जूस बेचने वाला बना सट्टे का सुल्तान, अब दिल्ली में खुलेगा महादेव का दरबार! –
छह हजार करोड़ का मामला, दुबई में 200 करोड़ की शादी, हवाला और प्रोटेक्शन मनी का खेल। भाजपा के आरोपपत्र से लेकर सीबीआई की छापेमारी तक अफसरों के नाम चर्चा में रहे। सरकार बदल गई, लेकिन महादेव के दरबार का पूरा हिसाब अब भी बाकी है।

भिलाई में जूस बेचने वाला एक नौजवान देखते ही देखते ऑनलाइन सट्टे की दुनिया का ऐसा नाम बन गया कि उसके कारोबार की गूंज दुबई से लेकर दिल्ली तक पहुंच गई। नाम है सौरभ चंद्राकर। रवि उप्पल के साथ मिलकर महादेव ऑनलाइन बुक का ऐसा नेटवर्क खड़ा किया कि देशभर में पैनल और ब्रांच चलने लगे। जिस लड़के की आमदनी कभी महीने के 15 हजार रुपये बताई जाती थी, उसकी जिंदगी कुछ ही वर्षों में दुबई की आलीशान कोठियों, निजी विमानों और करोड़ों के कारोबार तक पहुंच गई।
फरवरी 2023 में दुबई की 200 करोड़ रुपये की शादी ने इस साम्राज्य की चमक पूरी दुनिया को दिखा दी। बॉलीवुड के सितारे, निजी विमान और शाही इंतजाम। लेकिन इस चमक के पीछे सट्टे का वह कारोबार था, जिसमें हजारों लोगों का पैसा दांव पर लगता था। जांच एजेंसियों के अनुसार पैनल और फ्रेंचाइजी के जरिए ऑनलाइन सट्टा चलाया जाता था। पैसा कई बैंक खातों से घूमता हुआ हवाला के रास्ते विदेश पहुंचता था। ईडी की जांच में हजारों करोड़ की संपत्तियों का भी खुलासा हुआ।
मगर महादेव की असली कहानी सिर्फ सट्टे की कमाई नहीं, उस संरक्षण तंत्र की है जिसके सहारे यह कारोबार फलता-फूलता रहा।
जब कानून के रखवाले ही सवालों के घेरे में आए!
सीबीआई की जांच बताती है कि सट्टे के इस नेटवर्क को चलाने के लिए सरकारी कर्मचारियों तक प्रोटेक्शन मनी पहुंचाई जाती थी। यानी जिस पुलिस पर सट्टे को रोकने की जिम्मेदारी थी, उसी व्यवस्था के कुछ लोगों ने कारोबार को संरक्षण देकर फलने फूलने दिया। एएसआई चंद्रभूषण वर्मा से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों और राजनीतिक संपर्कों तक जांच की कड़ियां पहुंचीं।
भाजपा ने अपने आरोपपत्र में तत्कालीन सरकार और पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए थे। उसमें हुसैन और माहेश्वरी के नाम भी दर्ज थे। बाद में सीबीआई की जांच और छापेमारी में आरिफ शेख, अभिषेक माहेश्वरी, आनंद छाबड़ा और अभिषेक पल्लव के ठिकानों तक जांच की आंच पहुँची। तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का नाम भी इस प्रकरण की जांच और आरोपों
में शामिल रहा। उन्होंने आरोपों को राजनीतिक साजिश बताया। विधानसभा चुनाव में महादेव बड़ा मुद्दा बना। सत्ता बदली, भाजपा सरकार में आई और दिसंबर 2024 में सीबीआई ने जांच अपने हाथ में ले ली। अब सवाल यह है कि क्या जांच सिर्फ उन लोगों तक पहुंचेगी जिनके नाम पहले से सामने हैं या उन बड़े चेहरों तक भी पहुंचेगी जिनके संरक्षण के बिना इतना बड़ा नेटवर्क चलना मुश्किल ही नही नामुमकिन था?
मस्कट से रायपुर और अब दिल्ली!
सौरभ की तलाश में भारतीय एजेंसियां लंबे समय से लगी थीं। दुबई में होने की खबरें आती रहीं। 2024 में यूएई में हिरासत की खबर भी आई, फिर उसके ओमान पहुंचने की चर्चा हुई। आखिरकार इंटरपोल के रेड कॉर्नर नोटिस के आधार पर ओमान में हिरासत और प्रत्यर्पण की प्रक्रिया पूरी हुई। 1 नवंबर 2026 को सीबीआई की टीम उसे मस्कट से भारत ले आई।
2 नवंबर को दिल्ली की अदालत से दो दिन की ट्रांजिट रिमांड मिली। 3 नवंबर को उसे रायपुर लाया गया और 4 नवंबर को विशेष सीबीआई अदालत ने आठ दिन की रिमांड मंजूर कर दी। सीबीआई को उसे पूछताछ के लिए दिल्ली ले जाने की अनुमति भी मिल गई।
महादेव का साम्राज्य छत्तीसगढ़ में खड़ा हुआ, लेकिन उसके सरगना से पूछताछ के लिए सीबीआई को रायपुर की जमीन रास नहीं आई! रिमांड के दौरान सीबीआई के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अजीत सिंह ने सुरक्षा संबंधी संवेदनशीलता का हवाला देते हुए सौरभ चंद्राकर से दिल्ली में पूछताछ की मांग रखी। अदालत ने भी दिल्ली स्थित सीबीआई कार्यालय में पूछताछ की अनुमति दे दी। यानी जिस प्रदेश में सट्टे का साम्राज्य फैला, जहां संरक्षण देने वालों के नाम जांच के घेरे में आए, उसी प्रदेश में उसके सरगना से पूछताछ करना शायद एजेंसी को मुनासिब नहीं लगा। रायपुर में आखिर किसका डर है? क्या महादेव के नेटवर्क की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उसके सरगना से सवाल पूछने के लिए भी राजधानी बदलनी पड़ रही है? या फिर मामला सिर्फ सुरक्षा का है, अथवा सुरक्षा के नाम पर कोई और कहानी पर्दे के पीछे चल रही है? दिलचस्प यह है कि सट्टे का खेल छत्तीसगढ़ में चला, आरोपों की आंच भी यहीं तक पहुंची, लेकिन जवाबों की तलाश दिल्ली में होगी। लगता है, महादेव का दरबार भले छत्तीसगढ़ में सजा था, मगर उसकी असली फाइल का पता अब दिल्ली में ही मिलेगा!
जुलाई 2026 में सीबीआई छह नए आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर चुकी है। अलग से 66 लोगों के खिलाफ पांच चार्जशीट भी दाखिल हुई हैं। इनमें सौरभ और रवि उप्पल के नाम भी शामिल हैं। यानी जांच अब सिर्फ एक ऐप या दो संचालकों तक सीमित नहीं है।
अपराध का सरगना या युवाओं का आइडल?
सौरभ की गिरफ्तारी के बाद एक और दिलचस्प नजारा है। कुछ कलमकार, नेता और सोशल मीडिया के लोग उसकी तारीफों के कसीदे पढ़ रहे हैं। कोई उसे युवाओं का आइडल बता रहा है। मानो जूस की दुकान से दुबई पहुंचना ही कामयाबी की सबसे बड़ी मिसाल हो!
हर्षद मेहता के दौर की याद आती है। कभी शेयर बाजार में उसकी दौलत और रसूख के किस्से सुनाए जाते थे। कुछ लोगों ने उसे सिस्टम को चुनौती देने वाला खिलाड़ी बना दिया था। लेकिन घोटाले की परतें खुलीं तो चमक के पीछे की हकीकत सामने आई।
महादेव की कहानी इससे अलग है, लेकिन यहां भी दौलत का प्रदर्शन असली सवालों को पीछे धकेलता रहा। जिस नेटवर्क ने युवाओं को पैनल ऑपरेटर बनाया, लोगों को रातोंरात अमीर होने का सपना दिखाया और परिवारों की जमा-पूंजी को दांव पर लगाया, उसके संचालक को आदर्श बताने वालों को उन घरों की कहानी भी सुननी चाहिए जहां सट्टे ने आर्थिक तबाही मचाई।
दौलत देखकर किसी को हीरो बना देना आसान है, लेकिन उस दौलत के पीछे का हिसाब पूछना ज्यादा जरूरी है।
पैसा किसका और संरक्षण किसका?
महादेव की पूरी पटकथा में तीन चीजें बार-बार सामने आती हैं सट्टे से पैदा हुआ पैसा, उसे विदेश पहुंचाने वाला हवाला नेटवर्क और कारोबार को चलने देने के लिए कथित प्रोटेक्शन मनी। अगर कानून के रक्षक ही पैसे के आगे खड़े हो जाएं तो अपराधियों के लिए रास्ते अपने आप खुल जाते हैं। इसलिए यह मामला सिर्फ सौरभ चंद्राकर की गिरफ्तारी से खत्म नहीं होना चाहिए। जांच को यह भी बताना होगा कि किसने पैसा लिया, किसने पहुंचाया, किसने संरक्षण दिया और किस स्तर पर व्यवस्था का इस्तेमाल किया गया।
बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया! मगर इस बार रुपये के पीछे भागती जांच को उन हाथों तक भी पहुंचना होगा, जिन्होंने इस साम्राज्य को खड़ा करने में भूमिका निभाई।
भिलाई की जूस दुकान से दुबई के दरबार तक पहुंचा सौरभ अब दिल्ली में पूछताछ का सामना करेगा। देखना यह है कि वह सिर्फ अपने कारोबार का हिसाब देता है या महादेव के उस पूरे दरबार के दरवाजे भी खुलते हैं, जिसके भीतर सत्ता, अफसरशाही, हवाला और बेहिसाब दौलत की कहानियां दफन हैं।










