 

रायपुर – विधानसभा में माननीयों की आवाज गूंजती है, लेकिन उसी विधानसभा के सचिवालय में कर्मचारियों की शिकायतें किस हद तक सुनी जा रही हैं, यह बड़ा सवाल है। एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के मेडिकल बिल से लेकर लिपिकों की पदोन्नति, नियुक्तियों की प्रक्रिया, महिला अधिकारी के साथ दुर्व्यवहार और लगभग 125 टीवी गायब का मामला सामने हैं। अलग-अलग दिखने वाले इन मामलों की कड़ियां जब एक साथ जुड़ती हैं, तो विधानसभा सचिवालय की प्रशासनिक व्यवस्था पर सवालों का घेरा बनता दिखाई देता है। सचिव दिनेश शर्मा के कार्यकाल को लेकर उठ रही शिकायतों ने असंतोष की चिंगारी सुलगा दी है। अब सवाल सिर्फ कर्मचारियों का नहीं, उस संस्थान की जवाबदेही का भी है, जिसके मुखिया विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह हैं।

चतुर्थ श्रेणी भर्ती का पुराना विवाद, नई शिकायतों से फिर चर्चा में सचिवालय –

विधानसभा सचिवालय में चतुर्थ श्रेणी भर्ती को लेकर पहले भी विवाद उठ चुका है। भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोप लगे और दिनेश शर्मा को लेकर कथित रिश्वत का वायरल वीडियो भी सार्वजनिक है। भर्ती प्रक्रिया को लेकर शिकायतें और कानूनी स्तर पर उठाए गए सवाल इस विवाद को पहले ही सुर्खियों में ला चुके हैं। इन आरोपों की अंतिम स्थिति अपनी जगह है, लेकिन अब कर्मचारियों की नई शिकायतों ने सचिवालय की कार्यप्रणाली को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

पुराने विवाद के बाद अब सवाल पदोन्नति, नियुक्तियों, कर्मचारियों के साथ व्यवहार, मेडिकल बिल और सरकारी उपकरणों के इस्तेमाल को लेकर हैं। आखिर सचिवालय में उठने वाली शिकायतों का निपटारा किस स्तर पर होता है और कर्मचारियों को अपने सवालों का जवाब कब मिलता है?

पदोन्नति का रोस्टर, कहीं नियमों का हिसाब तो नहीं गड़बड़ाया –

लिपिक वर्ग के कर्मचारियों की पदोन्नति का मामला सचिवालय के भीतर असंतोष की बड़ी वजह बनकर सामने आया है। शिकायत में आठ अधिकारियों के अंडर सेक्रेटरी पद पर पदोन्नति के संदर्भ में लिपिक वर्ग के 32 कर्मचारियों की पदोन्नति की आवश्यकता का उल्लेख है, जबकि 18 कर्मचारियों को पदोन्नति मिलने की बात कही गई है।

कर्मचारियों का आरोप है कि निर्धारित रोस्टर के अनुरूप प्रक्रिया पूरी नहीं हुई। शिकायत देने के बाद आवेदन वापस लेने के लिए दबाव बनाए जाने की बात भी कही गई है। अब सवाल यह है कि पदोन्नति के नियमों का पालन किस आधार पर हुआ? कितने कर्मचारी पात्र थे और शेष कर्मचारियों के मामलों में क्या निर्णय लिया गया? यदि प्रक्रिया नियमसम्मत थी, तो पदोन्नति आदेशों और रोस्टर रजिस्टर से स्थिति स्पष्ट की जा सकती है। यदि कोई विसंगति है, तो उसका जवाब भी सामने आना चाहिए।

नियुक्तियों में पक्षपात के आरोप, योग्य कर्मचारी पूछ रहे अपने हिस्से का हिसाब –

नियुक्ति, पदस्थापना और सेवा नियमितीकरण को लेकर भी कर्मचारियों ने सवाल उठाए हैं। शिकायतों में आशीष शुक्ला को सहायक ग्रेड-1 के पद पर नियुक्त किए जाने और सेवा नियमितीकरण की प्रक्रिया पर आपत्ति दर्ज की गई है। वहीं वीरेंद्र शुक्ला को सहायक अनुसंधान अधिकारी के पद पर नियुक्ति दिए जाने के मामले में पात्रता, चयन प्रक्रिया और अन्य योग्य कर्मचारियों को अवसर देने के मानदंडों पर सवाल किए गए हैं।

इन पदों पर नियुक्ति के लिए क्या योग्यता निर्धारित थी, चयन का आधार क्या रहा और संबंधित नियमों का पालन कैसे किया गया? इन सवालों का जवाब किसी चर्चा या सफाई से नहीं, बल्कि नियुक्ति आदेशों और सेवा अभिलेखों से मिलेगा। कर्मचारियों की आपत्तियों की निष्पक्ष समीक्षा से ही स्पष्ट होगा कि प्रक्रिया नियमों के अनुरूप थी या उसमें किसी स्तर पर विचलन हुआ।

महिला अधिकारी की शिकायत, व्यवहार से लेकर सरकारी वाहन तक विवाद –

सचिवालय में एक महिला अधिकारी के साथ व्यवहार को लेकर सामने आई शिकायत ने भी प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं। शिकायत के अनुसार, एक अन्य अधिकारी के विरुद्ध शिकायत तैयार करने की प्रक्रिया में महिला अधिकारी को पत्र पढ़ने और उसकी प्रति प्राप्त करने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। उन्हें वरिष्ठ अधिकारी के निर्धारित आसन पर बैठाने और फिर वहां से हटाने का भी उल्लेख है।

आरोप है कि महिला अधिकारी को देर रात तक कार्यालय में रुकने के लिए कहा गया और ऐसा नहीं करने पर सेवा संबंधी कार्रवाई की चेतावनी दी गई। उनके आवंटित सरकारी वाहन के इस्तेमाल और उसे वापस करने के निर्देश को लेकर भी विवाद का जिक्र है। महिला अधिकारी ने विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष शिकायत किए जाने की बात कही है।

अब सवाल यह है कि इस शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई? क्या संबंधित अधिकारियों से जवाब लिया गया और क्या शिकायतकर्ता का पक्ष निष्पक्ष रूप से सुना गया? किसी भी प्रशासनिक संस्थान में पद की गरिमा के साथ कर्मचारी का सम्मान भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

मेडिकल बिल पर अड़ंगा और 125 टीवी का हिसाब, सरकारी व्यवस्था जवाब देगी –

चिकित्सा प्रतिपूर्ति के बिल लंबित रहने को लेकर कर्मचारियों की नाराजगी भी सामने आई है। शिकायत में एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के मेडिकल बिल का मामला उठाया गया है। कर्मचारियों का सवाल है कि छोटे चिकित्सा बिलों का भुगतान किस आधार पर रोका गया। आरोप है कि विवाद बढ़ने के बाद संबंधित कर्मचारी का चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया और उसके विरुद्ध नौकरी से हटाने जैसी कार्रवाई की तैयारी की गई। अन्य कर्मचारियों के मेडिकल बिल भी लंबे समय से लंबित रहने की बात कही गई है।

इसी के साथ विधानसभा भवन के उद्घाटन से पहले विभिन्न कक्षों में लगाए गए लगभग 125 टेलीविजन सेट हटाए जाने का मामला भी जुड़ता है। कर्मचारियों के अनुसार, उद्घाटन के बाद टीवी हटा दिए गए, लेकिन उनके वर्तमान स्थान की जानकारी स्पष्ट नहीं है।

सवालों की फेहरिस्त लंबी है। इन टीवी की खरीद पर कितना खर्च हुआ? उन्हें हटाने का आदेश किसने दिया? वे फिलहाल कहां हैं और क्या उनका स्टॉक रिकॉर्ड उपलब्ध है? खरीद, भुगतान, स्थापना और स्थानांतरण से जुड़े अभिलेख सामने आने पर ही स्थिति साफ होगी। सरकारी धन से खरीदे गए उपकरणों का हिसाब रखना सामान्य प्रशासनिक जिम्मेदारी है, कोई अतिरिक्त एहसान नहीं।

रमन सिंह के नेतृत्व वाले संस्थान में जवाबदेही किसकी –

चतुर्थ श्रेणी भर्ती का पुराना विवाद हो या कर्मचारियों की नई शिकायतें, इन सभी मामलों में एक सवाल बार-बार सामने आता है सचिवालय की प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही आखिर किसकी है? पदोन्नति और नियुक्ति के नियमों से लेकर कर्मचारी की शिकायत और सरकारी उपकरणों के हिसाब तक, हर मामले में स्पष्टता जरूरी है।

विधानसभा सचिव दिनेश शर्मा के कार्यकाल में उठे इन सवालों पर सचिवालय प्रशासन का पक्ष सामने आना चाहिए। वहीं विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व वाले संस्थान में यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा कि शिकायतों की समीक्षा के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं और जवाबदेही तय करने की कोई प्रक्रिया अपनाई जाती है या नहीं।

विधानसभा लोकतंत्र की गरिमा का प्रतीक है। उसकी गरिमा केवल सदन में होने वाली बहसों से नहीं, बल्कि भीतर काम करने वाले कर्मचारियों के साथ व्यवहार, नियुक्तियों में पारदर्शिता और सार्वजनिक संसाधनों के जिम्मेदार इस्तेमाल से भी तय होती है।

अब देखना यह है कि इन सवालों पर फाइलें आगे बढ़ती हैं या शिकायतें ही फाइलों में दबकर रह जाती हैं। क्योंकि जब एक ही संस्थान में पदोन्नति से लेकर मेडिकल बिल और सरकारी उपकरणों तक पर सवाल उठने लगें, तो असंतोष की चिंगारी को नजरअंदाज करना आसान नहीं होता।

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