सीनियर आईपीएस जीपी सिंह ने लिखी संघर्ष के फतह की नई गाथा

षड़यंत्रपूर्वक अनिवार्य सेवानिवृत्त को चुनौती देकर तीन साल किया संघर्ष, बहाल होकर सरकार से प्रताड़ित अफसरों को दिखाई नई राह

सीनियर आईपीएस जीपी सिंह ने लिखी संघर्ष के फतह की नई गाथा

षड़यंत्रपूर्वक अनिवार्य सेवानिवृत्त को चुनौती देकर तीन साल किया संघर्ष, बहाल होकर सरकार से प्रताड़ित अफसरों को दिखाई नई राह

भूपेश बघेल की सरकार में बर्खास्त एडीजी जीपी सिंह लंबे संघर्ष और कानूनी दांवपेच के बाद बहाल होना इस बात का द्योतक है की हमेशा सत्य की जीत होती है। छत्तीसगढ़ के आईपीएस अफसर जी पी सिंह का रिकार्ड जून 2021 उत्कृष्ठ था जिसके कारण उन्हें जून 2019 में एडीजी के पद पर पदोन्नति भी दी गई थी। छत्तीसगढ़ पुलिस में उन्हें कड़क, ईमानदार एवं कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी माना जाता था। लेकिन समय का परिवर्तन कुछ ऐसा हुआ कि अचानक जुलाई 2021 में उनके विरूद्ध ताबड-तोड़ 03 एफआईआर दर्ज की जाती है एवं अनेकों शिकायतों पर जांच कमेटी बैठा दी जाती है। जो पुलिस अधिकारी उनके सामने उपस्थित होने के लिए पूर्व तैयारी किया करते थे वह ही ढूंढना प्रारंभ किये। उन्हें गिरफ्तार होना पड़ा। विभिन्न आरोपों में उन्हें राज्य सरकार द्वारा अनिवार्य सेवानिवृत्त करने की अनुशंसा भारत सरकार को की जिसके परिपेक्ष्य में भारत सरकार द्वारा उन्हें 20 जुलाई 2023 को अनिवार्य सेवानिवृत्त कर दिया गया।

समय का चक्र

समय का चक्र पुनः परिवर्तन हुआ तो उसी भारत सरकार द्वारा जी पी सिंह को 12 दिसंबर 2024 को पुनः सेवा में सभी परिणामी लाभ सहित बहाल कर दिया। अनिवार्य सेवा निवृत्त मामले में जीपी सिंह को न्याय के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। इस लड़ाई में हर जगह उन्हें जीत मिली। सबसे पहले उन्हें कैट में न्याय मिला। इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में भी उनके पक्ष में फैसला आया। इसी प्रकार जी.पी. सिंह के खिलाफ की गई आपराधिक कार्यवाही में भी उन्हें लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी।

न्यायलय ने कहा किसी को परेशान करने की सीमा होनी चाहिए

जीपी सिंह विरूद्ध पहली एफआईआर 29 जून 2021 को अनुपातहीन संपत्ति के माामले में दर्ज की गई और उनके सरकारी निवास सहित कई ठिकानों पर सर्च की गई। उनके द्वारा कोर्ट में यह सिद्ध किया गया कि उनके विरूद्ध तथ्यात्मक शिकायत के अभाव में फर्जी एवं मनगढ़ंत एफआईआर दर्ज की गई जिसमें प्रापर्टी क्रमांक 7 से 17 का क्रय 1983 में वर्तमान भू-स्वामी द्वारा किया गया था जब जी.पी. सिंह कक्षा 9वी का छात्र थे। अतः उक्त संपत्तियां जी.पी. सिंह की बेनामी कैसे हो सकती है? उक्त तथ्यों के दस्तावेजी प्रमाण को कोर्ट द्वारा अवलोकन करने पर आश्चर्य व्यक्त किया गया। गृह विभाग को दिये गये 21/05/2024 के प्रतिवेदन में स्वयं एसीबी द्वारा उक्त तथ्यों को स्वीकारा है। उनके द्वारा कोर्ट में यह भी सिद्ध किया गया कि उन्हें उक्त प्रकरण में फंसाने के लिए 2 किग्रा सोने की सिल्लियां को स्टेट बैंक के अफसर मणी भूषण से षड़यंत्रपूर्वक बरामद की गई जिसे जी.पी. सिंह का दर्शाया गया था। इसी प्रकार उनके विरूद्ध दूसरी एफआईआर डी.आई.जी. एसीबी/ईओडब्ल्यू श्री आरिफ शेख की अनुशंसा पर दिनांक 08 जुलाई 2021 को राजद्रोह के मामले में दर्ज की गई। उक्त प्रकरण में भी जी.पी. सिंह ने कोर्ट को प्रमाणित किया कि जिन मूल दस्तावेजों के आधार पर प्रकरण बनाया गया है, कोर्ट में दायर चार्जशीट में संबंधित दस्तावेज ही संलग्न नहीं है तथा संबंधित दस्तावेजों की बरामदगी षड़यंत्रपूर्वक मणी भूषण के निवास तथा कटे-फटे कागजों के रूप में जी.पी. सिंह के निवास के बाहर दिखाया गया है। जी.पी. सिंह के विरूद्ध तीसरी एफआईआर दिनांक 28 जुलाई 2021 को कमल सेन नामक व्यक्ति की शिकायत पर की जाती है जो स्वयं कोतवाली महासमुंद के एफआईआर 195/2015 में गिरफ्तार किया गया था। उक्त एफआईआर में घटना का विवरण 6 साल पुराना दर्शाया जाता है। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि जी.पी. सिंह के विरूद्ध की गई एफआईआर में दर्शायी रामकथा का जिक्र फरियादी कमल सेन द्वारा उसके विरूद्ध प्रचलित आपराधिक प्रकरण में कहीं भी प्रस्तुत नहीं है। विचारणीय प्रश्न यह है कि आम जनता की हजारों शिकायतें एफआईआर हेतु प्रदेश के विभिन्न थानों में लंबित रहती है लेकिन जी.पी. सिंह वाले प्रकरण में 6 साल पुरानी घटना क्रम का उल्लेख करके बिना किसी जांच के एफआईआर तत्काल दर्ज कर ली जाती है। एसीबी के उक्त आपराधिक षड़यंत्र का पर्दाफ़ाश स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के अधिकारी मणी भूषण द्वारा दिनांक 05/01/2024 को माननीय न्यायालय में तथा दिनांक 13/02/24 को इंकम टैक्स की जांच में किया गया। उसके द्वारा दिये गये शपथपूर्वक कथन से स्पष्ट होता है कि किस प्रकार से जी.पी. सिंह को षड़यंत्रपूर्वक फंसाने की योजना भूपेश के अधिकारियों द्वारा गढ़ी गई थी। जी.पी. सिंह के वकील द्वारा उक्त तथ्यों के दस्तावेजी प्रमाण जब

माननीय उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ में सुनवाई के दौरान प्रस्तुत किये गये तो विद्वान न्यायाधीश भी हतप्रभ रह गये तथा टिप्पणी की कि ‘‘किसी को परेशान करने की कोई सीमा भी होनी चाहिए’’ उनके द्वारा सभी एफआईआर क्वैश कर दी गई

सत्य की जीत पर माननीय न्यायालय ने अंतिम मुहर लगा दी, लेकिन सत्य को स्थापित करने के लिए उन्हें बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। 04 वर्षों तक उन्हें लगातार निचली अदालत से लेकर उच्चतम न्यायालय तक दरवाजा खटखटाना पड़ा एवं कैरियर के बहुमूल्य 4 वर्ष ही नहीं खोये लेकिन उन्होंने इस दौरान मान, प्रतिष्ठा एवं अपने माता-पिता को भी खोया। उक्त तथ्यों के दस्तावेज इस पत्रिका के पास भी उपलब्ध है।

बहुचर्चित नान घोटाला

जी पी सिंह 1994 बैच के छत्तीसगढ़ कैडर के अफसर हैं, जब साल 2023 में भारत सरकार ने उन्हें छत्तीसगढ़ की भूपेश सरकार की सिफारिश पर बर्खास्त किया तो उनकी सेवा करीब आठ साल बची थी। जीपी सिंह सेवा से बर्खास्त होने वाले एडीजी स्तर के पहले अधिकारी थे। जी पी सिंह के पहले छत्तीसगढ़ कैडर के आईपीएस राजकुमार देवांगन, ए एम जूरी और के सी अग्रवाल को भी बर्खास्त किया जा चुका है। इनमें के सी अग्रवाल को बाद में कैट ने बहाल कर दिया और वे बहाली के बाद सरगुजा रेंज के आईजी भी रहे। इन तीनों अफसरों के उलट जी पी सिंह का मामला था। जी पी सिंह जिस ईओडब्ल्यू दफ्तर के मुखिया थे, वहीं के अफसरों और कर्मचारियों ने उनके सरकारी निवास पर छापा मारा।

यह जानना आवश्यक है कि वर्ष 2019 में श्री जी.पी. सिंह, उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ के हस्तक्षेप से एसीबी/ईओडब्ल्यू में पदस्थ हुए एवं नागरिक आपूर्ति निगम घोटाले की जाॅच के प्रमुख भी बनाये गये। उक्त जाॅच के दौरान बरामद डायरी में सी.एम. सर, सी.एम. मैडम आदि एंट्रीस् को आधार बनाकर श्री भूपेश बघेल द्वारा दबाव बनाया गया था कि श्री रमन सिंह एवं अन्य भाजपा नेताओं के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही की जाए, लेकिन श्री जी.पी. सिंह द्वारा उक्त कार्यवाही नियमानुकूल न होने के कारण उक्त आदेश का पालन करने से इंकार कर दिया गया।

सुपारी शर्त पर आरिफ शेख़ की एंट्री

जब जी.पी. सिंह द्वारा अनिल टूटेजा एवं सौम्या चैरसिया के कहे अनुसार गलत कार्यवाही करने से इंकार कर दिया गया तो उन्हें हटाकर ईओडब्ल्यू का मुखिया आईपीएस शेख आरिफ हुसैन को बना दिया गया, जबकि आरिफ शेख उस वक्त पुलिस अधीक्षक स्तर का अधिकारी था। एसीबी/ईओडब्ल्यू का अधिकार क्षेत्र सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ होने के कारण एडीजी अथवा डीजी स्तर के वरिष्ठ स्तर अधिकारियों को ही उक्त संस्था की कमान अमूमन सौपी जाती है। एसीबी द्वारा शेख आरिफ की पदस्थापना के बाद की गई कार्यवाही से स्पष्ट है कि जी.पी. सिंह की सुपारी के शर्त पर ही इस कनिष्ठ अधिकारी को एसीबी/ईओडब्ल्यू की कमान सौपी गई थी, जो उसके द्वारा निष्ठापूर्वक न्याय की बली चढ़ाते हुए निभाया गया है।

अनिल टूटेजा के मोबाईल से बरामद एक चैट में अनिल टूटेजा स्वयं द्वारा जी.पी. सिंह से क्षमा मांगी गई है एवं अनुरोध किया गया है कि उसके द्वारा भविष्य में उनके कार्यों में हस्तक्षेप नहीं किया जायेगा। उक्त चैट्स से स्पष्ट है कि भूपेश एवं उसके द्वारा नामित अधिकारी अनिल टूटेजा एवं सौम्या चैरसिया का शासन प्रशासन के कार्यों में किस स्तर का अनाधिकृत दखलअंदाजी थी। ईओडब्ल्यू के एडीजी के पद से हटाए जाने के बाद एक जुलाई 2021 को उनके सरकारी निवास पर छापा मारा गया। घर से कई दस्तावेज, कंप्यूटर और अन्य सामान जब्त किए गए। इसके बाद राजनांदगांव और ओडिशा के 15 स्थानों पर भी छापे की कार्रवाई की गई। छापे के बाद उन्हें पांच जुलाई को निलंबित कर दिया गया। आठ जुलाई 2021 को उनके खिलाफ राजद्रोह का चार्ज लगा दिया गया। जीपी सिंह अपने ऊपर लगे आरोपों की जांच सीबीआई से कराने के लिए हाईकोर्ट गए, पर बात बनी नहीं और उन्हें 11 जनवरी 2022 को गिरफ्तार कर लिया गया। जी पी सिंह गिरफ्तार होने वाले राज्य के पहले आईपीएस थे। जी पी सिंह को मई 2022 में जमानत मिल गई और वे जेल से रिहा हो गए। जी पी सिंह की गिरफ्तारी और निलंबन पर ही भूपेश बघेल की सरकार शांत नहीं रही। राज्य सरकार के खिलाफ षड्यंत्र और आपराधिक मामलों को आधार मानते हुए भूपेश की सरकार ने केंद्र सरकार को जी पी सिंह की अनिवार्य सेवानिवृत्ति का प्रस्ताव भेज दिया। केंद्र सरकार ने जी पी सिंह को जबरिया सेवानिवृत करने के राज्य सरकार के प्रस्ताव को करीब 10 महीने पेंडिग में डाले रहा, लेकिन 20 जुलाई 2023 को गृह मंत्रालय ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति पर मुहर लगा दी और 21 जुलाई 2023 को छत्तीसगढ़ सरकार ने भी जी पी सिंह को सेवा से पृथक करने का आदेश जारी कर दिया।

सरकार से प्रताड़ित अफसरों को दिखाई नई राह

आईपीएस जीपी सिंह ने अपना प्रशिक्षण ग्वालियर में शुरू किया और मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों में तैनात रहने के बाद साल 1998-1999 में इंदौर के एएसपी बने। इंदौर के एडिशनल एसपी सिटी के रूप में जीपी सिंह ने कई संवेदनशील इलाकों में हिंसा को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जीपी सिंह बस्तर, महासमुंद, राजनांदगांव समेत कई जिलों एसपी और रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर रेंज के आईजी रहे। रायपुर आईजी रहते आईपीएल मैचों में पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था के लिए जी पी सिंह को याद किया जाता है। बस्तर एसपी रहते नक्सलियों पर नियंत्रण और महासमुंद एसपी रहते 2004 के लोकसभा चुनाव में बेहतर मैनेजमेंट के लिए उन्हें सराहा गया। कानून व्यवस्था को नियंत्रण करने में उनकी कोई मिसाल नहीं है। उनके द्वारा यह उदाहरण 2016 में धमतरी में हुई सांप्रदायिक घटना में दिया था। नक्सलियों के विरूद्ध प्रभावी कार्यवाही के लिए उन्हें वीरता पदक से भी नवाजा गया है तथा उनकी उत्कृष्ठ कार्यप्रणाली के लिए उन्हें राष्ट्रपति द्वारा सराहनीय सेवाओं का पदक भी दिया गया है। ऐसी परिस्थितियों में एक अधिकारी अनिवार्य सेवानिवृत्ति के लिए डेडवुड कैसे हो सकता है।
सीनियर पुलिस अफसर के प्रति भूपेश सरकार की नाराजगी का कारण लोगों को तब समझ नहीं आया। भूपेश सरकार के पहले जीपी सिंह के खिलाफ कोई जांच नहीं हुई थी और न ही कोई गंभीर आरोप लगे थे। इसके बाद भी सरकार ने निलंबन, गिरफ्तारी और बर्खास्तगी को अंजाम दे दिया। सरकार के फैसले के खिलाफ जी पी सिंह मजबूती से लड़े और जीत हासिल की। अपने खिलाफ कार्रवाई लेकर जी पी सिंह ने कैट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अपना दम दिखाया, वह उनके जुझारूपन का उदहारण है। जी पी सिंह की लड़ाई और जीत इसी तरह की मुसीबत में फंसे अफसरों को रास्ता दिखाएगा।

पुलिस महकमे में उत्साह

केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश के आधार पर छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय की सरकार ने जी पी सिंह को ड्यूटी पर ले लिए है। माना जा रहा है कि जी पी सिंह की वापसी से छत्तीसगढ़ पुलिस में उत्साह का माहौल है। पुलिस के कड़क, कर्तव्यनिष्ठ एवं प्रभावी अफसर माने जाते हैं। छत्तीसगढ़ की बिगड़ती कानून व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए उनकी एंट्री महत्वपूर्ण मानी जाती है। जी पी सिंह के अनुपस्थिति के कारण उनका बैचमेट हिमांशु गुप्ता जो पदक्रम सूची में उनसे जूनियर है को रिक्त पद के विरूद्ध सरकार द्वारा डीजी पद पर प्रमोट किया गया है।

नियमानुसार जी पी सिंह को सरकार द्वारा पदोन्नति देना आवश्यक है, जिससे वह भी डीजी की दौड़ में शामिल हो सकते हैं। इससे एडीजी प्रदीप गुप्ता और एसआरपी कल्लूरी का नंबर तो थोड़ा खिसकेगा ही।

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