राजकाज – शेख चिल्ली की राजधानी वाली पाठशाला! पढ़ाई के बहाने तख्ता पलट की पटकथा, गौठान की जमीन से गोवा तक कहानी के किरदार –

 

राजधानी – शेख चिल्ली की कहानी तो आपने सुनी ही होगी। जनाब सपनों में महल बनाते थे, फिर उन्हीं सपनों में लात मारकर महल गिरा भी देते थे। लेकिन प्रदेश वाले शेख चिल्ली की कहानी थोड़ी अलग है। इनके सपने सिर्फ महल तक सीमित नहीं हैं, इनके सपनों में कुर्सियां हैं, बैच है, वापसी है और सत्ता के गलियारों की पूरी पटकथा है।

कहने को चिल्ली दो साल की पढ़ाई के लिए राजधानी से बाहर है। मगर राजधानी की हवा जानने वाले बताते हैं कि साहब पढ़ाई करने गए हैं या पढ़ाई के नाम पर राजधानी के आनंदम में बैठकर अगली पटकथा लिख रहे हैं,

किताबें खुली है, लेकिन नजरें राजधानी पर हैं। कलम चल रही है, मगर विषय शायद पाठ्यक्रम का नहीं, तख्ता पलट का है।

चिल्ली को पूरा भरोसा है कि पुराने वाले साहब को किसी न किसी तरह फिर मैदान में उतारा जाएगा। इसके लिए बैच विशेष के लोगों की बाकायदा भूमिका तय कर दी गई है। चिल्ली पुराने साहब के करीब रहकर खेल ऑपरेट कर रहे है, कुछ सुशासन बाबू के साथ खड़े है और कुछ दोनों तरफ की खबरों का आदान-प्रदान कर रहें है।

यानी चिल्ली खुद छुट्टी पर है, लेकिन उसका नेटवर्क ड्यूटी पर है!

इस पटकथा में किरदारों की कमी भी नहीं है।

एक साहब हैं रजत की चमक वाले। चमक ऐसी कि जमीन की कहानी में हीरा और साहब की जुगलबंदी ने ऐसा खेल रचा की हीरा भी खुश और साहेब भी मौज में बताए जाते है। चर्चा उस जमीन की भी है जो कभी गौठान के नाम से जानी जाती थी और बाद में जमीन के खेल ने ऐसी करवट बदली कि गौठान की मिट्टी में हीरे की चमक तलाशने वाले कई किरदार पैदा हो गए।

कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जमीन की चमक, कच्चे के खेल और उसके तारों की कहानी राजधानी से निकलकर गोवा तक पहुंचती है। अब गोआ वही जगह है जहाँ साहेब की पत्नी है और खुद शासकीय सेवा में है और इसी रास्ते से पैसा गोआ फिर दुबई तक शिफ्ट हो जाता है। कहानी किससे जुड़ी यह तो उन लोगों से पूछिए जिनके पास इस पूरी पटकथा की डायरी है। लेकिन चिल्ली की किताब में यह अध्याय जरूर मोटे अक्षरों में लिखा बताया जाता है।

उधर एक साहब रोज सड़कों की समीक्षा में व्यस्त हैं। बैठक पर बैठक, निरीक्षण पर निरीक्षण और दावा सड़कें जल्द बेहतर होंगी। जनता सड़क पर चलती है तो गड्ढे गिनती है और साहब बैठक में बैठकर प्रगति गिनते हैं।
सड़क और समीक्षा के बीच शायद वही दूरी है, जो फाइल और जमीन के बीच होती है।

एक मैडम हैं। कभी गिन्नियों में लेन-देन की चर्चाओं से लेकर शराब की दुनिया तक जिनका नाम गलियारों में घूमता रहा। आजकल शराब से दूरी जरूर है, लेकिन चिल्ली के बैच विशेष की पटकथा में मैडम की वापसी का अध्याय फिर खुलने की चर्चा है।

कोई परिवहन चला रहा है कोई बगुले की तरह उसी सरोवर में चोंच मार रहा है जिसमें वह खुद बैठा है, अब पानी जहरीला हो या पूरी तालाब में गंध फैल जाये इससे बगुले को क्या लेना बगुले को सिर्फ चाहिए मछली – सरोवर भले पूरा मटमैला हो जाए।

और मिश्रा जी?
कहानी के ऐसे किरदार हैं जो चिल्ली की पटकथा देखे बिना अगला पन्ना पलटना भी पसंद नहीं करते। चिल्ली कहता तो है कि वह राजधानी से दूर है, लेकिन रिमोट कंट्रोल की बैटरी अभी खत्म नहीं हुई है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि सुशासन बाबू को इस पूरी पटकथा की भनक कितनी है, यह बड़ा सवाल है। क्योंकि ऊपर से तस्वीर बिल्कुल सामान्य दिखाई देती है। सुशासन बाबू सातवें आसमान पर हैं और नीचे राजधानी में कुछ लोग अगली सुबह की स्क्रिप्ट लिखने में व्यस्त हैं।

असली खेल यहीं है। चिल्ली का प्लान सरकार बनाने का नहीं, सरकार चाहे जिसकी बने अपना औरा बचाए रखने का है। सुशासन आए या तख्ता पलट हो, कुर्सी पर चेहरा बदले या सत्ता के गलियारों में नई पटकथा लिखी जाए, बैच विशेष का दबदबा कम नहीं होना चाहिए। ढाई साल की सुशासन सरकार में इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण भी राजधानी ने देखा है। जिस शेख चिल्ली का नाम कभी भाजपा के आरोप पत्र में बाकायदा चिन्हित किया गया था, और गृहमंत्री शाह ने कहा था कि सरकार आई तो
चिल्ली और इस गिरोह को उल्टा लटकाया जाएगा, वही शेख चिल्ली सरकार आने के बाद उल्टा लटकना तो दूर, सुशासन के सबसे बड़े केंद्रों में गिना जाने लगा। यानी सत्ता बदली, सरकार बदली, नारे बदले, लेकिन चिल्ली का औरा कम नहीं हुआ। बल्कि कहानी का मजा तो यह है कि जिस किरदार को पिछली पटकथा में कटघरे में खड़ा किया गया था, वही नई पटकथा में इतना महत्वपूर्ण हो गया कि उसके इर्द-गिर्द कई किरदार अपनी-अपनी भूमिका तलाशते नजर आ रहे है।

चिल्ली का गणित सीधा है सरकार किसी की भी हो, बैच विशेष का वर्चस्व बना रहना चाहिए। जांच वाले साहब हों, रजत वाले साहब हों, जमीन से लेकर गोवा तक चर्चा में आए किरदार हों, सड़क वाले साहब हों या सरोवर में चोंच मारता बगुला हर किसी की भूमिका पटकथा में अलग-अलग है।

लेकिन चिल्ली एक बात भूल रहा है।

राजधानी की कुर्सियां सपनों से नहीं चलतीं और सत्ता की पटकथा में सबसे खतरनाक चीज होती है वक्त।

जिसे चिल्ली आज अपना मोहरा समझ रहा है, कल वही अपनी चाल चल सकता है। जिसे वह अपना स्लीपर सेल समझ रहा है, वह किसी और की नींद खोल सकता है। और जिस पुराने साहब की वापसी का सपना वह राजधानी के आनंदम में बैठकर बुन रहा है, हो सकता है कल वही सपना उसकी आंखों के सामने खुद ही टूट जाए।

क्योंकि शेख चिल्ली की कहानी का क्लाइमेक्स हमेशा एक ही रहा है कि

सपना बड़ा… तैयारी बड़ी… भरोसा उससे भी बड़ा… और फिर एक दिन धड़ाम!

अब देखना यह है कि इस बार चिल्ली की राजधानी वाली पाठशाला से डिग्री निकलती है या फिर सिर्फ एक और टूटा हुआ सपना।

और सुशासन बाबू के लिए असली यक्ष प्रश्न यही है कि पढ़ाई के नाम पर छुट्टी पर गया चिल्ली आखिर पढ़ क्या रहा है… और राजधानी में बैठकर लिख क्या रहा है?

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