3% की फाइल और 40% की चुप्पी – सुशासन में कौन ज़्यादा तेज़ निकला?

3% की फाइल और 40% की चुप्पी – सुशासन में कौन ज़्यादा तेज़ निकला?

राजधानी – छत्तीसगढ़ में इन दिनों सुशासन का ऐसा स्वर्णकाल चल रहा है, जहाँ 3% की फाइल सोशल मीडिया पर वायरल है और 40% की चुप्पी सरकारी फाइलों में सुरक्षित है। जनता हैरान है इतना कम कमीशन? क्या अब भ्रष्टाचार भी ‘सस्ता और टिकाऊ’ हो गया है?

एक शिकायत, दो पत्र, तीन संदेह
मामला सीधा-सा है क्रेडा के चेयरमैन पर 3% कमीशन मांगने की शिकायत सीधे मुख्यमंत्री से कर दी गई। चेयरमैन कोई मामूली व्यक्ति नहीं विकास के पोस्टर बॉय, भारी आवाज़, लंबी दाढ़ी और योजनाओं के प्रेज़ेंटेशन वाले ‘पॉवरपॉइंट पुरोधा’। शिकायत 30 जून को होती है, और मुख्यमंत्री सचिवालय 8 दिन बाद सक्रिय हो उठता है। आनन-फानन में विभागीय सचिव को चिट्ठी भेजी जाती है, वेंडरों को मनाया जाता है, पर बात नहीं बनती। नतीजा 29 जुलाई को शिकायत और सीएम सचिवालय का पत्र वायरल। उसके कुछ घंटों बाद ही खंडन भी वायरल हो जाता है। अब यहीं से खेल शुरू होता है। खंडन में कहा गया शिकायत में वेंडर का नाम नहीं था। पर खंडन वाले पत्र में भी किसी वेंडर का नाम नहीं है।
तो सवाल उठता है:
अगर पहला पत्र असली था, तो खंडन क्यों?
और अगर खंडन असली है, तो मुख्यमंत्री सचिवालय की चिट्ठी किसने जारी की?
क्या अब “पत्र बनाम खंडन” की लड़ाई में सत्य सिर्फ एक गूगल ड्राइव फोल्डर बन गया है?

रेटिंग कम क्यों? कट की प्रतिस्पर्धा में अपराध किसका?
क्रेडा चेयरमैन पर 3% के आरोप लगते हैं, तो बवाल मचता है। पर वही एक विभागीय मंत्री पर 40% की किंवदंती वर्षो से तैर रही है फिर भी एक भी पत्राचार नहीं। विधायक खुलेआम 15% पर डील कर रहे हैं कोई सवाल नहीं। आयोगों के उपाध्यक्ष अब Innova के साथ-साथ Fortuner भी मेंटेन करने लगे है। कोई चर्चा नहीं। हाउसिंग , क्रेडा , जैसे बड़े बड़े पद के चैयरमैन ने अगर 3 % ले भी लिया तो इतनी हाय तौबा क्यो मच रही है। अब क्या चाहते हो साहेब बिल्हा के बिलों से जीवन भर मुरुम गिट्टी ही चुराए ? बल्कि इतने कम कट लेने पर इन्हें पुरुस्कृत किया जाना चाहिए। और उन वेंडरों पर कार्रवाही होनी चाहिए जो 3 % भी नही दे पा रहे है।

मुख्यमंत्री सचिवालय की नैतिक चिट्ठियाँ
अब असली सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री सचिवालय किसी भी शिकायत पर बिना जांच और बिना साक्ष्य के पत्र जारी करता है? अगर हाँ, तो यह प्रशासनिक अस्थिरता का जीता-जागता प्रमाण है। अगर नहीं, तो फिर 40% वाले विभागों के ख़िलाफ़ स्याही सूख क्यों जाती है? क्या सीएम सचिवालय की स्याही भी रेटिंग के हिसाब से बहती है?
या फिर यहाँ भी “फाइल कूद” की वो पुरानी मालवा-मॉडल शैली लौट आई है जहाँ फाइल पहले कूदती है, फिर जांच बैठती है, और अंत में ‘खंडन’ गिरता है।

गायब जांच, मौन मंत्री और वायरल विफलता
पूरे प्रकरण में न कोई जांच बैठी, न प्रेस नोट आया, और न ही मुख्यमंत्री ने कुछ कहा। यह शासन का नया मूलमंत्र लगता है शिकायत हो चिट्ठी जारी करो, विवाद हो खंडन भेजो, और फिर अगली पोस्टिंग की तैयारी करो। वहीं दूसरी तरफ 40% वाले विभाग के मंत्री साहब साइलेंट मोड में भी फुल वॉल्यूम पर फल-फूल रहे हैं। हां हां वही मंत्री जी जिन्होंने किसानो को मिलने वाली सरकारी DAP को लक्ष्मीपुत्रो को सौप दिया। अब किसान तो चुनाव के समय काम आने वाले है बाकी पांच साल सरकार लक्ष्मीपुत्र के माथे ही चलनी है।

पत्र, खंडन और चुप्पी का त्रिकोण
छत्तीसगढ़ की नौकरशाही और राजनीति इन दिनों एक विचित्र त्रिकोण में उलझ गई है। अगर आप हाई-प्रोफाइल हैं और शिकायत सीएम तक पहुंच गई, तो आप “वायरल” ज़रूर होंगे जांच हो न हो। लेकिन अगर आप किसी 40% वाले लक्ष्मीपुत्र विभाग में मंत्री हैं,
तो आप साइलेंस में भी सर्वाधिक प्रोडक्टिव गिने जाते हैं।

सुशासन की स्याही से जब चिट्ठी निकले,
तो ‘खंडन’ भी उसी टेबल पर रखा मिलता है।
पर सच वही है जो 3% में दिखे बाकी सब तो बस 40% की साजिश है!”

 

 

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