ईमानदारी का चोला ओढ़े बैठे सुरेंद्र चौबे दो बार हुए दंडित पर दस्तावेज गायब दंड की नस्तियां गायब होने के अंडर सेक्रेटरी ने हलफनामा दिया और हो गया प्रमोशन

ईमानदारी का चोला ओढ़े बैठे सुरेंद्र चौबे दो बार हुए दंडित पर दस्तावेज गायब
दंड की नस्तियां गायब होने के अंडर सेक्रेटरी ने हलफनामा दिया और हो गया प्रमोशन
रायपुर : – कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदारी का चोला ओढ़े बैठे सुरेंद्र चौबे का सर्विस रिकार्ड खंगालने पर अनेक चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे है। इन खुलासे के बाद यह आश्चर्यजनक है कि इतना गोलमाल करने के बाद भी अभी तक ईमानदार शासकीय अधिकारी बने हुए है। मध्यप्रदेश के विभाजन और छत्तीसगढ़ के गठन के दौरान सुरेंद्र चौबे को गड़बड़ी करने पर दो बार दंडित किया गया और आश्चर्यजनक ढंग से दण्ड से सम्बंधित नास्तियाँ गायब हो गई। इससे एक बड़ा सवाल यह उठता है कि इन दंडों को छुपाकर कहीं सुरेंद्र चौबे को आर्थिक लाभ पहुंचाया गया और शासन को आर्थिक क्षति हुई?

क्या है पहला मामला
सुरेंद्र चौबे1995 में जिला महिला एवं बाल विकास अधिकारी के पद पर सेवा में आये और बादमें सहायक संचालक हो गए। वे मूलतः बिहार के निवासी हैं । वर्ष 1998 अप्रैल में शासन द्वारा सहायक संचालक से उपसंचालक के पद अनेक अधिकारी पदोन्नत हुए परन्तु सुरेंद्र चौबे को सी आर नही होने और शासन द्वारा दंडित किए जाने के कारण पदोन्नति नहीं मिली । इसके बाद छत्तीसगढ़ राज्य बन गया और चौबे जी सहायक संचालक ही रहे। सुरेंद्र चौबे क्रय में भारी अनियमितता करने के कारण दंडित किया गया था और वर्ष 1998 में वे निलंबित भी रहे। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद उन्होंने राज्यपाल से कथित रूप से अपील की । कथित इसलिए लिखा जा रहा है कि क्योंकि इस अपील ,दण्ड या कार्यवाही की नस्ती गायब है । इसके बाद शासन द्वारा 8 अगस्त 2005 का आदेश जारी होता है जिसमें लिखा होता है कि इनका दंड विलोपित करने के कारण इन्हें भूतकाल से प्रोफार्मा पदोन्नति दे दी गई। लेकिन इस आदेश में स्पष्ट लेख था कि इन्हें उप संचालक पद का सम्पूर्ण लाभ पदोन्नत पद पर कार्यभार ग्रहण करने से ही मिलेगा । इस आदेश की कोई नस्ती विभाग में मौजूद ना होने का शपथ पत्र जारी होने के कारण जांच के बड़े सवाल पैदा हो रहे हैं ।

क्या है दूसरा मामला
अविभाजित मध्यप्रदेश शासन ने अनियमित कर्मचारियों के नियमितीकरण के सिलसिले में दोषी पाए जाने के कारण 20 दिसम्बर 2000 को एक आदेश जारी करके कई अधिकारियों को दंडित किया था । इनमें से एक अधिकारी सुरेंद्र चौबे भी थे। मध्यप्रदेश शासन के इस आदेश क्रमांक 8186 दिनांक 20 दिसम्बर 2000 में श्री चौबे का नाम क्रमांक 31 पर अंकित है । गौर करना ज़रूरी है कि छत्तीसगढ़ का गठन 1 नवम्बर 2000 को हो चुका था और ये आदेश 20 दिसम्बर 2000 को जारी हुआ था यानी राज्य गठन के एक माह 20 दिन बाद । यह आदेश छत्तीसगढ़ को कब मिला ,इस पर कौन सी नस्ती चली,इसकी प्रविष्टि इनकी सेवा पुस्तिका में है या नहीं ? इन समस्त शासकीय प्रक्रियाओं के कोई विवरण नहीं मिल रहे हैं ।

जांच के यक्ष प्रश्न
इस प्रकरण में जांच के कई सवाल खड़े हो रहे हैं जैसे :-
1 : – क्या मध्यप्रदेश के वर्ष 1998 के सीलबंद लिफाफे को सीधे खोलने के आदेश छत्तीसगढ़ शासन जारी कर सीधे निर्णय ले सकता था या मध्यप्रदेश सरकार से अभिमत जरूरी था क्योंकि विभागीय जांच की मूल नास्तियाँ और गवाह,दस्तावेज़ सभी कुछ मध्यप्रदेश में था.
2: – नियमानुसार एक दण्ड के बाद दूसरा दण्ड मिलने और तब तक पदोन्नति न होने और लिफाफा सीलबंद होने की दशा में पदोन्नति संभव ही नहीं है । सुरेंद्र चौबे को 20 दिसम्बर 2000 को दी गई दंड पर अंततः क्या निर्णय हुआ और इसका उल्लेख 8 अगस्त 2005 के आदेश में क्यों नहीं है ? इस पर पृथक जांच आवश्यक है ।
3: – छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग 2005 में अस्तित्व में आ चुका था फिर प्रकरण में वर्ष 1998 में सीलबंद लिफाफे को खोलने या दंड खत्म करने के मामले में ना तो छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग का अभिमत लिया गया और न ही कोई पुनर्विचार पदोन्नति समिति की बैठक आयोजित की गई । ये सब बेहद आश्चर्यजनक है ।
4:- सुरेंद्र चौबे वर्ष 2005 में दुर्ग जिले में पूर्व से ही प्रभारी जिला कार्यक्रम अधिकारी थे । क्या श्री चौबे ने 8 अगस्त 2005 का आदेश जारी होने के बाद पुनः नियमित जिला कार्यक्रम अधिकारी के पद पर ज्वाइनिंग दी और उसके बाद पदोन्नत पद का वेतन लिया या वे उससे पहले से ही बढ़ा वेतन लेने लगे थे या फिर उन्होंने 1998 से पूरे वित्तीय लाभ ले लिए इसकी सटीक पुष्टि ज़रूरी है ।
5 : – मध्यप्रदेश शासन द्वारा जारी दंडात्मक आदेश 20 दिसम्बर 2000 का छत्तीसगढ़ में विभाग ने क्या क्रियान्वयन किया ?
6 :- क्या सुरेंद्र चौबे की सेवा पुस्तिका में उक्त से सम्बंधित समस्त प्रविष्टियां विधिवत उच्चाधिकारियों के हस्ताक्षर से दर्ज हैं ?
सूत्र बताते है कि सुरेंद्र चौबे अपनी सर्विस बुक शायद लंबे समय तक अपने कब्जे में रखते थे या फिलहाल भी रखते हों तो आश्चर्य की बात नहीं है । स्वयं को बेहद पाक साफ ईमानदार बताने वाले मिस्टर चौबे के उक्त समस्त दस्तावेज़ इस समाचार के साथ हाज़िर हैं । देखना है कि ज़ीरो टॉलरेंस वाली छत्तीसगढ़ सरकार और विभाग इस खबर पर क्या संज्ञान लेता है ।










