दूरस्थ आदिवासी जिलों में वाहन फिटनेस व्यवस्था पर सवाल , 200 किमी दूर फिटनेस जांच कराने को मजबूर वाहन संचालक , हर साल रेडियम पट्टी के नाम पर वसूली का गंभीर आरोप

दूरस्थ आदिवासी जिलों में वाहन फिटनेस व्यवस्था पर सवाल , 200 किमी दूर फिटनेस जांच कराने को मजबूर वाहन संचालक , हर साल रेडियम पट्टी के नाम पर वसूली का गंभीर आरोप
रायपुर/गौरेला-पेंड्रा-मरवाही : – छत्तीसगढ़ के दूरस्थ एवं आदिवासी अंचलों में वाहन फिटनेस व्यवस्था अब वाहन मालिकों और यात्री परिवहन संचालकों के लिए बड़ी परेशानी बनती जा रही है। गौरेला-पेंड्रा-मरवाही समेत कई जिलों में ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन (ATS) उपलब्ध नहीं होने के कारण वाहन संचालकों को फिटनेस प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए 180 से 200 किलोमीटर तक लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है।
परिवहन व्यवसाय से जुड़े लोगों का कहना है कि केवल फिटनेस जांच के लिए इतनी लंबी दूरी तय करने में समय, ईंधन और आर्थिक संसाधनों की भारी बर्बादी हो रही है। खासकर छोटे वाहन संचालकों और ग्रामीण रूट पर चलने वाले यात्री वाहनों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है।
वाहन मालिकों ने आरोप लगाया है कि निजी ऑटोमेटेड फिटनेस सेंटरों में अत्यधिक भीड़, कई-कई दिनों की प्रतीक्षा, सर्वर फेल होने और तकनीकी समस्याओं के कारण पूरी प्रक्रिया बेहद जटिल और परेशान करने वाली बन गई है। इससे सार्वजनिक परिवहन सेवाएं भी प्रभावित हो रही हैं और कई वाहन समय पर फिटनेस नहीं करा पाने के कारण संचालन से बाहर हो रहे हैं।
इस बीच वाहन संचालकों ने एक और गंभीर मुद्दा उठाया है। उनका कहना है कि वाहनों में लगी रिफ्लेक्टिव रेडियम टेप/पट्टी सही स्थिति में होने के बावजूद हर वर्ष नई रेडियम पट्टी लगवाने और उसका अलग प्रमाणपत्र लेने के लिए दबाव बनाया जाता है। वाहन संचालकों का आरोप है कि फिटनेस की वैधता एक वर्ष होने के बावजूद रेडियम बदलवाने के नाम पर 3 हजार से 4 हजार रुपये तक अतिरिक्त राशि वसूली जा रही है।
परिवहन व्यवसायियों का कहना है कि एक ओर प्रधानमंत्री लगातार ईंधन बचत, पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की अपील करते हैं, वहीं दूसरी ओर वर्तमान व्यवस्था में केवल फिटनेस जांच के लिए सैकड़ों किलोमीटर तक वाहनों का खाली संचालन कराया जाना पर्यावरण और राष्ट्रहित दोनों के खिलाफ है।
वाहन मालिकों और परिवहन संचालकों ने राज्य सरकार से मांग की है कि जिन जिलों में ATS केंद्र स्थापित नहीं हैं, वहां पूर्व व्यवस्था की तरह क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी (RTO) एवं जिला परिवहन अधिकारियों को अस्थायी रूप से वाहन फिटनेस जांच के अधिकार पुनः दिए जाएं, ताकि दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों को राहत मिल सके और परिवहन व्यवस्था सुचारु बनी रहे।










