विधानसभा में सात पर गिरी गाज, बाकी फाइलों पर किसका पहरा? दक्षता में फेल होकर नियुक्ति, उम्र पर शिथिलता और 20 साल बाद सात मार्शल बाहर सवाल सचिवालय की उस व्यवस्था पर, जिस पर विपक्ष भी चुप और सत्ता भी शांत, सवालों का जवाब देने के बजाय नेता प्रतिपक्ष के लोग खबर रोकवाने में ज्यादा सक्रिय –

 

रायपुर – छत्तीसगढ़ विधानसभा की कहानी इन दिनों एक अजीब मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ करीब 20 साल तक सेवा देने वाले सात सहायक मार्शलों को भर्ती प्रक्रिया पर उठे कानूनी सवालों के बाद बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। संदेश बड़ा था नियुक्ति में गड़बड़ी हो तो दो दशक की नौकरी भी ढाल नहीं बन सकती। लेकिन दूसरी तरफ विधानसभा की कुछ ऐसी नियुक्तियों के दस्तावेज और सवाल सामने हैं, जहां नियमों की कसौटी कुछ ज्यादा ही लचीली दिखाई देती है। कहीं नियुक्ति से पहले हुई दक्षता परीक्षा में सफल न होने के बावजूद नियुक्ति का सवाल है। कहीं उम्र और आवश्यक योग्यता को लेकर आपत्ति है। कहीं कंप्यूटर दक्षता में निर्धारित मानक पूरा न करने के बाद शिथिलता दिए जाने का सवाल है। और इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल किसी कर्मचारी का नहीं, बल्कि विधानसभा सचिव दिनेश शर्मा की उस व्यवस्था का है, जिसके अधीन यह पूरा प्रशासनिक तंत्र चलता है।
सवाल यह है कि सात मार्शलों की फाइल में नियम इतने कठोर और दूसरी फाइलों में इतने नरम क्यों?

एक तराजू में 20 साल की नौकरी, दूसरे में शिथिलता –
वर्ष 2018 और 2021 में हुई पांच नियुक्तियों के संबंध में उपलब्ध दस्तावेजों को लेकर सवाल उठाए गए हैं। दावा है कि इनमें से तीन अभ्यर्थी नियुक्ति से पहले ली गई दक्षता परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो पाए थे, इसके बावजूद उन्हें नियुक्ति मिली। क्या दक्षता परीक्षा अनिवार्य थी या नहीं? यदि थी तो असफल अभ्यर्थी नियुक्त कैसे हुए? और यदि नियुक्ति के बाद शर्तों में छूट दी गई तो उसका आदेश किसने और किस नियम के तहत दिया? क्योंकि सात सहायक मार्शलों के मामले में व्यवस्था ने वर्षों पुरानी नियुक्ति को भी नहीं छोड़ा। यानी एक तरफ संदेश गलत भर्ती हो तो 20 साल बाद भी नौकरी जा सकती है। दूसरी तरफ सवाल नियुक्ति के समय नियम पूरे नहीं होने पर भी क्या बाद में व्यवस्था उन्हें पूरा मान लेती है?

विधानसभा में एक और ‘मुनीम’ की कहानी?
इन दस्तावेजों में एक कर्मचारी का मामला सबसे अधिक चुभता है। संबंधित कर्मचारी की उम्र नियुक्ति के समय सामान्य सीमा से अधिक थी। आवश्यक शैक्षणिक योग्यता और बाद में कंप्यूटर दक्षता परीक्षा को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। फिर शिथिलता का सवाल आता है। यहीं कहानी अचानक राजनीतिक हो जाती है। क्योंकि विधानसभा की गलियों में अब यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या किसी व्यक्ति के लिए नियम बदलते हैं, यदि उसकी राजनीतिक पहुंच मजबूत हो? और इसी बहस में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और वर्तमान नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत के बंगले से जुड़े पुराने विवादों और “मुनीम” वाले राजनीतिक तंज का जिक्र भी फिर से होने लगा है। क्या किसी प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्ति के निकट माने जाने वाले लोगों के मामलों में विधानसभा सचिवालय सामान्य से अलग उदार हो जाता है? यदि नहीं, तो विधानसभा सचिवालय को रिकॉर्ड सामने रखकर यह भ्रम समाप्त कर देना चाहिए।

खबर पर पहरा, अव्यवस्था पर चुप्पी? –
विधानसभा की नियुक्तियों और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े तथ्य व दस्तावेज सामने आने के बाद उम्मीद थी कि नेता प्रतिपक्ष सबसे पहले इन सवालों पर जवाब मांगेंगे। आखिर विधानसभा की व्यवस्था, भर्ती और नियमों की जवाबदेही किसी पत्रकार की नहीं, बल्कि संस्था चलाने वालों की है। लेकिन दस्तावेजों में उठे सवालों की जांच कराने के बजाय खबर प्रकाशित करने वाले पत्रकारों पर ही दबाव बनाने की कोशिश हो रही है। खबर रोकने के लिए पत्रकारों तक अपने लोगों को भेजकर पूछा जा रहा है “खबर रोकने के लिए क्या चाहिए?” जिस दस्तावेज पर कार्रवाई होनी चाहिए, उस पर चुप्पी है और जिस पत्रकार ने दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए, उसे समझाने-बुझाने की सक्रियता है। पत्रकार की खबर रुकवा देने से फाइल के सवाल खत्म नहीं होते। विधानसभा में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है नेता प्रतिपक्ष की सक्रियता खबर रोकने में क्यों दिखाई दे रही है, जबकि विधानसभा की भर्ती और प्रशासनिक अव्यवस्था पर जवाब मांगने की जिम्मेदारी कहीं ज्यादा बड़ी है? और शायद यही इस पूरे मामले की सबसे बड़ी विडंबना है दस्तावेज कटघरे में व्यवस्था को खड़ा कर रहे हैं, लेकिन निशाने पर दस्तावेज दिखाने वाला पत्रकार है।

स्पीकर के सामने भी सवालों का पहाड़ –
विधानसभा अध्यक्ष के सामने अब केवल सात मार्शलों का मामला नहीं है। उनके सामने बड़ा प्रश्न यह है कि क्या विधानसभा सचिवालय की पुरानी और वर्तमान नियुक्तियों की एक समान कसौटी पर जांच होगी? या फिर हर फाइल का नियम उसके नाम और राजनीतिक समीकरण के हिसाब से तय होगा? विधानसभा के भीतर यह धारणा बन रही है कि विपक्ष के ताकतवर नेताओं से टकराव लेने पर अध्यक्ष को सदन में लगातार राजनीतिक सवालों और आरोपों का सामना करना पड़ सकता है। इस राजनीतिक दबाव या आशंका की वास्तविकता चाहे जो हो, लेकिन इसका परिणाम यदि प्रशासनिक निष्क्रियता है तो सबसे ज्यादा नुकसान संस्था की विश्वसनीयता का होता है। अध्यक्ष का पद किसी नेता की राजनीतिक सुविधा से नहीं, विधानसभा की संस्थागत मर्यादा से चलना चाहिए। सवालों से बचने के लिए सवालों वाली फाइलें बंद नहीं रखी जा सकतीं।

सचिव दिनेश शर्मा और सवालों की झड़ी –
यह पूरा मामला आखिरकार एक कुर्सी पर आकर रुकता है विधानसभा सचिव दिनेश शर्मा की कुर्सी पर विधानसभा सचिवालय में नियुक्ति, सेवा नियम, परीक्षा, शिथिलता और प्रशासनिक निर्णयों से जुड़े रिकॉर्ड आखिर किस व्यवस्था के अधीन संचालित होते हैं। यदि पांच नियुक्तियों को लेकर उठे सवाल गलत हैं तो सचिवालय के पास उन्हें खत्म करने का सबसे आसान तरीका है रिकॉर्ड सार्वजनिक करे। दक्षता परीक्षा के परिणाम बताए जाएं। नियुक्ति के समय लागू नियम बताए जाएं। उम्र और शैक्षणिक योग्यता में दी गई किसी छूट का आदेश बताया जाए। कंप्यूटर दक्षता में दी गई शिथिलता का आधार बताया जाए और यह भी बताया जाए कि समान परिस्थितियों वाले दूसरे कर्मचारियों को वही राहत मिली या नहीं। बस इतना करते ही सारी राजनीति खत्म हो जाएगी। लेकिन यदि रिकॉर्ड बोलने के बजाय व्यवस्था चुप रहती है, तो सवाल फाइलों से निकलकर सीधे कुर्सियों तक पहुंचेंगे।

सात मार्शलों विधानसभा के सामने आईना –
सात सहायक मार्शलों को हटाना कार्रवाई हो सकती है, लेकिन इससे एक बड़ा आईना भी सामने आ गया है। उस आईने में अब विधानसभा को खुद को देखना होगा।
क्या नियमों की तलवार केवल कमजोर नियुक्तियों तक चलती है? क्या राजनीतिक पहुंच वाले मामलों में नियमों की धार कुंद हो जाती है? क्या नेता प्रतिपक्ष केवल अपनी राजनीतिक खबरों और हमलों के लिए सक्रिय हैं या विधानसभा की आंतरिक व्यवस्था पर भी उनकी कोई जवाबदेही है? क्या स्पीकर सवालों की राजनीतिक आशंका से ऊपर उठकर सचिवालय की निष्पक्ष जांच करा सकते हैं? और सबसे बड़ा सवाल जब 20 साल बाद सात मार्शलों की नौकरी जा सकती है, तो बाकी नियुक्तियों की फाइलें खोलने से आखिर डर किसे लग रहा है?

सात लोगों पर गिरी गाज ने मामला खत्म नहीं किया है। उसने बस विधानसभा की अलमारी में रखी बाकी फाइलों पर लोगों की नजर डाल दी है। अब देखना यह है कि उन फाइलों को खोला जाएगा या फिर कुछ नामों के लिए नियम, कुछ रिश्तों के लिए शिथिलता और कुछ सवालों के लिए चुप्पी ही विधानसभा की नई कार्यप्रणाली बनी रहेगी।

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