उद्योग अफसर सियासत की तिकड़ी, विकास की आड़ में नया खेल!

उद्योग अफसर सियासत की तिकड़ी, विकास की आड़ में नया खेल!
रायपुर/बस्तर – छत्तीसगढ़ की सियासत और ब्यूरोक्रेसी के गलियारों में बीते हफ़्ते दो बड़ी तस्वीरें उभरीं। एक ओर नवा रायपुर में सुरक्षा की चौपाल जहाँ राज्य के मुखिया ने सेना पुलिस और नौकरशाही के दिग्गजों के साथ रणनीति बनाई। दूसरी ओर बस्तर में निवेश का महामेळा जहाँ कॉरपोरेट को लाल कालीन बिछाकर न्योता दिया गया। मंच भले ही अलग हों, शब्द भी अलग हों, लेकिन सुर एक ही सुरक्षा और विकास अब एक ही थाली में परोसा जाएगा।
आंकड़े बनाम मकसद –
राजधानी की बड़ी बैठक में आँकड़ों का ढोल पीटा गया 454 ढेर , 1600 गिरफ्तार , 1700 आत्मसमर्पण , और 65 नए कैंप। टारगेट घोषित 2026 तक नक्सलवाद ख़त्म! कुर्सियों की कतार में सबसे आगे वो चेहरा था, जिसे मुख्य कक्ष का संचालक कहा जाता है। पास में बैठे वह गृह-दरबार के अफसर, जो हर फाइल को सुरक्षा का ठप्पा लगाते हैं। और साथ में वर्दी वाले बड़े साहब, जिनके सामने इस बार ज्यादा मुस्कान थी। लेकिन फुसफुसाहट कुछ और थी। असल मकसद है आने वाले बड़े प्रोजेक्ट्स को सुरक्षित दिखाना। यानी जंगल और ज़मीन पर होने वाले काम को ऑपरेशन सुरक्षा के नाम से पैकेज किया जा रहा है।
MoU की चमक और भीतर की हंसी : –
बस्तर में इस हफ़्ते माहौल बदला-बदला था। लाल कालीन बिछा, मंच सजाया गया, और उद्योगपतियों को सुनाया गया विकास का गीत। 52 हज़ार करोड़ के MoU हुए, और वादे किए गए रोज़गार आएगा, तरक्की होगी, गाँव चमकेंगे। पर दफ्तरों के गलियारों में यह मीठी बात एक ठहाके के साथ सुनाई दी जनता को बताया जाएगा कि ये विकास है, और उद्योग से कहा जाएगा कि ये बोनस है। असल में, इस पैकेज की असली चाबी उन्हीं हाथों में है, जो नीति लिखते हैं और फाइल आगे बढ़ाते हैं। जनता को सपना दिखाना ज़रूरी है, और कंपनियों को राहत देना मजबूरी।
गुपचुप फाइलो में विरोध कहाँ गया?
सबसे दिलचस्प तस्वीर यही है। तमनार हसदेव की कटाई का शोर, जो कभी अख़बार के पहले पन्ने पर था, अचानक गायब हो गया। कारण? फाइलें धीरे-धीरे आगे बढ़ रही हैं। एक बैच के कुछ तेजतर्रार अफसर आजकल विकास नीति की नई परिभाषा गढ़ने में लगे हैं।अफसर उद्योग लॉबी सिंगल विंडो क्लियरेंस का ताना-बाना बुन रही है। ग्राम सभा की मुहर अब औपचारिकता भर है। असली फैसला कंपनियों और दफ्तरों के बीच हो रहा है।
तीन कोना, एक लक्ष्य : –
कॉरपोरेट कहते हैं हमें चाहिए सस्ती बिजली, आसान खनन, ढीली शर्तें। अफसर भरोसा देते है फाइलें हम संभाल लेंगे, सेटिंग हम कर देंगे।और सियासत कहती है जनता को सपना दो, रोज़गार-विकास का झुनझुना दिखाओ। तीनों की मिली-जुली पटकथा में निष्कर्ष एक ही है लाभ कॉर्पोरेट को, बोझ जनता पर, और क्रेडिट सत्ता को।
राजधानी की गलियों में अब यह लाइन घूम रही है विकास का नया मॉडल यह है कि जंगल कटे, बिजली महँगी हो, कंपनियाँ हँसें… और जनता ताली बजाए!










