66 कस्टोडियल डेथ, फिर भी सिस्टम बेखबर! सुप्रीम कोर्ट ने DGP को ‘पूरी तरह अयोग्य’ कहा, श्रवण केस की जांच CBI को FIR में ढाई साल की देरी पर कोर्ट सख्त, ₹25 लाख मुआवजा; 48 मामलों की न्यायिक जांच लंबित, जेल प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल

रायपुर – छत्तीसगढ़ में कानून-व्यवस्था और पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी ने पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया है। हिरासत में हुई एक मौत के मामले में FIR दर्ज करने में करीब ढाई साल की देरी से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान राज्य के DGP की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए उन्हें पूरी तरह अयोग्य तक कह दिया और यह सवाल भी उठाया कि क्या छत्तीसगढ़ प्रशासन इस मामले से निपटने में सक्षम है। इसके बाद कोर्ट ने मामले की जांच राज्य पुलिस से लेकर CBI को सौंप दी।
मामला जनवरी 2024 में हुई श्रवण की हिरासत में मौत का है। 34 वर्षीय श्रवण को 18 जनवरी 2024 को करीब ₹1,200 कीमत की शराब रखने/बेचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। तीन दिन बाद 21 जनवरी को अस्पताल में उसकी मौत हो गई। मौत के बाद जेल प्रशासन की ओर से 22 जनवरी को न्यायिक जांच के लिए पत्र लिखा गया और न्यायिक मजिस्ट्रेट ने जांच शुरू की। जुलाई 2024 में आई न्यायिक जांच रिपोर्ट में मौत को हिरासत के दौरान सिर में लगी blunt weapon की चोट से हुई जटिलताओं से जोड़ा गया।
न्यायिक जांच रिपोर्ट के बाद भी FIR क्यों नहीं? –
यही सवाल सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा मुद्दा बना। मृतक के परिजनों ने निष्पक्ष जांच और मुआवजे के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाईकोर्ट ने ₹1 लाख मुआवजा दिया, लेकिन FIR दर्ज करने या स्वतंत्र आपराधिक जांच का निर्देश नहीं दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो राज्य की ओर से FIR में देरी को लेकर दलीलें दी गईं। DGP की ओर से यह भी कहा गया कि न्यायिक जांच रिपोर्ट पुलिस विभाग को प्राप्त नहीं हुई थी और रिपोर्ट में ऐसा कोई संज्ञेय अपराध नहीं था जिसके आधार पर FIR दर्ज की जाए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील पर सवाल उठाया। कोर्ट ने नोट किया कि न्यायिक जांच रिपोर्ट राज्य के हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे के साथ संलग्न थी। ऐसे में रिपोर्ट पुलिस तक नहीं पहुंचने की दलील पर सवाल उठना स्वाभाविक था।
सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी के बाद पुलिस से जांच छिनी –
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि न्याय के हित में श्रवण की हिरासत में मौत की परिस्थितियों की जांच CBI को सौंपी जाना जरूरी है। कोर्ट ने CBI को नियमित आपराधिक मामला दर्ज कर जांच करने और वरिष्ठ अधिकारी के नेतृत्व में जांच आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है। इतना ही नहीं, CBI यह भी जांच करेगी कि न्यायिक जांच में सिर की चोट सामने आने के बाद संबंधित राज्य अधिकारियों ने उचित कार्रवाई क्यों नहीं की। यानी अब जांच का दायरा केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं है कि श्रवण की मौत कैसे हुई? CBI यह भी देखेगी कि न्यायिक जांच रिपोर्ट आने के बाद कार्रवाई क्यों नहीं हुई? FIR में इतनी लंबी देरी क्यों हुई? किस अधिकारी की भूमिका रही? पुलिस और प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं निभाई?
जेल प्रशासन भी सवालों से बाहर नहीं –
इस पूरे मामले में जेल प्रशासन की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। श्रवण राज्य की हिरासत में था और उसकी मौत के बाद जेल अधीक्षक ने ही 22 जनवरी 2024 को सेशन जज को पत्र लिखकर न्यायिक जांच की मांग की थी। यह तथ्य जेल प्रशासन के पक्ष में एक महत्वपूर्ण बिंदु है। लेकिन दूसरी तरफ यही सवाल भी उठता है कि हिरासत में रहते हुए सिर में ऐसी चोट कैसे लगी? यदि न्यायिक जांच में blunt weapon से लगी चोट सामने आई, तो हिरासत में उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या जेल में प्रवेश से लेकर अस्पताल ले जाने तक की पूरी मेडिकल और सुरक्षा प्रक्रिया की जांच हुई? क्या CCTV फुटेज, मेडिकल रिकॉर्ड, ड्यूटी चार्ट, मुलाकात रजिस्टर और जेलकर्मियों के बयान सुरक्षित किए गए? क्या चोट लगने की तत्काल सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दी गई? और सबसे महत्वपूर्ण जब न्यायिक जांच रिपोर्ट ने सिर की चोट को मौत से जोड़ा, तब जेल और पुलिस प्रशासन ने उसके बाद क्या कार्रवाई की? अब इन सवालों के जवाब भी CBI की जांच में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
₹25 लाख अंतरिम मुआवजा राज्य की जवाबदेही पर भी मुहर –
सुप्रीम कोर्ट ने मृतक के परिवार को ₹25 लाख का अंतरिम मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अंतिम मुआवजा बाद में तय किया जाएगा। यह रकम सिर्फ आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि हिरासत में हुई अप्राकृतिक मौत को लेकर राज्य की जवाबदेही के सवाल को भी रेखांकित करती है।
जेलों में मौतों का आंकड़ा क्या कहता है?
यह मामला अकेला नहीं है। फरवरी 2026 में छत्तीसगढ़ विधानसभा में सरकार ने बताया था कि जनवरी 2025 से 31 जनवरी 2026 के बीच राज्य की जेलों में 66 कैदियों की मौत हुई। इनमें से 18 मामलों में न्यायिक मजिस्ट्रेट की जांच पूरी हो चुकी थी, जबकि 48 मामलों में जांच जारी थी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का ताजा हस्तक्षेप केवल एक व्यक्ति की मौत का मामला नहीं रह जाता। यह सवाल खड़ा करता है कि हिरासत में होने वाली मौतों की जांच कितनी स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध है? अगर किसी मामले में न्यायिक जांच रिपोर्ट आने के बाद भी FIR के लिए दो साल से ज्यादा इंतजार करना पड़े और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट को जांच CBI को सौंपनी पड़े, तो सिस्टम की जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
पुलिस की कार्रवाई पर भरोसा नहीं या सिस्टम की विफलता?
सुप्रीम कोर्ट का CBI को जांच सौंपना अपने आप में बड़ा संदेश है। राज्य की पुलिस ही जब हिरासत में हुई मौत की जांच में FIR दर्ज करने में इतनी लंबी देरी करे, फिर उसी व्यवस्था के शीर्ष अधिकारी की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट सवाल उठाए और अंततः जांच किसी केंद्रीय एजेंसी को सौंप दे, तो सवाल उठता है कि क्या राज्य की जांच व्यवस्था पर भरोसा करने लायक स्थिति नहीं बची थी? या फिर मामला इतना गंभीर हो गया था कि निष्पक्षता और जनता के विश्वास के लिए जांच को राज्य पुलिस से बाहर ले जाना जरूरी हो गया? यही वह बिंदु है जहां कानून-व्यवस्था का सवाल सिर्फ अपराधियों से निपटने तक सीमित नहीं रहता। कानून लागू करने वाली एजेंसी खुद किसी हिरासत में मौत के मामले में कार्रवाई करने में विफल हो जाए तो जवाबदेही किसकी होगी?
DGP की टिप्पणी से लेकर CBI जांच तक सिस्टम के लिए आईना –
सुप्रीम कोर्ट की totally incompetent वाली टिप्पणी यह बताती है प्रदेश के पुलिस महकमा संभाल रहे आईपीएस अरुण देव गौतम पूरी तरह अयोग्य है। यह राज्य की पुलिस व्यवस्था के लिए बेहद गंभीर न्यायिक फटकार है।
और अब गेंद CBI के पाले में है।
CBI को यह देखना है कि श्रवण की मौत की असली परिस्थितियां क्या थीं, हिरासत में चोट कैसे लगी, कौन जिम्मेदार था और न्यायिक जांच रिपोर्ट आने के बाद भी कार्रवाई क्यों रुकी रही। अगली सुनवाई 13 अक्टूबर 2026 को होगी और CBI को अपनी जांच की प्रगति रिपोर्ट अदालत के सामने रखनी है। सवाल अब सिर्फ एक श्रवण की मौत का नहीं है। सवाल यह है कि जिस राज्य में एक हिरासत में मौत के मामले में FIR के लिए सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़े, वहां कानून का राज आखिर किसके भरोसे चल रहा है? पुलिस की जिम्मेदारी, जेल प्रशासन की जवाबदेही और शासन की निगरानी तीनों पर अब सुप्रीम कोर्ट की निगाह है।










